‘पहाड़ और पगडंडी’ व अन्य कविताएँ| देवेश पथ सारिया

पहाड़ में पगडंडियाँ
मार्ग भी होती हैं, गन्तव्य भी
पहाड़ में होना
एक पगडंडी पर होना है
यहाँ गाँव भी उगता हैं,
तो किसी पगडंडी के डंठल पर

हर शाम, एक अनबूझे आनंद में
कूद जाता है, पहाड़ से नीचे सूरज
और अंधेरे में सुनाई देती है
जंगल की आवाज़
अपने पाषाणकालीन स्वरूप में

अलस्सुबह, किसी पहाड़ के पीछे से
फिर उछलकर निकलता है सूरज
और पगडंडी के रास्ते
प्रविष्ट हो जाता है
भोर का संदेस लेकर
कच्चे-पक्के मकानों में एक-सा

पगडंडियाँ धमनियाँ और शिराएँ हैं
जिनसे गुज़रती हैं
गीले और सूखे पत्ते लाती औरतें
सब्ज़ियाँ बाज़ार ले जाते किसान
ससुराल जाती डोलियाँ
स्कूल जाते बच्चे
पलायन करते परिवार और युवक

सर्दियों में, पहाड़ पर गिरती है बर्फ
और हफ्ते भर नहीं पिघलती
रुक-सा जाता है जीवन का कलरव
पगडंडियाँ,पलायन कर गयीं
एडियों की गर्मी चाहती हैं !


जैतून की डाली*

वे दोनों आपस में लड़ रहे थे
उनकी लड़ाई की पृष्ठभूमि में बहुत कुछ था
और बहुत कुछ जबरदस्ती जोड़ दिया गया था

तोड़ने के लिए यह जोड़ दिया जाना
इस हद तक बढ़ चुका था
कि उन्हें याद भी नहीं थी लड़ाई शुरू होने की वजह
यह लड़ाई ही उनका धर्म बन चुकी थी

एक दिन
मुझे अकेला पाकर घेर लिया उन्होंने
पूछा मुझसे कि बताओ किस तरफ हो तुम

मैंने कहा-
“मैं तब तक किसी तरफ नहीं हो सकता
जब तक
तुम में से कोई एक पक्ष
पूरी तरह सही ना हो
और तुम हो
कि अपनी अंधी लड़ाई में
दोनों के दोनों
और ज्यादा ग़लत होते जा रहे हो
इसलिए, मैं तटस्थ हूं
अकेला भी पड़ गया हूं, इसीलिए”

ऐसा सुनकर
वे दोनों मुझ पर टूट पड़े
और मार डाला मुझे
कितने अरसे के बाद
उन्होंने कोई काम मिलकर किया
जो एक दूसरे के विरुद्ध ना था

मुझे मारने के बाद
वे हो गए थे तितर-बितर
अपनी-अपनी दिशा में
अगले दिन फिर से लौट आने के लिए

मैं यह जाने बिना मर गया
कि क्या इस रात वे सुकून जान पाएंगे
मिलकर चलने का
या कोई और वजह ढूंढ लेंगे
कल लड़ने की

*ग्रीक मान्यता के अनुसार जैतून के वृक्ष की डाली शांति और सुलह की प्रतीक है

अदृश्य

निरर्थक को
सार्थक
और सार्थक को
निरर्थक
मान सकना;
फिलहाल,
यही परम सत्य है
मेरे लिए

मैं अदृश्य हूं
फलक से
समुद्र तल से
किनारे से
पहाड़ से
मैदान से
रेत से

हर उस जगह से
जहां मैं होता आया हूँ उपस्थित
मैं अब अनुपस्थित हूँ

कभी-कभी अपना सारा मनुष्यत्व निचोड़कर
आप जो दे सकते हैं, वह है- अनुपस्थिति
जो पा जाते हैं, वह- आत्मानुभूति

रहस्यात्मक होने के तरीकों में से
इस समय
मैं चुप्पी के मुकाम पर हूँ

मैं अदृश्य हूं
नष्ट नहीं हो गया हूं

हॉन्ग कॉन्ग में चाय

साढ़े आठ महीने देश से दूर रहने के बाद
पंद्रह दिन घर रहकर
कस्बाई देसीपन मेरी प्रवृत्ति में पुनर्जीवित हुआ है
नथुनों में समा गयी है शुद्ध हवा
पंद्रह दिन में मुझे फिर पड़ गयी है
बहुत सी सहूलियतों की आदत
जिनमें शामिल है
सुबह उठते ही मां के हाथ की चाय पीने की आदत

बहुत भारी बोझ उठाए चला आ रहा हूँ
फिर देश छोड़कर

तड़के ही पंहुची है ट्रांजिट उड़ान
हॉन्ग कॉन्ग अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर
यहां से मेरे गंतव्य की उड़ान में अभी समय है

नवम्बर की इस धुंध भरी अलसायी सुबह
मैं तलाश लेता हूँ एयरपोर्ट पर चाय-कॉफी का कैफ़े
यहां तरह -तरह की चाय हैं लिखी मेनू कार्ड पर
या शायद तरह-तरह के पेयों को चाय का नाम दिया गया है
विकल्पों की संख्या देखकर मैं आश्वस्त होता हूँ
और पूछ बैठता हूँ कैफ़े वाली स्त्री से
कि क्या आपके यहां दूध, अदरक वाली तक़रीबन भारतीय चाय मिलेगी

वह रूखेपन से जवाब देती है,
“आप भारत में नहीं,
हॉन्ग कॉन्ग में हैं”

घर से बाहर कदम रखते ही
सहूलियतों का छिन जाना तो तय होता ही है
वह मुझे उतना नहीं सालता

दरअसल, मुझे नश्तर सा चुभता है
महानगरीय रूखापन

बोझ को सबके सामने गिरने से बचाता
मैं बुदबुदाता हूँ
“विदेश में स्वागत है, देवेश”

पत्ते गिरते हैं

पत्ते गिरते हैं
एक श्रंखला में
बिना रोए, मरते हैं

कोंपल से खिल
बन युवा, हरित
पेड़ को पेड़ का
दर्ज़ा देते हैं

पवन पत्तों को छू
सुगंधित प्राण वायु बनती
हिलोर टहनी को अपने साथ
कुछ और तेज़ चलती

फिर एक दिन,
पत्ते रूपी आभूषण
पक कर पीले पड़ जाते
कुछ सूखते,
कुछ पहले ही गिर जाते

जैसे अनुभव के थपेड़े
बालों को सफेद कर जाते
बिछड कर पत्ते वृक्ष को
नितांत एकाकी कर जाते

घोंसले के पहरेदारों
के शहीद होने पर
रोते हैं पक्षी
डरते हैं अंडे

विलग पत्तों की लाशों को
कुछ निस्तेज़ हवा उड़ा देती
कुछ, आह भर उठते
अपने वृक्ष की ओर

आलिंगन कर
अपने जीवित वृक्ष को
एक पल को पुनः जीवित हो
गिर पड़ते मृत होने को


खेत के ढेले

मिट्टी तो मिट्टी है
पर एक किसान के लिए
उसके खेत का हर ढेला
उसका खेत ही है

कण-कण मिट्टी से ढेला है
ढेले-ढेले से खेत
और खेत से है
किसान का वज़ूद

जब भेजता है
बच्चों को पढ़ने शहर
उसी ढेले को पीस
टीका करता है

मिट्टी को माँ मानने
के ये संस्कार
किसान की किसानियत
अगली पीढ़ी करेगी अंगीकार


कोरोनावायरस और शिन्निन क्वायलो

कोरोनावायरस फैला रहा है अपने अदृश्य पांव
और आदमी, आदमी को संदेह की दृष्टि से देखता है
इन दिनों दुनिया के इस हिस्से में
चीनी नववर्ष की शुरुआत थी
छुट्टियां थीं
लोग यात्राएं कर रहे थे
रिश्तेदारों से मिलने जा रहे थे
देवताओं और पूर्वजों के लिए भेंट
अर्पित कर रहे थे
मंदिरों की चिमनियों में जलाकर
इक्का-दुक्का दुकानों को छोड़कर
बंद था सारा बाज़ार
इसी बीच जोर पकड़ा
कोरोनावायरस के फैलने की सरगर्मी ने
और अचानक कोरोना वायरस की वजह से
सब जल्दी-जल्दी जानने लगे रोकथाम के उपाय
पहला उपाय था
मास्क लगाकर बाहर निकलना
जितनी दुकानें खुली थीं
और जो खुलती जा रही हैं
चीनी नववर्ष की छुट्टियां खत्म होने के बाद
सब जगह से खत्म हो चुके हैं फेस मास्क
जैसे कि हर इंसान एक चलता फिरता चाकू है
आदमी, कोरोनावायरस का संदेहास्पद वाहक
जो सांस छोड़ेगा और धंसा देगा चाकू
चूंकि हवा आदमी को छूकर गुज़रती है
संदेहास्पद है हवा भी
क्या पता कब कोई छींक कर गुज़रा हो वहां से
और अभी तक मौजूद हों छींक की छींटें
संदेह मिटाने के तमाम संदेशों के बावजूद
अफवाहों वाले वीडियो ज्यादा कारगर साबित हुए हैं
इन अफवाहों से अछूता नहीं है मेरा अपना देश
मेरे मित्रों, रिश्तेदारों की चिंताएं मुझसे बड़ी हैं
मैं धोता हूं बार-बार साबुन से‌ हाथ
कमरे में रखी चीजों पर भी शक़ होता है
कि कहीं से उड़कर वायरस चिपक कर आ बैठा हो
हर चीज़ छूने के बाद
कुछ भी खाने से पहले
बार-बार धोता हूं हाथ
और फिर संदेह से देखता हूं हैंडवॉश की बोतल को भी
एक हाथ को संदेह है दूसरे हाथ पर
एक रेस्त्रां में देखा
कि लोग मुंह पर मास्क लगाए खाना खा रहे हैं
सिर्फ मुंह में चॉपस्टिक डालने के समय
होठों से मास्क सरका देते हुए
मुझे फिक्र होती है
उन लोगों की जो पब्लिक सर्विस में है
बसों के ड्राइवर
सेवन इलेवन पर काम करने वाले लड़के-लड़कियां
जो पूरे दिन अनजान लोगों के संपर्क में आते हैं
अनजान लोग जो चीनी नववर्ष की छुट्टियां बिताकर
ना जाने कहां-कहां से आए हों
जाने कौन सी बीमारियां साथ ले आए हों
पब्लिक सर्विस में लगे ये लोग
जिनके कमरे में मेरी तरह घुग्घु बनकर बैठ जाने से
ठप्प पड़ जाएगा यह शहर, यह देश
मुझे फ़िक्र है अस्पतालों के डॉक्टरों और नर्सों की
जो ‘चाकू की धार’ को सहलाकर दुरुस्त कर रहे हैं
चीनी नववर्ष के दौरान दुकानें बंद रहने से
खत्म हो गया है कमरे का बहुत सा सामान
इसे खरीदने मुझे वापस जाना था मार्ट
और मैं सुबह-सुबह ही निकल जाता हूं
ताकि बचा जा सके भीड़ से
जितनी कम भीड़, उतने कम खुले चाकू
उतना कम वायरस का खतरा
पर मार्ट पहुंचकर देखता हूं
मेरी ही तरह बहुत से सयाने लोगों की भीड़
सुबह-सुबह ही चली आई है मार्ट
मार्ट के दरवाजे पर खड़े गार्ड को देखता हूं
और अंदाज़ा लगाता हूं उसके काम की कठिनता का
यह भी कि साल भर की सबसे बड़ी छुट्टियों के बाद
काम पर वापस लौटकर
वह भी इस खतरे के बीच
कैसा लग रहा होगा उसे
मैं उसके लिए कुछ नहीं कर सकता
इसलिए मैं मास्क लगाए हुए ही उसकी तरफ देख मुस्कुराता हूं
मास्क के पीछे छुपी मेरी मुस्कुराहट की मंशा
पहचान जाता है वह
और बदले में अपने मास्क के पीछे से मुस्कुराता है
माना कि कोरोनावायरस मुख्य खबर है
पर इस देश में चूहे का नववर्ष# भी तो है
इसलिए ‘शिन्निन क्वायलो*’ मेरे दोस्तों
हम जल्द वापसी करेंगे
संदेह से भरोसे की ओर
हम सिर्फ मनुष्य होंगे
खुले चाकू नहीं

#स्थानीय संस्कृति में हर चीन वर्ष किसी एक जानवर का वर्ष मन जाता है. इसी मान्यता के अनुसार मौजूदा वर्ष चूहे का वर्ष है.
*मेंड्रिन भाषा में नववर्ष की शुभकामनाएं देने हेतु प्रयुक्त अभिवादन

देवेश की कविताएँ इससे पूर्व विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित: वागर्थ, पाखी, कथादेश, कथाक्रम, कादंबिनी, आजकल, परिकथा, प्रगतिशील वसुधा, दोआबा, जनपथ, समावर्तन, आधारशिला, अक्षर पर्व, बया, बनास जन, मंतव्य, कृति ओर, शुक्रवार साहित्यिक वार्षिकी, ककसाड़, उम्मीद, परिंदे, कला समय, रेतपथ आदि पत्रिकाओं में मेरी कविताएँ प्रकाशित हुई हैं.
समाचार पत्रों में प्रकाशन: राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, दि सन्डे पोस्ट। वेबसाइट/ब्लॉग/ऑनलाइन प्रकाशन: समकालीन जनमत, पोषम पा, शब्दांकन, हिन्दीनामा।
+886978064930 , deveshpath@gmail.com
सम्प्रति: ताइवान में खगोल शास्त्र में पोस्ट डाक्टरल शोध कर रहे हैं। मूल रूप से राजस्थान के राजगढ़ (अलवर) से सम्बन्ध है.

देवेश पथ सारिया

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