कमल जीत चौधरी के साहित्यिक दोस्त: आंख,दांत और ब्लेड

साहित्यिक दोस्त
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मेरे दोस्त अपनी
उपस्थिति दर्ज करवाना चाहते हैं
वे गले में काठ की घंटियाँ बाँधते हैं
उन्हें आर पार देखने की आदत है
वे शीशे के घरों में रहते हैं

पत्थरों से डरते हैं
कांच की लड़कियों से प्रेम करते हैं

बम पर बैठकर
वे फूल पर कविताएँ लिखतें हैं

काव्य गोष्ठिओं में खूब हँसते हैं
शराबखानों में गम्भीर हो जाते हैं

यह भी उनकी कला है
अपनी मोम की जेबों में
वे आग रखते हैं।
००

आँख
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शिक्षा के कारखाने में
जहां मैं नौकरी करता हूँ
तीन घंटों के युद्ध हेतु
जूते बनाए जा रहे हैं
जूते जो रोज़गार तलाशते
सीढ़ियाँ चढ़ते
घिस जाएंगे
उधड़ जाएंगे
मरम्मत के अभाव में
सड़क बीच टूट जाएंगे
तलवों से छूट जाएंगे
वैसे भी दुनिया जूतों से साफ़ नहीं होती
मैं समझता हूँ
जूतों से कारगर है झाड़ू
झाड़ू से कारगर है पेड़
पेड़ से बेहतर है खिड़की
खिड़की से बेहतर है आँख
आँख –
जो मैली न हो
जिसमें मोतियाबिंद न हो
जो सोते महल
जागती झोपड़ी
बन्दूक की मक्खी
हल की हत्थी में फर्क जान सके
जो सूरज को पीठ पर लादकर
कमाई हुई रोटी
और मखमली चाँदनी तले हस्ताक्षर कर
लूटी हुई दौलत में
अंतर भेद सके
कारण छेद सके …
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Baran मूवी का एक दृश्य

आँख ही होगी
सबसे बड़ा हथियार
उस युद्ध के लिए
युद्ध जो पैरों के लिए लड़ा जाएगा
युद्ध जो परों के लिए लड़ा जाएगा
युद्ध जो मछली के लिए लड़ा जाएगा

युद्ध जो परों और पैरों का
बेपरों और बेपैरों से होगा –
युद्ध वह अंतिम और निर्णायक होगा
जो जूतों की जगह आँख बनाएगा
वही सच्चा नायक होगा।
००

दांत और ब्लेड
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दांत सिर्फ शेर और भेड़िए के ही नहीं होते
चूहे और गिलहरी के भी होते हैं
ब्लेड सिर्फ तुम्हारे पास ही नहीं हैं
मिस्त्री और नाई के पास भी हैं

तुम्हारे रक्तसने दांतों को देख
मैंने नमक खाना छोड़ दिया है
मैं दांतों का मुकाबला दांतों से करूँगा
तुम्हारे हाथों में ब्लेड देख
मेरे खून का लोहा खुरदरापन छोड़ चुका
मैं धार का मुकाबला धार से करूँगा

बोलो तो सही
तुम्हारी दहाड़ ममिया जाएगी
मैं दांत के साथ दांत बनकर
तुम्हारे मुंह में निकल चुका हूँ
डालो तो सही
अपनी जेब में हाथ
मैं अन्दर बैठा ब्लेड बन चुका हूँ।
००

पत्थर – १
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एक दिन हम
पक कर गिरेंगे
अपने अपने पेड़ से
अगर पत्थर से बच गए तो

एक दिन हम
बिना उछले किनारों से
बहेंगे पूरा
अपनी अपनी नदी से
अगर पत्थर से बच गए तो

एक दिन हम
दाल लगे कोर की तरह
काल की दाढ़ का स्वाद बनेंगे
अगर पत्थर से बच गए तो

एक दिन हम
कतबों पर लिखे जाएंगे
अपने अपने शब्दों से
अगर पत्थर पा गए तो।
००

नमक में आटा
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हमने कम समय में
बहुत बातें की
बहुत बातों में कम समय लिया

कम समय में
लम्बी यात्राएं की
लम्बी यात्राओं में कम समय लिया

कम समय में
बहुत समय लिया
बहुत समय में कम समय लिया

इस तरह हम
कम में ज्यादा
ज्यादा में कम होते गए
हमने होना था
आटे में नमक
मगर हम नमक में आटा होते गए।

सम्पर्क :-
कमल जीत चौधरी
काली बड़ी , साम्बा , { जे०&के० }
मेल – kamal.j.choudhary@gmail.com
मोबाइल – 9419274403

जम्मू उच्च शिक्षा विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत, कमल जीत चौधरी की कविताएं कथन, सदानीरा, मंतव्य, युद्धरत आम आदमी, अभिव्यक्ति, बया, हंस, नया ज्ञानोदय जैसे ब्लॉग और पत्रिका माध्यमों पर प्रकाशित हो चुकी हैं । 2016 में ‘अनुनाद सम्मान’ योजना के अंतर्गत ‘हिन्दी का नमक’ शीर्षक से उनका पहला कविता संग्रह ‘दख़ल प्रकाशन दिल्ली’ से प्रकाशित है। उनकी कुछ कविताओं का मराठी , उड़िया और बांग्ला में अनुवाद भी प्रकाशित हो चुका हैं

 

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