‘खत्म होती शामों के साथ’ व अन्य कविताएँ | शिव कुशवाहा

खत्म होती शामों के साथ

दिन के ढल जाने पर भी
मनुष्य चलना नहीं छोड़ता
चिड़िया उड़ना नही छोड़ती
नदियां बहना नहीं छोड़ती
उसी तरह सूरज भी नहीं बदलता अपना रास्ता

खत्म होती शामों के साथ
पक्षी लौटते हैं बिखरे हुए अपने घोंसलों में

अंधेरा बढ़ जाने के बावजूद
किसान को कोई फर्क नहीं पड़ता
वह अपनी फसलों को
सर्द हुए मौसम में सींचता है
और मजदूर अपनी खटराग में उलझे
दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम करता है

जैसे अंधेरे के साथ रोशनी
दिन के साथ रात और दुख के साथ सुख
कभी साथ नहीं छोड़ते एक दूसरे का
वैसे ही रास्ते भी नहीं छोड़ते किसी राही का साथ

गहराती हुई शाम के धुंधलके में
कुछ स्मृतियां उभर आती हैं
कुछ पीड़ाएँ भी देती हैं दस्तक
और याद आता है वह सब कुछ
जो आंखों के सामने कुछ अधूरेपन के साथ
एक रील की मानिंद खुलती जाती है हमारे सामने

खत्म होती शामों के साथ
अंकित होते हैं पूरे के पूरे बीते हुए दिन
जिन पर लिखा होता है समूचे देश का इतिहास,

कि कुछ घटनाएं दर्ज हो जाती हैं
स्याह हो रहे समय के माथे पर
जिन्हें याद करने पर कलेजा सहम उठता है.


भाषा की अनुभूतियां

पक्षियों की तरह नहीं होती
मनुष्यों की भाषा
पक्षियों की अनुभूति
भाषा के साथ जुड़ी रहती है
इसलिए वे सदियों तक
समझते हैं अपने आत्मिक संवाद

मनुष्य भाषाओं पर झगड़ते हैं
उसके संवेदनसिक्त हर्फ़ों को
हथियार बनाकर
भेदते हैं एक दूसरे का हृदय

मनुष्यों की भाषा के शब्द
ग्लोबल हो रही दुनिया में
बड़ी बेरहमी से
संस्कृतियों से हो रहे हैं दूर

भाषिक सभ्यता के खंडहर में
दबे हुए मनुष्यता के अवशेष
और शिलालेखों पर उकेरी गयी
लिपियों के अंश
अपठित रह गए मनुष्यों के लिए

भाषा की अनुभूतियां
विलुप्त हो रही हैं
अवसान होते खुरदरे समय में

कि अब छोड़ दिया है मनुष्यों ने
संवेदना की भाषा में बात करना..


फूल और स्त्री

खिले हुए फूलों की सुंदरता
सबसे अधिक आकर्षित करती है
एक स्त्री को
और एक स्त्री की सुंदरता
पूरी दुनिया को करती है नजरबंद

खिले हुए फूलों के
बहुत करीब होती स्त्री
और स्त्री बहुत करीब होती है
सुकोमल भावनाओं के.

स्त्री के विचार
होते हैं फूलों की तरह कोमल
और हृदय होता है
पंखुड़ियों की तरह उन्मुक्त

धरती पर गिरे हुए फूल
अपनी खूबसूरती नहीं छोड़ते
उसी तरह एक स्त्री
सम्हालती है खुद को
बचा लेती है अपने लिए
खोया हुआ अपना सत्व

कि फूल और स्त्री
पूरी दुनिया के इतिहास में
सबसे सुंदर और मार्मिक अभिव्यक्त है..


उम्मीद के पहाड़

समय अपने सुनहरे पंख लगाकर
उड़ रहा है हमारे इर्द गिर्द
मुठ्ठी में फिसलती हुई बालू की मानिंद
वह जा रहा है हमारी पहुँच से बहुत दूर

आकाश में उड़ रहे पंक्षी
समय की पदचाप सुन रहे हैं
वे महसूस कर रहे हैं
धरती पर विस्तार लेता उदासी का परिवेश

नदी में तैर रही मछलियां
तरंगों की छिपी हलचल देख रही हैं
वे महसूस कर रही हैं
पानी में घुल रही विषैली दवाइयां

धरती पर उगे हुए पेड़
हवा के रुख को पहचान रहे हैं
वे महसूस कर रहे हैं
घिरे हुए खुद को खतरनाक गैसों के आवरण में

अब उम्मीद के पहाड़
दरक रहे हैं बहुत तेजी से
और साथ ही साथ दरक रहा है
हमारे अंदर का खोया हुआ अपनापन..


बचे रहेंगे शब्द

नेपथ्य में चलती क्रियाएं
बहुत दूर तक बहा ले जाना चाहती हैं
जहाँ समय के रक्तिम हो रहे क्षणों को
पहचानना बेहद मुश्किल हो चला है

तुम समय के ताप को महसूस करो
कि जीवन-जिजीविषा की हाँफती साँसों में
धीरे-धीरे दम तोड़ रही हैं हमारी सभ्यताएं

स्याह पर्दे के पीछे
छिपे हैं बहुत से भयावह अक्स
जो देर सबेर घायल करते हैं
हमारे इतिहास का वक्षस्थल
और विकृत कर देते हैं जीवन का भूगोल

हवा में पिघल रहा है
मोम की मानिंद जहरीला होता हुआ परिवेश
और तब्दील हो रहा है
हमारे समय का वह सब कुछ
जिसे बड़े सलीके से संजोया गया
संस्कृतियों के लिखित दस्तावेजों में

बिखर रही उम्मीद की
आखिरी किरण सहेजते हुए
खत्म होती दुनिया के आखरी पायदान पर
केवल बचे रहेंगे शब्द,
और बची रहेगी कविता की ऊष्मा..


शिव कुशवाहा (अध्यापन व लेखन)
जन्मतिथि- 5 जुलाई , 1981 जन्मस्थान- कन्नौज ( उ प्र)
शिक्षा – एम ए (हिन्दी), एम. फिल.,नेट, पीएच.डी.

प्रकाशन- छायावादी काव्य की आत्मपरकता ( शोध पुस्तक),
समकालीन हिंदी कविता ,भाग 2 में कविताएँ संकलित,
शब्द- शब्द प्रतिरोध -(साझा काव्य संग्रह),
‘तो सुनो’ काव्य-संग्रह प्रकाशित।

अन्य प्रकाशन- पुनर्नवा (दैनिक जागरण), आजकल, पाखी, साहित्य-अमृत, कथाक्रम, उत्तर प्रदेश, अक्षरा, मधुमती,लहक, समहुत, युद्धरत आम आदमी, गांव के लोग, नई धारा, परिंदे, सोच विचार, ककसाड़, सृजन सरोकार, अनुकृति, किस्सा कोताह, आधुनिक साहित्य, , समकालीन अभिव्यक्ति, शीतलवाणी, कविकुम्भ, विभोम स्वर,उदय सर्वोदय, प्राची, रिदम, पतहर, जनकृति, दलित अस्मिता, दलित वार्षिकी, तीसरा पक्ष, डिप्रेस्ड एक्सप्रेस, ग्रेस इंडिया टाइम्स, अमर उजाला, जनसंदेश टाइम्स आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरन्तर काव्य रचनाएं प्रकाशित ।

ई ब्लॉग – पाखी, बिजूका, पहलीबार, लिटरेचर पॉइंट, हस्तक्षेप, आखर, अमर उजाला काव्य आदि पर कविताएँ प्रसारित।

सम्मान- ग्रेस इंडिया टाइम्स दिल्ली द्वारा ‘ग्रेस इंडिया लिटरेचर अवार्ड’ 2018, प्रज्ञा हिंदी संस्थान फ़िरोज़ाबाद द्वारा ‘शोधश्री सम्मान’ 2019।
C/O श्रीमती राममूर्ति कुशवाहा,शिव कालोनी, टापा कला, जलेसर रोड, फ़िरोज़ाबाद (उ प्र)पिन- 283303,
7500219405, shivkushwaha.16@gmail.com

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