‘युद्ध और बच्चे’ व उषा दशोरा की अन्य कविताएँ

युद्ध और बच्चे

जब युद्ध की घोषणा हुई
तब हँसते हुए बच्चे
फूल वाले पौधों को पानी दे रहे थे

उनकी हँसी के भार से डरी कई बंदूकें
पौधों के पीठ के पीछे जा छुपी
उनमें फूल के बीज होने की जिद होने लगी
जिद थी कि देह पर फूटे मीठी गंध
जिद थी कि बस फूल खिले माथे पर

दुनिया की समस्त बंदूकें
फूल बन जाए
इस उम्मीद की मौत नहीं होनी चाहिए
क्योंकि अभी सींचने हैं बच्चों को
धरती के सारे फूल।


बरसों पहले

प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध
की तारीखों को रटते-रटते
उस बच्चे ने इतिहास की कॉपी में
इन प्रश्नों के आस-पास

युद्ध से कभी न लौटकर वाले अपने पिता के
असंख्य चित्र बनाए थे

उस दिन से आज तक ये तारीखें
चुपचाप गीली आँखें लिए
संसार के प्रत्येक बच्चे से क्षमा माँग रही हैं।


सीमा पर
युद्ध चल रहा था
और टी वी पर
सत्ताईस सैनिकों के मरने की
उन्नीस के लापता होने की
खबर आई

उसी समय सातों महाद्वीपों पर
ढेर बच्चे
बस्तों में हजारों प्रार्थनाऐं भर
स्कूल बस के इंतजार में खड़े थे
ताकि वे भविष्य में
विश्व के सभ्य और शांत नागरिक बन सकें।
आज ही युद्ध खत्म हुआ था

और अब बारूद के कारखानों की अंतिम इच्छा थी कि
वे खेल के मैदान बन जाएँ
उनकी छाती पर दौड़ें असंख्य मुस्कराते बच्चे

छुपम-छुपाई, पकड़म-पकड़ाई की हँसी
उनके जले हुए काले फेफड़ों को साँस दे

बच्चों की हँसी बोधिवृक्ष है
उसी की जड़ों में मिट्टी होकर
बारूद के कारखानों की
अब बुद्ध होने की तीव्र इच्छा है ।
युद्ध के समर्थकों सुनों
हमें ऐसी महान इच्छाओं का सम्मान करना चाहिए।



महानता के पाठ्यक्रम

एन्वल फंक्शन में चुपचाप पेड़ बनने वाले
बच्चों की आँखों में फूट कर रोता है चमकीला सूरजफ़िर एक दिन उन्हीं उपेक्षित आँखों में होता है
सृष्टि के उजाले का लेखा- जोखा भी

उसी में से एक टुकड़ा रोशनी
रोज सुबह हमारी ओर फेंक देता है आसमान

जिसे तुमने सुनामी माना दरअसल
वो समुद्री की खारी कविताओं को
तूफानी अंदाज में बाँचने वाले बच्चों का स्वर है

जिनके होंठ कभी सबसे पीछे खड़े होकर
प्रतियोगिता के समूहगान को उबालते रहे
पर माइक छूने की अपनी इच्छा उन बच्चों ने बर्फ़ ही रखी

कई चुप इच्छाएँ बर्फ़ रहना चाहती है
ताकि किसी एक दौड़ती मुस्कान को मिले खुला मैदान

इस चुप को मजबूरी के नहीं
महानता के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए

मंच के पीछे टेबल जमाने वाले बच्चे
जिनके हाथों पर नहीं चढ़ पाया शीर्ष नायक का गाढ़ा रंग
पर उन दो हाथों ने दौड़कर बचाए कई घोसले
उन्हीं हाथों ने रोपे धान के हजारों खेत
उन्हीं दो हाथों ने तारों की कंदराओं में रची श्रेष्ठ कहानियाँ

पर विश्व के शीर्ष नायक स्वअंहकार में कैसे विस्मृत कर गए कि
युद्ध में जय बोलने वालों का भी बहुत महत्व होता है*

सुनो ! ओ
विश्व की प्रथम पंक्ति तुम्हारी मज्जाओं का पोषण
विश्व की अंतिम पंक्ति की कब्र पर हुआ है

तो अब
हमें चाहिए सीढ़ी के अंतिम पायदान को सर्वप्रथम चूमना
हमें चाहिए अनगढ़ पत्थरों को नज़र के काले टीके लगाना
हमें चाहिए नाप-तौल वाली समस्त जीभों को उम्र कैद की सजा देना
हमें चाहिए अंतिम आँखों की चुप भाषा को चुपचाप पढ़ लेना ।

*(यह पंक्ति कन्हैया लाल मिश्र “प्रभाकर” के निबंध “मैं और मेरा देश” से ली है)


रोटी बनाते हुए पिता

मेरे छोटे हाथ में चीनी के दाने होते
दूसरे हाथ में पिता की उंगली
और पाँवों में सात नम्बर की बड़ी चप्पल
वो भी उल्टी पहनी हुई

क्यारियों में घूम रही चींटियों को
चीनी खिलाकर और
उनकी लंबी कतारों को देखकर ही
मेरी शाम रात के चोले में आती

आबोदाना लेकर जब चींटियाँ
अपने घर लौट जाती
तब मैं बाहर वाली फाटक पर
सवारियों से भरी बस वाले
कंडक्टर की तरह एक पाँव
हवा में लटकाकर खड़ी होती
और पिता मुझे वहाँ झुलाते

पिता घर जल्दी आते थे
और मां उनके कुछ देर बाद
मेरे घर की रोटी
स्त्रीलिंग और पुलिंलग के
बासी नियमों से आबद्ध नहीं थी

हमारी रसोई के सारे कार्य-प्रकार्य
इस्पात के साँचे से बाहर ढले हुए थे
जो पानी की तरह अपनी शक्ल बदलते थे
उन पर लिंगों का कोई ठप्पा न था
तभी तो रोटी बनाते हुए पिता
कितने खूबसूरत लगते थे

घंटी बजते ही इस अमरावती में
माँ के लिए दरवाज़ा मैं ही खोलती
तब रोटी बनाते हुए पिता
आटे से सने हाथों से बाहर झाँकते हुए
रसोई से गुनगुना रहे होते
“तुमको देखा तो ये ख्याल आया”
तब माँ की खिलखिलाहट
स्त्री बंधन के समस्त व्याकरण को
ध्वस्त कर रही होती थी

और तब पिता मुझे ज्यादा
खूबसूरत लगते थे।


भरोसे का हत्या दिवस

छुपाई जाने वाली सारी बातों को
ताले से नफ़रत है
बचाई जाने वाली तुम्हारी सुरक्षा को भी
ताले से नफ़रत है
उनका आरोप है ताले की कोशिकाओं में
गद्दारों के वंशज सोते हैं

शत्रु से मेरी रक्षा करना
इस भोली शक्ल वाले वाक्य में
पूरे ब्रह्माण का महान विश्वास उस बच्चे की तरह सोता है
जिसका एक हाथ
माँ की छाती पर रातभर धरा है

पर उस विश्वास को मृत्युशय्या तक खींच लाने का रंगमंच
ताले ने ही गढ़ा है
ताले ही चाबियों का व्यापार करते हैं
ताले ही भरोसे के क्रय-विक्रय का बाजार रचते हैं

ताले अपनी नाभी में छिपाए रखते हैं नफ़ा-नुकसान का एक बहीखाता
ताले की हंसी में प्रवंचना के चुंबन पलते है
ताले की नशीली गंध में तुम्हारी सरलता मारी जाती है
ताले सेल्समेन की तरह अपना कमीशन काटते हैं

इतिहास के शब्दकोश में ताले जयचंदों के समानार्थी शब्द हैं
और दरवाज़ों पर टंगे ताले से मित्रता का जन्म
एक भरोसे की हत्या दिवस है।

तुम इन तालों के धोखे से बचना इनके हजार मुखौटे हैं ।

 

उषा दशोरा

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