पिता प्रारब्ध होते हैं वे दरख़्त होते हैं, घर जिनकी आगोश में खेलता है| यतीश कुमार

पिता-1

पिता तुम उस पत्र की तरह हो
जिसकी लिपि मेरी समझ के बाहर थी
बचपन से इलेक्ट्रॉनिक सर्किट बोर्ड की तरह
तुम मुझे अबूझ अनजान मिले

जटिलता स्वभाव से निकल
आवाज़ में उभरती थी
और फिर अंतरिक्ष में उभर
वाणी बन गूँजती रहती थी

वो गूँज
मेरी स्मृति के कानों में
सों सों बज उठती है
और उन दिनों की ही तरह
आज भी मैं
अपने कान बंद कर लेता हूँ

पिता तुम चाँद थे मेरे लिए
जिसमें अमावस्या
नियति से ज़्यादा मिली थी
बहुत दूर दिखते थे तुम

पिता तुममें पुरुष बहुत ज़्यादा था
और स्त्री की मात्रा बहुत कम
और माँ पूरी की पूरी स्त्री थी
और यूँ वो तुम्हें ताउम्र पूजती रही

आज मैं भी पिता हूँ
और ख़ुद में तुम्हारी उपस्थिति
छानता और पृथक करता रहता हूँ
न्यूनतम तुम पर अब मेरी पहचान है

पिता – 2

पिता मेरे कंधे की
एक टहनी टूट गयी है
प्रौढ़ वृक्ष हूँ मैं अब
और मेरी घनी लदी शाखाओं में
कोई छिद्र तक नहीं दिखता
सूरज की महीन रोशनी भी
इसे भेद नहीं पाती

पिता मेरा लदा हुआ होना
मेरी स्थिति का द्योतक है
समय से ज़्यादा
स्वयं के भार में
तुम्हारे दबे होने का अहसास लिए
फलता फूलता हूँ मैं

आज अचानक चटकी टहनी में
तुम्हारी पीड़ा और जंग लगे दर्द
अपने हस्ताक्षर करते दिख रहे हैं

तुम्हारे धज़ को रेशा दर रेशा बिखरते
मूक देखता था कभी
और तुम्हारे आग़ोश से ही
अपनी स्वतंत्रता का उद्घोष
थाली पीट कर किया था मैंने
वैसे पिता! स्वतंत्रता का एक तमाचा
आज भी बाएँ गाल पर छपा है

पिता तुम्हारी टहनियों और पत्तों को
रोज़ गिरते झरते देखता था
वो पत्ते रोज़ गिर कर
मेरे पथ के काँटों को ढाँपते थे
मैं पत्तों को देखता था
पर काटों ने कभी
अपनी शक्ल नहीं दिखाई
आज जब तुम्हारे सारे पत्ते झर चुके हैं
तो पहली बार काँटे ने मुझे डसा है
और आज ही मेरे कंधे की
पहली टहनी चटकी है


पिता – 3

कंधा सरकता है बच्चे की ओर
जिसका सिर नींद में ऊँघता है
फिर वो बच्चा
और गहरी नींद लेता है

हाथ हाथ को ढूँढता है
मिलता है
फिर उसपर उठ कर रुक जाता है
जकड़ लेता है आलिंगन में

मेले में खोया बच्चा
बस अबाध ताकता है

नज़रें हमेशा सख़्त होती हैं
हर क़दम, हर हरकत पर निगहबान
दायरे में रखती हैं

घर के बाहर रहकर भी
लक्ष्मण रेखा पर टिकी
दहलीज़ पर रख छोड़ती हैं दो आँखे

हथेली
नन्ही अँजुरी को ढाँपती है
बेटी तन्हाई को अपना साथी बनाती है
किसी कोने को पकड़ना चाहती है

फिर रुक जाती है
किसी के स्पर्श की गर्माहट काम आती है

क़दम साथ चलते हैं
काँटे बुनते,रास्ता दिखाते
उन्हीं क़दमों के नख़्श में
रेत पर,बर्फ़ में संभलकर
नन्हें-नन्हें क़दम भी चलते हैं

दृश्यों से परे
एक और समानांतर दृश्य में
जिसमें पिता नदारद हैं


पिता-4

पिता प्रारब्ध होते हैं
वे दरख़्त होते हैं
घर जिनकी आगोश में खेलता है

वे कितनी बार टूटते हैं
कभी कच्चे,कभी पक्के
पिता पेड़ की तरह
टहनी दर टहनी जलावन बनते हैं

सांय-सांय जंगल की तरह
पिता जागते हैं रात भर
पीपल के प्रेत-सा भूख उल्टे पैर
पिता के विचारों में हिलता रहता है

अँतड़ी में जमा पित्त
कथरी-सा हृदय से लगातार रिसता
भूख का आँसू है

चेहरा पानी से नहीं
आँसू से धुलता है
दृश्य और धुँधला दिखाई पड़ता है

ऐसा कभी-कभी नहीं
अक्सर होता है

पिता के अबोले शब्द को
माँ की आँखे बोलती है
पिता के जलते शब्दों को
माँ के शब्द ढ़क देते हैं

कड़वी दवाई के ऊपर
एक चुटकी चीनी का आवरण है

दवाई अपना काम
युगों से कर रही है

पिता-5

ज्ञान की नदी पार करते वक़्त
पिता का कंधा पुल था
जो कभी नहीं झुका

माँ अंतर्ध्यान हो गई
तब पिता का एक डायना
अचानक टूट गया

पंडित ने गंधर्व पुराण पढ़ते हुए
चतुर्मुखी घी के दिए में
चार बतासे भी डाल दिये

घंटों दरवाजे पर
जलते घी की बाती
जलने के बाद भी
लौ जिंदा रही

उस दिन जाना
अंत में मीठे को भी
जलना ही होता है

यतीश कुमार हिंदी के महत्वपूर्ण युवा कवि है. पिछले वर्षो में सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में उनकी कविता पढ़ने को मिली है और पाठकों ने सराहा है. वे कोलकाता में रहते है. उनसे 8420637209 बात की सकती है.

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