वसंत सकरगाए की ‘लापता हो रहे है पते वाले पेड़’ और अन्य कविताएँ.

1. ज़रुरत-
                             
तंग आ गया हूँ चाँद की इस बेज़ा हरकत से
आ कर मुँह ढेड़ा बनाना,फिर मुँह फूलाकर
जाकर कहीं छुप जाना
दो-दो हफ्ते

हर दफ़ा बस!एक ही गिला-शिकवा
कि उसे घेरे काली घटाएं महकती नहीं ज़रा

सोचता हूँ-
सर्द किसी रविवार की अलसांदी कोई सुबह
तुम बैठी हो नहाकर घर की छत पर
आँचल में फैलाकर
सूखा रही हो बाल अपने

Photo- kishan Meena (shivdas pura, Raj)

एक गुलेल बनाऊँ कुछ इस तरह
सनसनाती इस हवा का एक सिरा
बाँधू किसी पहाड़ से
दूसरे पहाड़ से सिरा दूसरा
खींचूँ रबर की तरह सायँ-सायँ हवा को
और कंकर की जगह रख दूँ चाँद को
फिर निशाना लगाऊँ इस तरह
कि चाँद गिरे जाकर तुम्हारे आँचल में

तुम समझ तो जाओगी ना!
यह जरुरत किस की है
मेरी या चाँद की।

2. ऊँचाइयाँ

ऊँचाइयों पर पहुँचने के लिए
कोई सीढ़ियाँ लेकर नहीं निकलता घर से

निरुपाय होते हुए खोजने होते हैं
सीढ़ियों के उपाय

कोई काँधे पर नहीं चढ़ाता चढ़ने के लिए
और टाँग खींचने की संस्कृति में
बहुत मशक्क़त रहती है टाँगें बचाने की

सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़ते हुए
सुनना बहुत ज़रूरी होता है
सीढ़ियों पर चल रही
आरी चलने की आवाज़

3. शरद का चाँद

जब तक इस धरती के तमाम अबोले बच्चों की
जिह्वा की धरती पर नहीं फूटेंगे शब्दों के अँकुर
नहीं खुलेंगे खुलकर जब तक
उनकी रिग-रिग झिक-झिक के वास्तविक अर्थ
अपनी व्यथा में कुंद अनमने बच्चें
रुठे रहेंगे.. रोते रहेंगे… मचलते रहेंगे
नहीं खाएंगे खाना

और जब तक इस धरती की तमाम माँएँ
गर्मागर्म रोटी की देह से उतारती रहेंगी पोपड़ी
कटोरी भर दूध में गुड़ शकर के संग
करती रहेंगी मिलौरी
मनाती रहेंगी..डराती रहेंगी बच्चों को झूठमूठ…
ना खाने पर
आसमान में उठाएंगी पहला निवाला तुम्हारी ओर…

कि जब तक और जोर से मचलते रहेंगे खीजे बच्चें
माँ का हाथ झपट निवाले वाला
खींचेंगे मुँह की ओर…

…कि एक दो निवाले रोते-रोते कुछ रालबाल के बाद
पहली हल्की डकार के साथ
अचानक हँसते रहेंगे यह देख सोचकर
कभी तुम्हें तो कभी माँ की ओर
इस खुशी में कि उनके हिस्से की दूध-रोटी
माँ ने सिर्फ दिखाई, खिलाई नहीं तुम्हें..
तो इस धरती के असंख्य बच्चों की देख दूध-रोटी
और पहले निवाले से हर बार वंचित
आता तो होगा तुम्हारे मुँह में भी पानी!

तो क्या छतों पर रखे दूध भरे वर्तनों में
तुम जो कर जाते हो शरद पूर्णिमा की रात
चुपके-चुपके
अमृत-वर्षा
कहीं रोकते-रोकते टपकी
वो लार तो नहीं तुम्हारी!

यह तो तय है कि जब तक
बच्चों की जिह्वा पर नहीं फूटेंगे
शब्दों के अंकुर
नहीं खुलेंगे खुलकर जब तक
उनकी अभिव्यक्ति के वास्तविक अर्थ
जब तक रहोगे पहले निवाले से तुम वंचित
करते रहोगे यूँ ही अमृत-वर्षा…

जीवन रहित तुम्हारी अपनी धरती पर
पता नहीं कितना मधुर तुम्हारा अपना जीवन
पर बच्चों से हरीभरी इस धरती पर
बनाए एक लड़ियाता रिश्ता
तुम सदा जीवित रहोगे
चंदा मामा!

4. मौसम की भाषा हैं फल

मौसम का ताज़ा हाल यह है
हमेशा की तरह हालाँकि वज़ह वही
कि दिल्ली की आँखों के सामने छाई हुई है गहरी धुंध
दृश्यता रत्तीभर बची नहीं
यूँ दिल्ली जन्मजात अँधी नहीं

उधर देश के शेष में
आँधियाँ उजाड़ चुकी है इतनाकुछ
सख़्त से सख़्त पत्थर भी हैं इतना गमज़दा
कि पिघले-पिघले हैं इन दिनों
(जैसा कि बयान आता है हर वक़्त)

लिहाजा यह अपील है लहज़ा लेकिन फरमान का
जो उछाला तो बिखरकर रह जाएँगे कतरा-कतरा
इसलिए फल लदे पेड़ों की तरफ
न उछाला जाए तड़पते पत्थरों को

विवशता का आलम यह है
कि घर-आँगन में लगे फलते पेड़ पर
कुछ ही रह गये हैं शेष
गुरबत की मारी एक माँ
जिन पर बाँध रही है फटे-पुराने कपड़े-लत्ते
कि किसी की बुरी नज़र न लगे

मौसम के इस बदचलन दौर में एक माँ
वास्तविक चलन एक लिहाज
और बचाना चाहती है फलों की याद
कि ताज़ा रहे हिचकियाँ
इसलिए एक माँ अब भी
मौसम की भाषा बचाना चाहती है

ये जो फल हैं-
भाषा हैं मौसम की।

5. लापता हो रहे हैं पते वाले पेड़

अब तो खैर,
घरों में होता नहीं पेड़ों का अता-पता
लेकिन कभी पेड़ भी होते थे हमारे घर का पता

पूछने वाले को बताया जाता था-
वो देख रहे हो ना!जामन का दरख़्त
उसी के साये तले रहते हैं
मियाँ वजाहत

फ़कत इसलिए होती थीं गलतफ़हमियाँ
डालचंद के घर लगा अमरुद का पेड़
छोड़कर अपनी जड़े अपना व़जूद
आकर छा जाता था पड़ोसी रामरतन के घर
और आनेवाला शख़्स ठीकठाक शिनाख़्त किए बगैर
धड़धड़ाता घुस आता था
डालचंद के बजाए रामरतन के घर
होते-होते दाख़िल-हाज़िर
चमेली और हरसिंगार की बारिश से तरबतर
खुश्बू और पुलक रंगों से भीग जाता था उसका मन

अब तो खैर,
अदद के दायरों में हैं हम और पते हमारे घर के
पेड़ भी कहाँ बख्शे गए हैं घने जंगलों के
उनके तन भी लिख दी जाती है जात की अदद
यानि नाम नहीं, शहर में जरूरी होता है घर का नम्बर
जंगल महकमे के रिकॉर्ड में पेड़ गिनतियों में हैं दर्ज़
कि आसान हो मृत-पेड़ की पहचान
जैसे ज़रूरी होता है निधन की दुःखद सूचना के साथ
कि नहीं रहे अमुक-अमुक नम्बर वाले फलाँ-फलाँ साहब

अब तो खैर ऐसा होता नहीं,
कहीं बीचोंबीच लगे नीम जामुन या पीपल के पास
हम जाते थे रास्ता बनाकर बाअदब़
उसी के ईर्दगिर्द धीरे-धीरे फूटते थे चौरस्ते
किसी रस्ते पर होता था हमारा घर
और घर में जैसे कोई बुजुर्ग
ऐसा होता था कोई घना शजर

कभी यूँ भी होता था हमारे घर का पता।

वसंत सकरगाए

बसंत सकरगाए का जन्म 2 फरवरी 1960(वसंत पंचमी) को हरसूद(अब जलमग्न) जिला खंडवा मध्यप्रदेश में हुआ।

पुरस्कार और सम्मान-

म.प्र. साहित्य अकादमी का दुष्यंत कुमार,मप्र साहित्य सम्मेलन का वागीश्वरी सम्मान,शिवना प्रकाशन अंतरराष्ट्रीय कविता सम्मान तथा अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन द्वारा साहित्यिक पत्रकारिता के लिए ‘संवादश्री सम्मान।


-बाल कविता-‘धूप की संदूक’ केरल राज्य के माध्यमिक कक्षाओं के पाठ्यक्रम में शामिल।
-दूसरे कविता-संग्रह ‘पखेरु जानते हैं’ की कविता-‘एक संदर्भ:भोपाल गैसकांड’ जैन संभाव्य विश्विलालय द्वारा स्नातक पाठ्यक्रम हेतु वर्ष 2020-24 चयनित।

– दो कविता-संग्रह-‘निगहबानी में फूल‘ और ‘पखेरु जानते      हैं’

संपर्क-ए/5 कमला नगर (कोटरा सुल्तानाबाद) भोपाल-462003
मोबाइल-9893074173/9977449467
ईमेल- vasantsakargaye@gmail.com

एक उत्तर दें

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s