पृथ्वी दिवस पर वीरू सोनकर की कविताएँ

धरती ने बहुत देर में भ्रम तोड़ा था
वह जो चपटी सी दिखती थी
पर थी गोल
इसकी पीठ पर बहुत सारे देश चढ़े बैठे थे
पहले धरती के यह देश होते थे
फिर धीरे-धीरे देशो की अपनी धरती हो गयी

बंदरो की कोई धरती नही थी. वह कूदते फांदते एक पूरे विश्व को मुँह चिढ़ाते थे
धरती सिर्फ आदमियों की थी और आदमी धरती के सबसे चिढ़ने वाले प्राणी थे

धरती कब से थी, और कहाँ से आई थी, या कैसे बनी थी, यह सब की बातों का जरूरी हिस्सा था
धरती कैसे बच सकती थी, इस बात से सब चेहरा छुपाते थे
कुछ लोग कहते थे कि धरती दुल्हन की तरह है और रात-दिन उसका श्रृंगार करते, कुछ कहते वह माँ की तरह है और कहते-कहते मर जाते!

कुछ लोग, जिनकी अपनी कोई धरती नही थी वह दूर से उगता हुआ सूर्य देखते थे और खुशी से झूमने लगते थे बड़े हर्ष से कहते कि एक दिन हमारी भी धरती होगी

कई बार बूढ़े सोचते, कि काश मरने से पूर्व वह अपनी आँखें किसी शीशे के जार में रख दें और बाद में इस धरती को टकटकी लगा देखते रहें. उनका अनुसंधान कहता था कि भाषा सिर्फ बोली ही नही जा सकती, बल्कि देखी भी जा सकती है!

धरती का पेट संसार का सबसे बड़ा पेट था पर यह कुछ खाता नही था सिर्फ उगलता था

बच्चे कहते हैं कि धरती चोर है जो उनके कंचे खा गई. कुछ वयस्क तो अक्सर शिकायत करते कि उनके हिस्से की धरती उनका भाई खा गया. कोई नही जानता था कि धरती अखाद्य है जो किसी को नही पचती. कुछ चालाक पिता भी थे जो धरती को एक चपत लगा कर, गिर पड़े चोटिल रुआँसे बच्चों को समझा देते थे. यह धरती फिर एक विशाल गद्देदार मैदान में बदल जाती थी

लोग बुलबुले की तरह बनते थे और फूटते थे
धरती चुप रहती थी और बनी रहती थी
धरती का सारा इतिहास बुलबुलों के बनने और फूटने का इतिहास है.

धरती पर नदी की लय थी
धुन थी जो बजती रहती थी हवाओ के बांस के जंगलों से गुजरने पर
धरती पर रोड मैप भी थे
बहुत दूर तक पंक्षियों को रास्ता बताते
बहुत दिनों तक कवियो का काम ऐसे ही आसान हुआ

धरती पर बेहिसाब मौसम थे और थे संसर्ग और अंधाधुंध प्रजनन. खोह-खदान कुछ भी सुरक्षित न था. जो अभी तक खोदा न गया था उसकी कुदालें इसी धरती पर तैयार हो रही थी
और धरती,
जिसने सब कुछ पर्याप्त मात्रा में बना दिया था. वह अपने हवा से हल्के हाथों से एक चेहरा बना रही थी. वह चेहरा जो धरती की भाषा पढ़ने की एक कोशिश और कर सकता था. वह चेहरा जो एक बार और कविता लिखता तो सब चुप हो जाते, बिना बाहें हिलाए
और धरती तब शायद अपना पहला वाक्य बोलती!


 

वीरू सोनकर
वीरू सोनकर हिन्दुस्तान की युवा कविता का प्रतिनिधित्व करते हैं। वीरू ‘मौन-मुखर’ कवि है, कानपुर,उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं। इनका कविता संग्रह ‘मेरी राशि का अधिपति एक सांड है’ वाणी प्रकाशन से प्रकाशित है।

 

एक उत्तर दें

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s