मेरी चादर मेरा ये तकिया ग़ज़ल कहता है|ए.एफ.’नज़र’

1
जो अक्सर खोए-खोए अपने ही पैकर में रहते हैं
नई तहज़ीब के बच्चे हैं कम्प्यूटर में रहते हैं

बसाई जा रही हैं बस्तियाँ मंगल की धरती पर
हज़ारों लोग अब भी ख़्वाब के छप्पर में रहते हैं

हमें मालूम है इंसाफ इस ज़ालिम ज़माने का
यहाँ सच बोलने वाले फटी चादर में रहते हैं

किसी को भी सुकूँ हासिल नहीं इस दुनिया में आकर
ज़मीं सूरज सितारे चाँद सब चक्कर में रहते हैं

तुझे लेकर कोई उलझन नहीं तेरे सिवा लेकिन
न जाने कितने सौदे हैं जो मेरे सर में रहते हैं

2
हवाओं का चलन जब क़ातिलाना देखते हैं 
परिन्दे हसरतों से आशियाना देखते हैं

अभी तो दिख रहे हैं हर तरफ़ काँटों के मंज़र
लगेगा कब गुलों का शामियाना देखते हैं

उन्हें मालूम क्या परदे के पीछे की हक़ीक़त
वो टी.वी. की निगाहों से ज़माना देखते हैं

सितारों ने किसी मजदूर की क़िस्मत न बदली
ज़माने से हम इनका आना जाना देखते हैं

बुरी है लाख ये दुनिया तो हो अब फ़िक्र कैसी
यहाँ जब आ गये हैं कारख़ाना देखते हैं

बड़ा हंगामा देखा मौत का दुनिया में यारो
चलो जीने का अब कोई बहाना देखते हैं

3.
बेटे छत खिड़की दरवाज़े और घर की अँगनाई बिटिया
सारे रिश्ते फूल चमेली और भीनी पुरवाई बिटिया

क़तरा क़तरा मोती बनकर निकला आँखों की सीपी से
सात समन्दर सातों दरिया सीने में भर लाई बिटिया

मैंने इस एक झूठ को उससे जाने कितनी बार कहा है
तेरी चूड़ी के जैसी है दुनिया की गोलाई बिटिया

आँखों में आकाश को भरकर जब आँगन से विदा हुई
सूरज का जा कान मरोड़ा तारों में मुसकाई बिटिया

रोक न पाया अपने आँसू जब-जब उस तख़्ती को देखा
जिस नन्हे हाथों से तू लिखती थी आ-आ-ई बिटिया

कभी-कभी तो तीज त्योहारों पर तू आके मिल जाया कर
याद बहुत करती है तुझको तेरी चाची ताई बिटिया

अम्मा की कुछ फ़िक्र न करना अब उसकी तबीयत अच्छी है
राखी के दिन तुझको लेने आ जाएगा भाई बिटिया

4

अब भला कौन पड़ोसी की ख़बर रखता है
आज हर शख़्स सितारों पे नज़र रखता है

खूब पछताएगा यह गाँव से जाने वाला
हर नगर जलती हुई राहगुज़र रखता है

एक मुद्दत से न ली अपने बुजुर्गों की ख़बर
यूँ तो वो सारे ज़माने की ख़बर रखता है।

हक़परस्ती की हिमायत में वही बोलेगा
अपने सीने में जो पत्थर का जिगर रखता है

अपने मज़बूत इरादों को सदा क़ायम रख
चाँद छूने की तमन्ना तू अगर रखता है

5
चूल्हा चौका फ़ाइल बच्चे  दिनभर उलझी रहती है
वो घर में और दफ़्तर में अब  आधी आधी रहती है

मिल कर बैठें दुख सुख बाँटें  इतना हम को वक़्त कहाँ
दिन उगने से रात गये तक आपा-धापी रहती है

 जिस दिन से तक़रार हुई उन सियह गुलाबी होंठों में 
 दो कजरारी आँखों के संग छत भी जागी रहती है

जब से पछुआ पवनें घर में आना जाना आम हुईं
तुलसी मेरे आँगन की कुछ सहमी सहमी रहती है

क्या अब भी घुलती हैं रातें  चाँद परी की बातों में
क्या तेरे आँगन में अब भी बूढ़ी दादी रहती है

6

मेरी चादर मेरा ये तकिया ग़ज़ल कहता है
साथ जब होते हो तुम कमरा ग़ज़ल कहता है

फूल हो,ख़ार हो, शोला हो कि शबनम कोई
तेरे आग़ाोश में हर लम्हा ग़ज़ल कहता है

आपके हुस्न की तारीफ़ भला मैं क्या करूँ
देखकर आपको आईना ग़ज़ल कहता है

सैर के वास्ते तुम आने लगे हो जब से
पत्ता-पत्ता मेरे गुलशन का ग़ज़ल कहता है

जाने किस-किस की समाई है मुहब्बत इसमें
सैंकड़ों सालों से ये दरिया ग़ज़ल कहता है

हमको सुनने का सलीक़ा ही नहीं है वरना
उसकी कुदरत का हर इक ज़र्रा ग़ज़ल कहता है

परिचय-

ए.एफ.’नज़र’ उनका अदबी नाम और मूल नाम अशोक कुमार फुलवारिया है . वे पिपलाई (स.मा) राजस्थान से है. वर्तमान में शिक्षा विभाग में कार्यरत होकर अध्यापन कार्य मे सक्रिय है. पिछले एक दशक से आकाशवाणी सहित विभिन्न पत्रिकाओं में उनकी गजलें प्रकाशित हुई है. अशोक से 09649718589 पर बात की सकती है.

प्रकाशन–  “पहल’’ ग़ज़ल संग्रह(2012), ’’सहरा के फूल’’ ग़ज़ल संग्रह(2016),’’लोबान’’ग़ज़ल संग्रह(2018)              

            

            ,   

              

      

      

 

             

एक उत्तर दें

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s