पुरु मालव की सहजीवी और अन्य कविताएँ

  1. सहजीवी

मैं जब भी उदास बैठा होता हूं एकांत में
कोई चिड़िया आकर फुदकने लगती है मेरे आस – पास
वो नहीं समझती मेरी उदासी का सबब
वो मुझे बस उदास देखती है

दो बैल मिलकर खींच लाते हैं
खेत से खलिहान तक गाड़ी
पीछे लेटा गाड़ीवान बेफ़िक्री में ताकता रहता है
तारों भरा आकाश
तुम भरोसे की बात करते हो

जब सारी आवाज़ें रो -धोकर
लौट आती हैं मरघट से घरों को
एक श्वान रात भर बैठा रहता है चिता के सम्मुख
तुम किस दुःख की बात करते हो

द्वार खड़ी एक गाय
आते -जाते देख मुझे
सिर हिलाती है अभिवादन में
और मैं साथ चलते हुए को भी मुड़कर नहीं देखता
किस दंभ में तनकर चलता हूं मैं
तुम किस मानवता की बात करते हो

2.दो चट्टानों के बीच

दो चट्टानों के बीच
इंच भर जगह में
जहाँ थोड़ी मिट्टी है
थोड़ी नमी
एक कोंपल फूट पड़ी है

जहाँ तक आते -आते
सूखने लगते हैं रास्ते
उगने लगती हैं वहीं से
दिशा -दिशा में पगडंडियाँ

जहाँ समुद्र की लहरें
तट के फ़र्श से
तिनका -तिनका बुहार ले जाती हैं
उसी तट पर खड़े होकर एक टिटहरी
समुद्र को ललकारती है

दिन -रात भागतीं सड़कों के
कोलाहल के मध्य भी
कहीं किसी पेड़ से
कोयल मधुर तान छेड़ देती है

बम और तोपों से छलनी धरती पर
बच्चे ढूँढ ही लेते हैं
कंचे खेलने भर जगह

3 गाँव-शहर

गाँव मेरी स्मृति में स्टाम्प की तरह चिपका है
मैं शहर में ग़लत पते पर आई चिट्ठी हूँ
जिसे आख़िर में घूम फिर लौट जाना है गाँव में

मैं जब आख़िरी बार गाँव से निकला था
एक पदचाप मुझे दूर तक सुनाई देती रही थी
और एक निगाह देर तक चुभती रही थी
मेरी पीठ पर बल्लम -सी
गाँव के काँकड़ पर आज भी वो पदचाप
बल्लम लिए बैठी होगी मेरी प्रतीक्षा में
गाँव जाने से इतना क्यों डरता हूँ मैं

सारे रास्ते शहर की ओर आते थे
गाँव की तरफ पगडंडियां थीं
जिन पर चलने का अभ्यास भी धीरे -धीरे जाता रहा
मैं लौटता भी किस तरह

हर शहर के तले कोई कब्र है
मेरा शहर खेतों की कब्र पर बसा है
और तुम्हारा जंगल की कब्र पर
कोई शहर तालाब की कब्र पर भी बना होगा
कोई नदी की कब्र पर है

मैं मेले में भटके बच्चे की तरह
दसों दिशाओं में दौड़ता हूँ
शहर से बाहर जाने की कोई राह नज़र नहीं आती

सारी नदियाँ समंदर में आ आकर गिरती हैं
कोई नदी समंदर से निकलती क्यों नहीं
——-

4. पुश्तैनी घर

पुश्तैनी घर में आख़री रिहायशी माँ ही थी
फिर तारीख़ बदली और कलेंडर का एक वरक़ फड़फड़ा कर उड़ गया

माँ की पहली इच्छा अधूरी रही
पिता कूच कर गए माँ से पहले
इसके बाद माँ सालों तक ख़ुश और आज़ाद रही
दूसरी इच्छा पूर्ण हुई
मगर कब ?
माँ की अर्थी पुश्तैनी घर से ही उठी

सब अपना -अपना घर उठा कर चल दिये
बेटे शहर में, बेटियाँ ससुराल में
और पिता स्वर्ग में
माँ कहाँ जाती ?

घर की दीवारें जो सुनती ही नहीं
बोलती भी थीं कभी
ज़र्द और ख़ामोश हो गई
जैसे वो भी माँ का सहारा लिए खड़ी थीं
माँ के पास था भी क्या दुआओं के सिवा

आज पूरे घर में उदासी है
हर चीज़ किसी लम्स के इंतजार में है
खुशियों का लेप धीरे – धीरे छितरा गया
पर दुःखों का चीकट रंग अब भी लिपटा है दीवारों से
——

नाम –  पुरु मालव जन्म – 5 दिसम्बर 1977

प्रकाशन – हंस, वागर्थ, आजकल, समकालीन भारतीय साहित्य, परिकथा, मधुमति, नई दुनिया, राजस्थान पत्रिका आदि पत्र – पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित।

पुरस्कार – हिंदीनामा – कविताकोश द्वारा आयोजित कविता प्रतियोगिता में प्रथम स्थान। कलमकार पुरस्कार

(सांत्वना)सम्प्रति – अध्यापन।सम्पर्क – कृषि उपज मंडी के पास,अकलेरा रोड़, छीपाबड़ौद, जिला – बारां, राजस्थानमोबाइल – 9928426490मेल – purumalav@gmail.com

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