कैलाश मनहर की पाँच कविताएँ

आत्मग्लानि होती है कि
उतना प्रेम नहीं कर पाया
जितना करना चाहिये था

जिस उत्सुकता से
चीजों को देखना चाहिये था
नहीं देख पाया और
अनेक बार टूटने-सा लगा
दु:खों के आक्रमण से

आत्मग्लानि होती है कि
गुलाब के काँटों से बचते हुये
फूल तोड़ने की कला सीखता रहा

रास्ते की भयावहता से डर कर
यात्रा स्थगित कर दी कई बार
आत्मग्लानि होती है कि
मृत्यु से साक्षात्कार के क्षणों में
जीवन की भीख माँगता रहा

बहुत चाव से देखने के बावज़ूद
सुरक्षित नहीं रख सका
अपनी आँखों में वह अनुपम स्वप्न
आत्मग्लानि तो होती ही है

अपने भीतर की इस विवशता पर
कि शान्तिपूर्वक जीवित रहा मैं
एक मूर्ख तानाशाह के राज्य में


जब तक रहेगा मेरे पास
घड़ा भर पानी
मुठ्ठी भर अनाज और
चुटकी भर नमक साथ में
साँस भर हिम्मत
और धैर्य की दौलत के

कोई भी ईश्वर और तानाशाह
या कि अनावश्यक
कानून अमानवीय
नहीं छीन सकते
मुझ से मेरा जीवन
मेरी आज़ादी के हक़ के साथ

मेरा बोलना और चीखना
आख़िरी वक़्त की
शहादत होगा
हवाओं में गूँजता
वक़्त-बेवक़्त प्राय:
मनुष्यता के लिये ज़रूरी


पहाड़ पर से लुढ़का दो मुझे
अँधेरी कोठरी में डाल दो
भोजन-पानी बंद कर दो मेरा

हाथी के पाँवों तले दबवा दो मुझे
जीवित जला दो दहकती आग में
तपते रेगिस्तान में छोड़ आओ
चौराहे पर फाँसी लगा दो मुझे
सलीब पर लटका कर कीलें ठोंक दो

तुम्हारी मूर्खताओं में शामिल नहीं हूँ मैं


जागने को लिखना चाहता हूँ
चिड़िया की चहक की तरह
घर को लिखना चाहता हूँ
नीड़ की तरह
यात्रा को उड़ान की तरह लिखना चाहता हूँ
पाँवों को पंखों की तरह और
दानों को लिखना चाहता हूँ रोटी की तरह
फिलहाल बस
कविता को लिखना चाहता हूँ
कविता की तरह जबकि
काल को अकाल की तरह लिखना
मेरी विवशता है अभी
कि विवशता को लिखना चाहता हूँ
जीवन की थकान की तरह किन्तु
बावज़ूद अपनी तमाम
विवशता और थकान के
सुबह को
लिखना चाहता हूँ जैसे उम्मीद


महानताओं का बोझ
नहीं उठा सकतीं मेरी क्षुद्रतायें
नहीं सहन कर सकतीं मेरी कमज़ोरियाँ
ताक़तों के आक्रामक वार
मेरी लघुताओं से
नहीं वहन होता विशालताओं का भार
अनावश्यक खुशियों की चहलपहल
नहीं देख सकती मेरी उदासियाँ
मेरा हीनता बोध नहीं ढल सकता
अभिजात्य की चमक-दमक में और
नहीं समझ सकतीं मेरी मूर्खतायें
इतना छल-कपट जबकि
मेरे भीतर का पारदर्शी जल
नहीं ढो सकता इतना खून-खराबा

नहीं रह सकती मेरी साधारणता
इतनी विशेषताओं के साथ
इतनी क्रूरताओं के बीच
नहीं पल सकती मेरी सहजता
उलझनों के लिये
नहीं छोड़ सकता मैं
अपनी सुलझी हुई प्रकृति
और उपलब्धियों के लिये
नहीं भूल सकता अपने
बेशक़ीमती अभाव
आख़िर क्यों छोड़ दूँ मैं
अपना जीवन
आसन्न मृत्यु के डर से अकारण

इस समय और समाज की
जटिलताओं लिये
नहीं छोड़ सकता मैं अपनी सरलता
क्योंकि यही तो विरल है
जो बचा रखी है मैनें
अपने पास पूरे जतन से


कैलाश मनहर | (1)-कविता की सहयात्रा में (2)-सूखी नदी (3)-उदास आँखों में उम्मीद(4)-अवसाद पक्ष (5)-हर्फ़ दर हर्फ़(6)-अरे भानगढ़ (कविता संग्रह)तथा (6)-मेरे सहचर:मेरे मित्र (रेखाचित्रात्मक संस्मरण)प्रकाशित हैं | पता-स्वामी मुहल्ला, मनोहरपुर (जयपुर-राज.) manhar.kailash@gmail.com, 9460757408 जन्म:–02अप्रेल 1954

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