‘उदास ख्वाहिशों की संतान’ व अन्य कविताएँ | स्वाति ठाकुर

मुखौटों का शहर

मुखौटों का शहर है यह
चेहरे पहचाने नहीं जा सकते

समय
जो गवाह है
विखंडित शक्लों का

रंगों की सारी समझ
थक गई हो जहां
कौन सा रंग ढूंढे वहां

आदर्शों के भरे पूरे शक्ल के पीछे
जैसे ठहाका मार रही हो
झूठ से सनी
एक लिजलिजी काया
जिसे देख
संभव है
भयाक्रांत हो जाना

सहम जाता है
वह छोटा सा बच्चा
नहीं समझ पाता
इस शहर की पारिस्थितिकी
ज़िन्दगी के गुणा भाग
थका देते हैं
उसकी मासूम आंखों को

इतिहास पसंद आने लगा है उसे
वहीं दीखती है उसे
भविष्य की राह…!!


जीवन एक अधूरी किताब है…!!

अवसान
हर चीज़ का होता है
जैसे दिन का अवसान
रात होता है
और रंग डूबते हैं जब
उदासी बन जाते हैं तब

स्वाति 1

रास्तों पर चलते
हमारे सफर का अवसान
कभी मंज़िल होता है
कभी
भटक कर पाई कोई नई राह

कोई अवसान कभी
खिलखिलाती खुशी में उदित होता है
तो डूबता है कभी
रेतीली शाम की तरह
जीवन का भी होता है अवसान
पर हर दफ़ा यह अवसान
मृत्यु ही नहीं होता
सूरज अस्त हो सकता है
पर जीवन डूबता नहीं है

बीतता है जब कोई पन्ना
सूखे पीले पत्ते की तरह
फिर कोई पन्ना खुलता है
रचे जाने को तैयार

जीवन एक अधूरी किताब है…!!


चलो बो दें कुछ प्रार्थनाएं

चलो बो दें कुछ प्रार्थनाएं

हाथ जोड़े हम
तब बिल्कुल भी सच्चे नहीं लगते
जब हम खो चुके होते हैं सारा स्नेह
भद्दा लगता है उन्हें सुनना
जब लुप्त हो चुकी हो सारी करुणा

Swati Thakur

चलो बोते हैं कुछ एहसास
कि प्रेम
बस किताबों का शब्द बन कर न रह जाए
क्योंकि भाव के अभाव में
यह शब्द बहुत अश्लील लगता है

इन अभावों को नहीं भरता
कभी कोई रुतबा
महज़ शब्दों से
कहां पूरी होती है कोई कविता

चलो बो दें कुछ प्रार्थनाएं
नहीं, चलो बो दें कुछ ख्वाहिशें
जिनसे सिर्फ शब्द सच्चे निकलें
जिन्हें जाया न किया जा सके
बेमन बुदबुदा कर
चलो बो दें कुछ ख्वाहिशें…

ख्वाहिशें,
जो हमारे भीतर रोप दे
थोड़ी सी करुणा
थोड़ा सा प्रेम
और हम सीख सकें
थोड़ा सा इंसान होना…!!


विस्मृति से स्मृतियों वाली यात्रा

रोज़ सीखना चाहती हूं
कुछ शब्द नए
और बिसरती जाती हूं
पुराने सारे अक्षर

स्मृति और विस्मृति की यह यात्रा
नई है
उतनी ही
जितना नया है जीवन

और वह ख़्याल
जो इसे जीवन बनाए रखता है..
जैसे वह नदी
जो हर दिन
गुनगुनाती है नया राग

तुम भी तो
यों ही
आते हो हर बार
पहली मुलाक़ात की तरह
बिल्कुल किसी तिलिस्म की मानिंद
जो है
उतनी ही नई
जितनी यह यात्रा
विस्मृति से स्मृतियों वाली…!!!

प्रेम और गुलाबी रंग

मुझे परहेज़ है
गुलाबी रंग से

जी नहीं, मुझे प्रेम से कतई परहेज़ नहीं है
परहेज़ है
सीमित कर दी गई
प्रेम की परिभाषाओं से

प्रेम
मेरे लिए आसमानी भी हो जाता है
तो जामुनी भी हो जाता है
मेरा प्रेम

मुझे प्रेम है सांवले रंग से उतना ही
जितना लुभाता है क्रांति वाला लाल रंग
प्रेम क्रांति तो है ही…

उस रोज़
जब तुमने गुलाबी कमीज़ पहनी थी
एक नया रंग
पहना था मेरे प्रेम ने भी

सीमाएं स्वीकार नहीं इसे
अपने रंग खुद ही बुनता है
यह प्रेम…!!


उदास ख्वाहिशों की संतान

हम उदास ख्वाहिशों की संतान हैं
ख्वाहिशों की नाकामियों
से थके हमारे पूर्वज
निढ़ाल हो चुके थे जिस रात
जन्म लिया था
कुछ नए ख्वाब ने फिर से

ख्वाब
जो खिलता रहा
समय के साथ
एक अजीब सी बारीक ज़िद में

अपनी उम्र के साथ
बढ़ती रही ज़िद
पर
समय कहाँ रुकता है
क्षीण होती काया
देख रही उस खाब वाले ज़िद को
लगातार गलते

समय
जैसे हँस रहा हो
वितृष्णा लिए हँसी
और
चीख रही हो
मेरी उदासी
पागलपन लिए

और सीढ़ी के अंतिम जीने
पर चुका मुका बैठी मैं
अपने जीर्ण हाथों से
सहला रही हूँ
उस ख्वाब वाले ज़िद को…!!


डॉ स्वाती
डॉ. स्वाती मूलतः बिहार से हैं, इनकी उच्च शिक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय व जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हुई। विभिन्न पत्रिकाओं व पुस्तकों में कविताएं व समसामयिक विषयों पर आलेख व अनुवाद प्रकाशित हुए हैं। हिन्दी के इतर वे मैथिली व भोजपुरी में भी लिख रही हैं। फ़िलहाल बैंक ऑफ बड़ौदा, अंचल कार्यालय, चंडीगढ़ में बतौर प्रबंधक कार्यरत हैं। 8728823830, choti.mailme@gmail.com

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