राहुल बोयल की ‘रोटी’ और ‘मौसम’ सहित पाँच कविताएँ

1. मैंने देर कर दी
जिससे मेरा कभी संवाद न हुआ हो
उससे विवाद की मैं
भला कल्पना भी कैसे करूं?
जिससे मेरा विवाद है
उसके लिए प्रार्थनारत हूँ
कि उससे संवाद का कोई रास्ता निकले
कमबख़्त ज़िन्दगी ने भी  
पैंतीस बरस बाद ये हिदायत दी 
कि सामाजिक सरोकार निभाने के लिए
एक गज़ का फासला रख
कुछ उसकी नाराज़गी इतनी लम्बी
कि सारे वसन्त पतझड़ की लगाम थामकर दौड़े
कुछ मेरी अना ने इतने तेवर दिखाये 
कि ज़र्द पत्तियों को सूंघकर फूलों को चिढ़ाया
एक सहसा हुई मुलाकात में 
किसी साधु ने कहा था 
जिनको आवाज़ का हुनर नहीं मिलता
उनको प्यार की तलब ज़्यादा होती है
बहुत सी मूक चीज़ों को 
मैंने चूमने में चूक कर दी
उसका हाथ आज भी 
मेरी तरफ़ बढ़ा हुआ है
और मैं हूँ कि 
मुँह पर रूमाल बाँध के बैठा हूँ।
2. जीवन – नृत्य
इतना हास्यास्पद भी नहीं
कि सबकुछ भूलकर हरदम हँस लिया जाये
इतना गाम्भीर्य भी कहाँ 
कि हँसी के लिए अथक अभ्यास करना पड़े
मेरी दृष्टि में जीवन एक नृत्य है
जिसमें मन को नाचने का हुनर मालूम होता है
यदि तुम सोचते हो 
कि जीवन की संध्या हो गयी है
तो तुम नाचने का नाटक छोड़
सोने की तैयारी कर सकते हो।

फोटो- राहुल बोयल

3. मौसम 
खिड़की के पार देखने का 
नहीं आया मौसम 
और न ही आया है मौक़ा
तो निराश मत हो
मेरे सहयात्री!
फोटो- अमर दलपुरा
जीवन की यात्रा में छूट गये दृश्यों में 
कभी कुछ था ही नहीं
यदि होता कुछ 
तो सच सच बताओ
क्या तुम मौक़ा निकाल नहीं लेते
खि़ड़की पर बैठने का?
मौके को मौसम बनाने की जुगत नहीं करते?
4. आजकल प्रेम

आजकल प्रेम 
शब्दकोश का इतराया हुआ वो शब्द है 
जिसे कविताओं ने सबसे ज़्यादा सर चढ़ाया है।
मैं 
प्रेम पर लिखी सब कविताओं का
आज खुले आम बहिष्कार करता हूँ
और प्रेम से जुड़े हर शब्द पर 
हलफ़नामे में ऐतराज़ करता हूँ।
मैं तुमसे मुलाकात के लिए तरसा
मगर ज़मीन के हर हिस्से पर इसे वर्जित कहा गया
मैं लेकर आया मेरे मनुष्य होने के प्रमाण
किन्तु प्रमाण जाति और धर्म का माँगा गया
मैंने केदारनाथ सिंह की कविता का वाचन किया 
कि दुनिया को हाथ सा गर्म और सुन्दर होना चाहिए
दुनिया गर्म हो गयी और
मेरी सूरत बदलकर मुझे सुन्दर बनाया गया।
प्रेम की विधाओं को अव्यक्त कहते ही
मेरी अभिव्यक्ति पर एक प्रश्नचिह्न लगाया गया
मैंने कविताओं में तुम्हें पुकारने का साहस जुटाया
तो प्रेम कविता लिखने पर अभियोग चलाया गया
मैं समाज के संवैधानिक कटघरे में 
तेरी गवाही की प्रतीक्षा में वर्षों से खड़ा हूँ
मेरे पक्ष में यदि तुम एक प्रेम कविता भी गुनगुना लोगी
तो मैं 
दूसरे हलफ़नामे पर ऐतराज़ वापस ले लूंगा।
5. रोटी
रोटी पापी पेट का प्रथम पुण्य है 
जो सर्वप्रथम धरती के हिस्से आता है
उसके बाद किसान के।
रोटी मनुष्य की रची कृपा है
जो गाय और कुत्ते जैसे कुछ ही 
चौपायों के नसीब में आयी है
क्यों कि बाकी जानवरों ने कभी
साथ ही नहीं दिया आदमी का भूख में।
रोटी प्याज की तरह काटा गया
धरती का चकतीनुमा वो अंश है
तवे पर आते ही जिसकी साँसें फूल जाती हैं
रोटी ऐसा दर्द है जो थाली में गिरते ही
ज़बान तक रो पड़ती है।

Amar Dalpura
रोटी जीवन की महक से भरा फूल है
जो हाथों की नरमी से ही फलता है
रोटी दैनिक तपस्या है मनुष्य के लिए
रोटी के लिए जलता रहा है सदियों से जिस्म
रोटी कभी जलनी नहीं चाहिए।
परिचय-
राहुल बोयल नयी पीढ़ी के संजीदा और महत्वपूर्ण कवि है. उनके तीन कविता और एक  ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हो चुका है.
पुस्तकें- 1. समय की नदी पर पुल नहीं होता (कविता संग्रह)
2. नष्ट नहीं होगा प्रेम ( कविता संग्रह)
3. मैं चाबियों से नहीं खुलता( काव्य-संग्रह)
4. ज़र्रे-ज़र्रे की ख्वाहिश (ग़ज़ल संग्रह)
इसके अतिरिक्त विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में यथा वागर्थ, सृजन सरोकार, किस्सा कोताह, कथा, दोआबा, हिन्दी जनचेतना, हस्ताक्षर वेब पत्रिका इत्यादि में कविताएँ/ग़ज़ल प्रकाशित।
राहुल बोयल यहां बात की जा सकती है
मोबाइल नम्बर- 7726060287
ई मेल पता- rahulzia23@gmail.com

2 विचार “राहुल बोयल की ‘रोटी’ और ‘मौसम’ सहित पाँच कविताएँ” पर

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