‘बारिश और जन्म’ व ‘मां और आलू’| नरेन सहाय की दो कविताएँ

बारिश और जन्म

जब मैं दुनिया में आया
सात दिनों तक आसमान बरसा।
सारा घर पानी से भर गया था
और मेरा जन्म –
पानी ऊपर लटकी एक चारपाई पर हुआ।

ठाट और खपरैल के बीच –
दाई ने नाल को खूँटी पर टांग दिया था
यह कहते हुए कि – इस बारिश में
इसे गाड़ा या जलाया नहीं जा सकता।
ये वही जगह थी – जहां पिता
अपनी पसीने से भीगी हुई अल्फ़ी टांगते आये थे।

अटाई के भीतर –
पानी का रंग लाल हो चुका था।
तके के बाहर इमली का पेड़
बूंदों के भार से झुका जा रहा था।
शायद माँ ने काफी देर –
वह दृश्य देखा होगा,
प्रसव की बची हुई पीड़ा के साथ साथ – एकटक।

मैं अभी भी उन क्षणों को –
मां की पुतलियों में देखता हूँ
उस क्षण मटमैले पानी में सिर्फ लाल रंग ही नहीं था।

उस एकटक देखने में
बसावट और बरस दोनों साथ में रहे होगें,
बारिश और जन्म की तरह!


माँ और आलू

चिमटा जला
फुकनी जली

तब जाके
(आस पकी)

पहले भूख का गोला सिका
फिर चूल्हे पर रोटी सिकी
मैं अकेला था –
जिसके लिए आलू भुना।

(मां का दबाया
गरम राख में एक अकेला आलू )

वह जनवरी की ठंडी रात थी
आगी की ओट में बैठा –
मैं ठिठुर ठिठुर कर ताप रहा था।

मताई के बुलाने से पहले,
मैंने आलू को पकते हुए देख लिया
लपककर निकाला
आलू भुंज चुका था।

जोर से चिल्लाते हुए भागा पौर की तरफ –
मेरा आलू भुंज गया,
मेरा आलू भुंज गया …

माँ ने मुझे अँधेरे में
अंतिम चौखट तक देखा ¬–

गदिया से मसल के किये दो हिस्से –
एक हिस्सा मैंने पिल्ले को खिलाया
दूसरा खुद खाया!


नरेन सहाय का जन्म टीकमगढ़, मध्यप्रदेश में हुआ। एमसीआरसी, जामिया विश्वविद्यालय से मास- कम्युनिकेशन में स्नातकोत्तर करने के बाद स्वतंत्र रूप से मीडिया में कार्य किया। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की योजनाओं में फोटोग्राफी, वीडियो आर्ट, सिनेमा और प्रोडक्शन्स से जुड़े रहे है। विजुअल मीडियम के अतिथि शिक्षक के बतौर जामिया मिलिया इस्लामिया में कार्यरत रहे। कविताएं लिखते हैं, फिलहाल शिमला में अपने उपन्यास को अंतिम रूप दे रहे हैं।

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