पुण्यतिथि|शिव बटालवी| बलवंत गार्गी की पुस्तक हसीन चेहरे से

शिव बटालवी के साथ मेरा करार था। जब मैं चंडीगढ से दिल्ली अपनी कार में जाता तो उसे अपने साथ चलने के लिए कहता। रास्ते में बीयर की दो बोतलें, भुना हुआ मुर्गा तथा तीस रुपए नकद।
शिव स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से छुट्टी लिए बिना ही कई बार मेरे साथ दिल्ली जाता। शिव को न तो शराब पिलाने वालों की कमी थी और न ही मुर्गा खिलाने वालों की। वास्तव में उसके बारे में यह बात गलत फैली हुई थी कि लोग उसे शराब पिलाते थे। उसके पास यदि जेब में एक हजार रुपया होता तो वह दिन में ही दोस्तों को शराब पिलाने तथा खिलाने पर खर्च कर देता। वह शाही आदमी था और शाही फ़कीर। उस में खुद को बर्बाद करने की शक्ति थी।
उसने मुझसे कहा, ‘ये साली औरतें सदा रोती रहती है कि कि फलां मर्द ने मेरी अस्मत लूट ली। आप अपने हुस्न को बैंक के लॉकर में रख दें। मैं बैंक में काम करता हूँ। बहुत से लॉकर हैं वहाँ। नोटों की गड्डियां, सोने के ज़ेवर, हीरे। परंतु कोई ऐसा लॉकर नहीं जहाँ औरत अपने हुस्न या जवानी को रखकर चाबी जेब में डाल ले ? इस साले हुस्न ने तो तबाह होना ही है——- तो तबाही किस बात की ? प्यार से हुस्न चमकता है। जवानी मचती है। अस्मत का पाखंड तो कुरुप औरतों ने रचा है……इन्सानी जिस्म को कोई चीज़ मैला नहीं कर सकती । हमेशा निखरा तथा ताज़ा रहता है हुस्न।’
शिव के साथ कार में सफ़र करने का कोई सौदा नहीं था, यह तो एक प्रकार का प्यार था। मैं कार में लोगों को ढोने के हक में नहीं। सफ़र मेरे लिए बड़ी सूक्ष्म तथा आध्यात्मिक चीज़ है। यदि कोई यार साथ हो तो सौ मील का सफ़र मिनटों में कट जाता है। यदि कोई बोर आदमी साथ हो तो दो मील का सफ़र भी दो हज़ार मील लगता है।
एक दिन सुबह-सुबह शिव मेरे घर आया और कहने लगा, ‘आज शाम को कपूरथले में मुशायरा है। तुम मेरे साथ चलो।’
मैंने कहा, ‘मैं नहीं जा सकता। किसी और को ले जाओ।’
शिव ने कहा, ‘टैक्सी ले कर आऊंगा। अकेला। किसी और कंजर को मत बताना। चंडीगढ़ भरा पड़ा है मुफ़्तखोरों से। यूं ही साथ चल देंगे उठकर। मैं टैक्सी में सूअर को लाद कर ले जा सकता हूँ, परंतु किसी बोगस राईटर को नहीं। तुझे चलना पड़ेगा। मैं तुझे बीयर की तीन बोतलें तथा भुना हुआ मुर्गा खिलाऊंगा रास्ते में साथ में तीस रुपए।’
मैंने कहा, ‘मेरा रेट पचास रुपए है।’
वह मान गया।
शिव को मुशायरे से पाँच सौ रुपए मिलने थे। प्रबंधकों ने यह बात छुपा रखी थी और चाहते थे कि शिव इस बारे में किसी और से बात न करे नहीं तो दूसरे कवि नाराज़ हो जाएंगे।
पाँच सौ रुपयों में से शिव ने ढाई सौ रुपए टैक्सी के देने थे और शेष खर्च के लिए। शाम पाँच बजे वह टैक्सी ले कर आ पहुँचा। मुझे साथ लिया और टैक्सी भागने लगी।
शिव ने टैक्सी चालक से कहा, ‘सरदार जी, ज़रा इस कॉलोनी की तरफ गाड़ी घुमा दें। मुझे एक दोस्त से मिलना है।’
मैंने कहा – ‘पहले ही देर हो चुकी है।’
‘चिंता मत कर, दो मिनट ही तो मिलना है एक लड़की से। वह मेरी दोस्त है।’
टैक्सी कॉलोनी की सड़कों पर घूमती रही। शिव घर भूल गया था। न तो नंबर याद था, न गली। तीन-चार जगह टैक्सी रोक कर पूछा परंतु पता न चला। टैक्सी घूमकर मुड़ी तो नीम का एक पेड़ दिखा। शिव ने कहा, ‘बस यहीं रुकिए। यही है।’
टैक्सी से उतर कर उसने घंटी बजाई। एक युवती ने दरवाज़ा खोला। लंबे काले बाल, सुंदर नक्श।
शिव बोला, ‘थोड़ी देर के लिए आया हूँ। कहाँ है तेरा मियाँ ? ’
‘ड्यूटी पर गए हैं। कल लौटेंगे।’
‘अच्छा तो चाय पिलाओ मेरे दोस्त को। जानती हो न इन्हें ? ’
उसने मेरा परिचय करवाया।
वह चाय बनाने लगी। शिव जूतों सहित दीवान पर लेट गया।
मैंने इर्द-गिर्द नज़र डाली। दीवार पर एक बंदूक तथा कारतूसों की पेटी लटक रही थी। शायद किसी फौजी का घर था या वन विभाग के अधिकारी का। एक तरफ ऊंचे चमकते बूट।
वह चाय तथा बिस्कुट ले आई।
शिव ने कहा, ‘मैं चाय नहीं पीयूंगा। यह सिर्फ़ बलवंत के लिए है।’
वह आंगन में खेल रहे अपने बच्चे को ले आई। शिव ने उसके गालों को गुदगुदाया। फिर कहा – ‘मुझे मुशायरे में जल्दी पहुँचना है। तुम भी साथ चलो।’
उसने कहा – ‘मैं कैसे जा सकती हूँ। वे कल सुबह लौटेंगे।’ शिव ने लापरवाही से कहा- ‘कह देना शिव के साथ गई थी। तुझे वह कुछ नहीं कहेगा। अरे, शायर के साथ जा रही हो, किसी व्यापारी के साथ नहीं। चलो, जल्दी करो।’
यह कह कर शिव उठा और उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, ‘शिव…. बस मेरा नाम ले देना, यूं ही मत डरो। चलो, जल्दी करो।’
मैंने सोचा, यह क्या बकवास किए जा रहा है। यदि कहीं इसके पति को पता चल जाए तो इसी बंदूक से दोनों को उड़ा देगा। मैं भी बीच में मारा जाऊंगा।
परंतु मैंने देखा कि वह महिला बच्चे को पड़ोसन के पास संभाल आई और शिव के साथ चल पड़ी। मुझे यह दृश्य अब तक नहीं भूलता कि वह खुले बालों की चोटी करती हुई शिव के साथ बैठी थी और टैक्सी कपूरथले की ओर भागी जा रही थी।
वहाँ पहुंचे तो साढ़े नौ बज चुके थे और मुशायरा चल रहा था।
यह मुशायरा गुरु नानक देव जी के पाँच सौवे प्रकाश उत्सव के उपलक्ष्य में था। प्रिंसीपल ओ. पी. शर्मा ने धूमधाम से यह मुशायरा रचाया था। स्टेज के पीछे शराब की छबील लगी हुई थी। शिव तथा मुझे देखते ही दो-तीन कर्मचारी आगे बढ़े। स्वागती आलिंगन किए और व्हिस्की के गिलास पेश किए। शिव ने पाँच-सात घूंटों में गिलास ख़त्म किया।
हम भीतर स्टेज पर गए तो शिव को देख कर पूरे हॉल में खुशी की लहर दौड़ गई और तालियों से सारा वातावरण गूंज उठा। दो-चार लड़कों तथा लड़कियों की जोशीली आवाज़ें भी सुनाई दीं।
स्टेज पर पच्चीस-तीस शायर विराजमान थे। इन में प्रो। मोहन सिंह, मीशा, साधु सिंह हमदर्द तथा बलराम भी थे। पाँच-छह कवियों ने हमारी उपस्थिति में कविताएं पढ़ीं तो उनकी विषय-वस्तु कुछ इस प्रकार थी – ‘बाबा नानक अब तुम मत आना। यहाँ रिश्वतें, झगड़े, बंटवारे, रगड़े। तुम मत आना।’ या फिर – ‘बाबा तुम आकर देखे देश में कितना भ्रष्टाचार है। गरीबों पर जुल्म होता है। लोग नंगे, भूखे फिरते हैं। तू आकर देख।’
मोहन सिंह ने अपने महाकाव्य ‘ननकायण’ में से नज़्म पढ़ी जिसमें वह तलवंडी की शाम का वर्णन करता है। सारी नज़में शाम, नाम, काम, धाम आदि शब्दों से भरी पड़ी थीं। मुशायरे में थकावट थी, ख़यालों का बुढ़ापा।
शिव उठा तो सारे हॉल में बेचैनी दौड़ गई। उसने नज़्म पढ़ी, सफ़र।
आँखें बंद कर, तथा बाँह ऊंची कर उसने माइक्रोफोन के सामने गुनगुनाया। नशीले धीमे स्वर लरज़े और लोगों के दिल की धड़कन की तारों को किसी ने मिज़राब से छेड़ा।
अचानक उसकी आवाज़ ऊंचे स्वरों में गूंजी। वह नानक को चुनौती दे रहा था। एक शायर दूसरे शायर से मुख़ातिब था। वह नानक से कह रहा था, ‘देख तेरी कौम में कितना सफ़र किया है, तुझसे आगे। यह आज पहुंची है नाम से तलवार तक।’
नाम से तलवार तक के शब्द गूंजे तो जवानों के सीने में सचमुच समूची कौम के निमन-चेतन की लालसाएं जाग उठीं। पूरे हॉल में शिव गूंज रहा था। उसका कद बहुत ऊँचा लग रहा था और उसकी आवाज़ में पैगंबरों वाला ओज़ था। लोगों में सिहरन पैदा करने की शक्ति, उन्हें रुलाने, जगाने और आगे बढ़ाने की प्रेरणा।
हॉल में सन्नाटा था। बीच-बीच में हल्की सी आह निकलती थी। फिर जादूभरी मुग्धता। नज़्म ख़त्म हुई तो लड़कियों ने आवाज़ें दीं – ‘की पुच्छदे ओ, हाल फकीरां दा।’
शिव मु्स्कराया तथा नया मूड बनाने के लिए फिर से गुनगुनाया। नज़्म गाने लगा जो उसने सैंकड़ों बार गई थी और हर बार लोगों के दिल को छू गई थी । जब उसने ऊंचे स्वर में कहा –

तकदीर तां साडी सौकण सी
तदबीरां साथों न होईयां
न झंग छुटेया, न कन्न पाटे
झुंड लंग गिया, इंझ हीरां दा।’

हॉल में बैठे सभी लोग तड़प उठे। कॉलेज की लड़कियों के सीने में हूक उठी। वे हीरों का ही रूप थी। युवकों के सीने में साँपों ने डंक मारे क्योंकि वे सभी ऐसे रांझे थे जो कान नहीं पड़वा सके थे।
एक दर्द भरा माहौल छा गया। शिव तीन नज़में पढ़कर हटा तो कोई और शायर खड़ा न हो सका। समां टूट गया तथा मेला उजड़ गया।
शिव बाहर निकला तो उसने एक कर्मचारी से कहा- ‘कुत्तो, व्हिस्की क्या सिर्फ़ आते वक्त ही पिलानी थी ? गिलास लाओ।’
एक आदमी ने व्हिस्की का एक गिलास भर कर शिव को पकड़ाया और दूसरा मुझे। वहाँ एक मुंशी बैठा था जो शायरों को रुपए देकर रसीदें ले रहा था। उसने शिव को एक लिफ़ाफ़ा थमाया और रसीदी टिकट पर उसके दस्तखत ले लिए। शिव ने नोट गिने बिना ही लिफ़ाफ़ा जेब में डाल लिया।
हम तीनों बाहर निकले तो ओ. पी. शर्मा ने कहा कि डिनर की व्यवस्था उसके घर पर थी। सभी वहाँ चले गए।
शिव ने हामी भरी। हम इकट्ठे चल पड़े।
थोड़ी देर बाद मैंने देखा कि शिव अंधेरे में कहीं गुम हो गया था।
सुबह मैं गहरी नींद में सोया पड़ा था, जब शिव ने आकर मुझे जगाया, ‘उठो अब वापिस चलें चंडीगढ़। उसे भी रास्ते में छोड़ना है। हम टैक्सी में बैठे हैं जल्दी करो।’
मैं तैयार होकर बाहर आया तो शिव तथा वह महिला मेरा इंतज़ार कर रहे थे। टैक्सी वापिस दौड़ने लगी। उसी कॉलोनी में नीम के पेड़ के पास रुकी। शिव तथा उसकी दोस्त बाहर निकले। घर के सामने जीप खड़ी थी।
वह बोली, ‘वे आ गए हैं।’
शिव ने कहा, ‘चल अंदर चलें। बलवंत, तुम भी आ जाओ।’
मैंने अंदर जाने से इन्कार कर दिया। मुझे दीवार पर टंगी बंदूक याद आ रही थी, कारतूसों की पेटी तथा चमकते ऊँचे बूट। अभी ही कोई घटना घटने वाली थी।
शिव ने मुझे खींच कर कहा – ‘आ यार, दो मिनट लगेंगे।’
मैं दुविधा में था। इस पागल ने……
शिव की दोस्त आगे थी तथा हम दोनों पीछे। पता नहीं क्या होगा अब।
शिव ने अंदर घुसते ही मुस्करा कर कहा, ‘ले भाई संभाल अपनी बीवी। मैं ले गया था मुशायरे में।’
वह सुंदर सा युवक था। बोला – ‘आईए, बैठिए, चाय पीकर जाईएगा।’
शिव ने कहा, ‘हमें जल्दी में हैं। हम चलते हैं।’ उसने झूमते हुए उसका आलिंगन किया और फिर हम चंडीगढ़ के लिए रवाना हुए।
मैं शिव की बेबाक कशिश पर चकित था और महिला की दिलेरी पर।
शिव एक संकल्प था, सृजनात्मकता का प्रतीक, एक ऐसी शक्ति जो शारीरिक होते हुए भी आध्यात्मिक थी।

~बलवंत गार्गी की पुस्तक हसीन चेहरे से।


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