ग़ज़लें | चित्रा भारद्वाज ‘सुमन’

जो ख़्वाब में हसीं था वो ताबीर में न था
सोचा था सीन जैसा वो तस्वीर में न था

मैं जिसके इश्क़ में हूँ नज़रबंद अब तलक
वो शख़्स मेरी ज़ुल्फ़ की ज़ंजीर में न था

आख़िर ख़ुदा ने क्यों मुझे ये पर अता किए
जब आसमाँ को छूना ही तक़दीर में न था

दरिया से लड़ के रेत तो ले आई थी मगर
साहिल पे मेरा घर कोई तामीर में न था

छत इश्क़ के मकानों की गिरनी थी गिर गई
आहन यक़ीं का जिनकी भी शहतीर में न था

चेहरे पे उसके तर्क-ए- तअ’ल्लुक़ का ग़म नहीं
यानी वो लम्स-ए-यार की तासीर में न था

उसके हर एक शेर में ढूँढा तुझे ‘ सुमन ‘
अफ़सोस नाम तक तेरा तहरीर में न था

ताबीर- ख़्वाब का सच होना ; तामीर- बनाना, बनना, होना; तर्क-ए- तअ’ल्लुक़ – रिश्ते का टूटना; तहरीर- लिखावट; शहतीर- खम्बा, तासीर- असर

तमाम उम्र ही वहम-ओ-गुमान में गुज़री
मेरी तो प्यास सराबों के ध्यान में गुज़री

मैं चाँदनी थी, ज़मीं पर उतर ही आना था
वो ठहरा चाँद तो शब आसमान में गुज़री

गली में इश्क़ की महँगा था वस्ल का बँगला
तो साँस हिज्र के सस्ते मकान में गुज़री

कहाँ पे करती है सरकार-ए-दिल रियायत कुछ
कमाई इश्क़ की सारी लगान में गुज़री

ये उम्र आधी तो कार-ए-जहाँ में बीत गई
बची थी वो भी सफ़र की थकान में गुज़री


थे कच्चे धागे में मोती संभाल क्या करती
कभी तो छूटने ही थे मलाल क्या करती

वो चश्मे तर का सबब पूछ तो रहा था मगर
मैं कह के अब्र से दरिया का हाल क्या करती

निगाह-ए-इश्क़ कहीं और थी तो फिर रुककर
मैं अपने ज़ब्त को खुद ही निढाल क्या करती

सुरूर-ए-इश्क़ में सुध तक नहीं थी चेहरे की
तो नंगे पाँव सफ़र का ख़्याल क्या करती

वो वज्ह-ए-तर्क-ए-तअ’ल्लुक़ बता गया ऐसे
जवाब ही न बचे फिर सवाल क्या करती

कोई ख़्याल न छोड़ा है मीर-ओ-ग़ालिब ने
सुख़नवरी में कोई फिर कमाल क्या करती

बिखरते आईने चुपचाप देखने थे ‘सुमन ‘
तमाम शहर था पत्थर वबाल क्या करती


तलाश-ए-सुकूँ में सफ़र कर रहे हैं
ख़ुदी मन्ज़िलें दर-ब-दर कर रहे हैं ।

ग़म-ए-हिज्र के और फैलेंगे जंगल
यूँ हम वस्ल पर चश्म तर कर रहे है

रखे यूँ गये इश्क़ में हम कि जैसे
किराए के घर में बसर कर रहे है

ये जश्न-ए-चराग़ाँ जिधर चल रहा है
उधर ही से तूफ़ाँ गुज़र कर रहे हैं ।

किसी रोज़ पागल ही कह देगी दुनियां
उन्हें याद हम इस क़दर कर रहे है

ये तन्हाईयाँ मुन्तज़िर है हमारी
इन्हें वापसी की ख़बर कर रहे हैं

बड़े शौक़ से वो करे बेवफ़ाई
‘सुमन ‘ हम भी पक्का जिगर कर रहे है


शराफ़त का ज़माना ही नहीं है
मुझे बातों में आना ही नहीं है

परिन्दों को बुलाना ही नहीं है
छतों पर आब-ओ-दाना ही नहीं है

ज़रा सी बात पर रूठे हुए हो
तुम्हें रिश्ता निभाना ही नहीं है

गिरह अब और लग सकती नहीं सो
ये धागा आज़माना ही नहीं है

निशाँ दीवार के करते हैं रुस्वा
तो सर इस पर टिकाना ही नहीं है

अना की चार दीवारी में ख़ुश हो
ख़ुदा को तुमने जाना ही नहीं है

सिला तुम दे नहीं सकते वफ़ा का
ये दिल तुमसे लगाना ही नहीं है


रात भर जलते चराग़ों की निगहबानी का
कोई तो सोचे हवाओं से परेशानी का

जिसने ताबिश को रखा वास्ते निगरानी के
हाल पूछे वो कभी आ के ज़रा पानी का

आबले पाँव के नासूर हुए जाते हैं
तुझ तलक चाहिए अब रास्ता आसानी का

वो कभी रेत से गुज़रे तो ख़्याल आए उसे
मेरे सहरा में पसरती हुई वीरानी का

अब तो बस ख़ुद में ख़ुदा की है तलाशी बाक़ी
वो ही समझेगा ये लिक्खा मेरी पेशानी का

लिख दिया किसने कहानी में उसे शब का सनम
चाँद होना था जहाँ चाँद की दीवानी का

एक ऊला है ख़्यालों के फ़लक पर कब से
कोई मिलता ही नहीं मिसरा ‘सुमन ‘ सानी का


प्रगतिशील लेखक संघ ने ‘अंचल सृजन’ के माध्यम से रचनात्मक ग्रामीण प्रतिभाओं को तराशा है. मूलतः करौली ज़िले की चित्रा भारद्वाज का गाँव रौंसी है. वर्तमान में जयपुर में रहकर जीव विज्ञान पढ़ा रही है. इसके बाबजूद साहित्य में गहरी रुचि है. उनकी यात्रा जारी है. विभिन्न मंचो पर ग़ज़लों का पाठ कर चुकी है. |

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