सुपरिचित कवि हरिओम राजौरिया की नई कविताएँ.


1. अंत

न्याय के पथ पर
रास्ते भर झूठ बोलते हुए ही वे आए
और सीधे मनोनीत हो गये
कैसा सुंदर शब्द है मनोनीत
इस सुंदर गति को
मनोनयन की प्रक्रिया के साथ ही
माननीय प्राप्त हुए

उन्होंने झूठ का ही पक्ष चुना
पक्ष के पक्ष में
बहुत सुंदर निर्णय दिया
बदले में पद बिरुद्ध पद पर
उनका मनोनयन हुआ

अंतरात्मा की पुकार का
भीतर से उठती आवाज़ का
किया जो अनुगमन
विधि के विधान से ही सब हुआ
भगवान जाने क्या हुआ
शायद
भगवान की इच्छा से ही अन्याय हुआ

ऊंचे ऊंचे ओहदों पर बैठे थे आतताई
ऊपर भी थे उससे ऊपर भी
बीच में भी
उसके नीचे भी
कहां नहीं थे ?

जल में , थल में , नभ में
कण – कण में थे व्याप्त
छल – छद्म से होता था आरम्भ
और विस्तार का तो
कहीं कोई अंत ही नहीं
विचारहीनता का फैला था साम्राज्य

इस तरह रहा नहीं था कहीं
न्याय और अन्याय का फर्क
तंत्र और जनतंत्र का
यहीं आकर
इस तरह होता था अंत ।

        

2. सरल सूत्र

वे अपराधी तो थे
पर किसी पंजी में उनके नाम
कुछ भी दर्ज नहीं था

वे कुछ भी दर्ज नहीं करते थे
वे सविधान से इतने ज़्यादा ऊपर उठे हुए थे
कि नीचे बहुत जगह खाली थी

अत्याचार के सरल सूत्र थे उनके पास
सत्ता की कुर्सी पर
उस्तरा लिए बैठे थे
ऐसे काटते कि
टांका लगाना भी मुश्किल हो जाता

बहुत सारे काम थे उनके पास
समुदायों के बीच घृणा फैलाना
वेरोजगार लड़कों को दंगाई बनाना
खुल्ला झूठ इस तरह बोलना
कि सुनकर सफेद झूठ भी 
शर्म से पानी पानी हो जाए

निसंकोच निरापराध नागरिकों को मारते हुए
इतने ज़्यादा ईश्वर वादी थे
कि हत्याएं और घर जलाने का काम भी
ईश्वर को साक्षी मानकर करते
वे संविधान की शपथ लेकर
झूठ बोलते हुए ही सत्ता में आए थे

वे संसार को मायारूप
और मनुष्य को
बहुत ही तुच्छ जीव मानते थे
स्त्री उनके लिए पहले से ही अपवित्र थी
घर जलने और तेजाब फेंकने की
कोई नई खबर सुनकर ही उन्हें नींद आती

लीला करना , नाना रूप धरना
झूठ के पहाड़ पर बैठकर मुस्कुराना
निरापराध को जेल भेजना
और हत्यारों को छुड़वाना
कानून से इस कलात्मकता के साथ खेलना
कि सब कुछ टूटकर भी
पवित्र न्याय साबुत बचा रहे
इतना विभ्रम और धुंध फैलाना
कि सच और झूठ का फ़र्क मिट जाए

वोट से ही आए थे
जनतंत्र की उंगली पकड़े हुए
कितने मासूम और भोले जान पड़ते
वे आ ही गए थे और अब कुर्सियों पर डटे
धीरे – धीरे अपेक्षित काम को अंजाम देते हुए
अपने काम में पूरी तरह रमा हो गए थे ।
                          

3. प्रश्न अभ्यास

दंगे पर कविता लिखिए
पुलिस की छूट की व्याख्या कीजिए
दंगाइयों के पांच प्रकार बताइए
भक्त से दंगाई होने की आशंका और
संभावनाओं पर विचार कीजिए
हिंसक समय का क्रमिक विकास लिखिए

बच्चों को घृणा करना कैसे सिखाएं
निर्लज्जता से झूठ बोलने की विधियां लिखिए
दंगों में जय बोलने के महत्व
और गालियों से आक्रमकता पैदा करने के
प्रयोग पर एक सारगर्भित टिप्पणी करो
चाचाजी पहले अंश कालीन दंगाई थे
उनके पूर्णकालिक दंगाई बनने की यात्रा का
विस्तार पूर्वक चित्रण कीजिए
दो दंगाई विचारकों के नाम बताइए
दंगे और नरसंहार में अंतर स्पष्ट कीजिए

मनुष्य होने की हानियां लिखिए
” दंगा होता नहीं है करवाया जाता है “
इस प्रचलित झूठ पर  निवंध लिखिए
पढ़ो और पढ़ने दो की जगह
लड़ो और लड़ने दो को रेखांकित कीजिए
दंगाइयों को कपड़ों से पहचानने का
सचित्र वर्णन कीजिए

एक प्रतिबद्ध दंगाई की प्राथमिकताएं बताइए
अग्निशमन यंत्र और देशी कट्टे का रेखाचित्र खींचिए
‘ आभासी भय और दंगा ‘
इस वाक्य की दंगों के संदर्भ में
विस्तार पूर्वक व्याख्या कीजिए
दंगों में प्रयुक्त हथियारों के प्रकार लिखिए
ईट फेंकते दंगाई का भाव चित्रण कीजिए

इस तरह के दंगा केन्द्रित प्रश्न अभ्यास से
अपने कुछ मौलिक प्रश्न तैयार कीजिए ।
                  
                              

4. मनोहर

मर ही तो रहा था धीरे-धीरे
अंततः मर ही गया

सुना कि नशा- पत्ता करता था
गांजा पीता होगा  ?
या पीता होगा टिकट ?
जब देखो पड़ा रहता निढाल
नीम के नीचे मिट्टी के चबूतरे पर

दुधमुंहे मनोहर को अकेला छोड़
माँ बह गई थी उफनती टकनेरी की नदी में
उसकी तो फिर लाश भी न मिली कभी
घास काटने वाली
मेहनत-मजूरी करने वाली  स्त्रियों को
कहाँ  तलाश करती है पुलिस

माँ के न रहने पर भी जी गया मनोहर
गलियों में तार से पहिया घुमाते-घुमाते
और भैंसों की पेंठ चराते – चराते
देखते ही देखते एक दिन बड़ा हो गया

पहले सुनने में आया कि मरने ही वाला है
फिर सुना एक दिन कि मर ही गया
बेकारी ने मार डाला होगा
या कर्ज के बोझ ने ?
चुप्पी ने या इकहरी सहनशीलता ने
ओलों ने , पाले ने या इल्लियों ने
कुछ भी कह पाना मुश्किल है
एक आंगन , दो पडेरू , तीन बच्चे
और नीम के अकेले एक पेड़ को छोड़
चलता बना अपनी गुमशुदा माँ के पास
दूर से लाश जैसा दिखाई पड़ता था
अन्ततः लाश में हो तब्दील हो गया

ठीक- ठीक कुछ पता न चला
आखिर हुआ तो हुआ क्या था उसे ?
मनोहर के जीवन-मरण का सवाल
भारत सरकार की चिंताओं में शामिल नहीं था
फिर भी सरकार के एक मंत्री ने
मंच से इतना ज़रूर कहा
कि देश में न जाने कितने मनोहर
नपुंसकता के चलते मर रहे हैं
किसानी करने वाले कुछ मनोहरों ने
प्रेम प्रसंगों के चलते भी आपनी जान  दी है

प्रकृति ने दिया सबको सुन्दर जीवन
फिर असमय कैसे छिन गया सुख चैन
जीवित बचे रहने का जतन
कहीं खबर भी न छपी
किसी कवि ने कविता तक न लिखी
जीवित रहते हर तरफ घना काला अंधेरा था
जीवन न रहा तो सब तरफ
सन्नाटे का एक घेरा था

प्रश्न बना रहा अनुत्तरित
कैसे मरा , क्यों कर मरा ?
किसलिए मर गया ?
कर्ज़ खाकर
अपने आप को मिटाकर
खांसकर – खकारकर
मरा तो किस तरह मरा
मनोहर होने के सामान्य सिद्धांत के तहत
तो नहीं ही मरा होगा मनोहर  ?

इन सिद्धांतकारों का
समाज के भीतर बन रहे
इन नए – नए समाजों का
कुछ करो ?
करो ! कुछ तो करो !
कि कोई मनोहर
मनोहर होने के चलते न मरे ।

5. मुक्ति का सपना

जो हिंसक थे नहीं बन सके
मां की कहानियों के पसंदीदा पात्र

चिड़ियों की , बंदरों की , सियारों की
राजा – रानी , पहाड़ , झरनों ,वनों , वनस्पतियों की
विविधताओं की , जन की , मन की , जीवन की
कैसी – कैसी कहानियाँ थीं  माँ के पास
कल्पनाओं के इतने बड़े संसार में
एक मामूली गौरैया सबसे चहेती थी
और बार-बार उपस्थित हो जाती
माँ की कहानियों में

घमण्डी हाथी की एक कहानी में
जब वह पेड़ के तने से खुजलाता पीठ
और पेड़ पर बने घौंसले में बैठे
चिड़िया के बच्चे भय से कांपते
और हिलते पेड़ के साथ-साथ
तब चिड़िया हाथी से लड़ने खड़ी हो जाती
उसके इस कृत्य पर उसे ललकारती
सुनने वाले सब खिलखिलाकर हंस पड़ते
जब अपनी जुगत से चिड़िया
जीत जाती इस लड़ाई को

जंगल के राजा शेर को
अपने पद – अनुरूप माँ की कहानियों में
कभी मिल नहीं सका यथोचित सम्मान
माँ के कल्पना संसार में काबुल के घोड़े थे
छप्पन प्रकार के व्यंजन खाते चापलूस थे
भय था , आशा थी , अंधकार और सपने भी थे
भीतर से डरे हुए शेरों और मतिमन्द राजाओं की
अनेक कहानियां थीं
मूर्ख राजा माँ की कहानियों से होते हुए
दर्ज हुए थे हमारी बाल स्मृति में
कौए उड़ाने वाली वहिष्कृत रानियां
हांफती – भागती लौंडियाँ और दासियाँ
और तमाम सताए हुए जन
जो कहानियों में अयोग्य राजा की प्रजा थे
सुरंगें , अटारियों , खोएं , खंदक , जलाशय          पता नहीं क्या क्या था कहानियों के
उस चमकदार और रहस्यमयी संसार में

ऐसा सुन्दर संसार था माँ की कहानियों में
जिसने डर से बाहर निकलना सिखाया
अनपढ़ माँ की कुछ कवितानुमा कहानियों में
चालक कौए के लिए गालियां थीं
और बड़बोली चुहिया के प्रति करुणा का भाव

आप पक्षियों के साथ गा सकते थे
उनके साथ-साथ उड़कर
छू सकते थे
पहाड़ों की ऊंची से ऊंची चोटियों को
कुछ देर के लिए
अपने डर को अभावों को भूल सकते थे
और मुक्ति का सपना भी देख सकते थे ।

                         –

 6. मै गायक बनना चाहता था

शुरू किया जो बेटे ने गाने का अभ्यास
मेरे भीतर भी कुछ बजने लगा
काश ! मैं भी गा पाता
ओंठों तक आकर
ठहर गए शब्द

तन-मन में सिहरन सी दौड़ गई
एक लहर सी आई
भिगो कर चली गई
शब्द रहित लय तैर गई स्मृति में
समय को ठेलकर
चालीस साल पीछे लौट गया
छन-छन कर सुनाई पड़ी
एक बूढ़ी स्त्री की बुझी हुई आवाज़
तनिक जलकर बुझ गई
हवा में हिलती
टाँड़ पर धरी चिमनी की लौ

सुन्दर स्वप्न की तरह था एक गान
जो अकेले हो जाने की असहायता
और भीड़ में खो जाने से बचाता था
जो भीतर रह-रह कर कुरेदता रहता
और बाहर आते ही
हवा में कहीं बिखर जाता
जिसे गा ही न पाया कभी ठीक से

कैसी बिडम्बना रही कि मुझे पता ही नहीं
मैं गायक बनना चाहता हूँ
न गला , न वैसा अभ्यास
न कोई बाजा ही मेरे पास
गायक हो जाने का भरम भी नहीं
आज बेटे ने गाया तो
गाने का भरम आया
एक सपना आया
और बगल कम्बल में आकर दुबक गया

कोई बनाना चाहता अगर
हो न हो मैँ भी बन गया होता गायक
उस समय में भी इस देश में
लोग बनाये जा रहे थे जाने क्या-क्या
कुछ जो गायक बनना चाह रहे थे
बाद में तोता ही बनकर रह गये
कुछ बनते-बनते लोगों को बनाना सीख गये
कुछ एक बार जो कौआ बने तो
फिर उससे आगे कुछ बन ही न सके

कोई व्यवस्था में फिट होकर कुछ  बन गया
कोई अव्यवस्थाओं की बजह से कुछ न बन सका
कोई बनते-बनते तनिक रह गया
कोई बनते-बनते पूरा ही बन गया
कोई अभावों से हारकर चुप बैठ गया
कोई अभावों से लड़कर कुछ बन गया
पर मैं न बन सका गायक

उन बहुत सारे लोगों की तरह मुझे भी
बिलकुल भी पता न था
कि मैं गायक भी हो सकता हूँ

निज गौरव के लिए नहीं थी
मुझमें गायक हो जाने की आकांक्षा
पहले यूं ही गाता था
गाता तो गाता ही चला जाता
कभी पिता की घुड़की रोक देती
कभी बहिनों की न रुकने वाली हंसी
कभी कनारी के मुंह से मुंह मिलाकर गाता
कभी दरबाजे पर देर तक
उंगलियों से तीन ताल बजाता
देर तक गणित का सवाल अधूरा छोड़
टेबल ठोक-ठोक कर चिल्लाता
पर गाना मेरा कभी
गाने जैसा तो नहीं ही हो पाता

आज बेटे ने जब गाया तो
एक गीत बर्फ़ की तरह
पिघलने लगा भीतर ही भीतर
और चालीस साल बाद आंख की कोर से
आंसू बनकर रिस गया ।
                              – हरिओम

7. लक्ष्मी

स्कूल तो चली ही जाना
पहले भजियन डारी कड़ी बनाओ
लाल धधकते दिये से
कड़ी में बघार लगाओ
फिर रोटियों की जेठ बनाओ
खाना परसो
जाओ ! थोड़ा नमक ले आओ
चूल्हे के पास धरी
दियासलाई उठा लाओ
हैंडपम्प से चार डिब्बा पानी भर दो
काम निपट जाए फिर जी भर कर पढो

अब किताबें धर दो , झाड़ू उठा लो
दाल बीनो , दूध जमा दो                             
डलिया भरी राख , घूरे पर फेंक आओ
देहरी पर बैठे कुत्ते को भगाओ
तुम्हारे होने से घर का होना है
सीना , पिरोना , लीपना , ढिग देना है
झटकारना , बुहारना ,फटकारना
छोटे भाई-बहिनों को पुचकारना
तेज धार में बहते चले जाना
कीक मारकर नहीं
धीरे-धीरे सुबकना
समय मिलते ही पाठ याद करना

दो-दो घरों में उजियारा जो करना है
रोना , झींकना , गिड़गिड़ाना है
मन की बात मन में छुपाना है
उपवास करके आरती गाना है
होम लगाकर टुनटुनी हिलाना है
एक सुकोमल सुंदर स्त्री
जैसे रंगीन केलेण्डर में
मंद-मंद मुस्काते


भगवान विष्णु के पैर दबाती है
और पैर दबाते – दबाते एक दिन
तस्बीर में तब्दील हो जाती है ।

      

सुपरिचित कवि हरिओम राजोरिया का जन्म 8 अगस्त , 1964 , अशोकनगर , मध्यप्रदेश हुआ. सृजनात्मक जीवन का आरम्भ सातवी कक्षा में रामलीला से अभिनय से हुआ। शुरूआत में रामलीला के लिए गीत लिखे. बाद में प्रगतिशील लेखक संघ और भारतीय जन नाट्य संघ ( इप्टा ) से गहरी सम्बद्धता । मध्यप्रदेश इप्टा के अध्यक्ष ।

अनेक भाषाओं में कविताओं के अनुवाद प्रकाशित
कविता , नाटक , संगीत और फ़िल्म में गहन रुचि । कविता की एक पुस्तिका और तीन कविता संग्रह प्रकाशित । इस email पते पर hariom.rajoria@gmail.com पर बात की जा सकती है

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