त्रस्त एकांत में अनमने संगीत के बीच नितेश व्यास का बिखरता आत्म

1.सब कुछ बन्द
सब  कुछ बंद
Photo: Omesh
हमें बन्द रहने को कहा गया था घरों में

लेकिन किसी ने कहा था कि घर लौटने के लिए होते हैं

तो क्या हम सफ़र में थे
या डिब्बों में बन्द,
डिब्बा-बन्द सँस्कृति के पोषक- सँवाहक
हमें चाहिये थी हर चीज़ डिब्बे में सील बन्द
दूध,दही या फिर आटा
सब कुछ पाश्च्युरिकृत
पानी भी बोतल बन्द
हमारी साँसें भी अब बन्द थी हमारे सीनों में
जैसे किसी ने हमें भेज दिया हो पानी के जहाज़ पर लम्बी यात्रा हेतु
ना मिलने वाले किसी देश की खोज में
या कि बाहर से दिया गया यातनामय आत्मनिर्वासन
वायु में अब नहीं था बिलकुल भी प्रदूषण
बता रहे थे सरकारी यन्त्र
बाहर का आकाश तो स्वच्छ और साफ़ हो रहा था
लेकिन भीतर के आकाश की किसे परवाह थी,
बाहर के आकाश में पंछी उड़ रहे थे स्वच्छन्द
लेकिन भीतर ही भीतर
सारे पखेरू तड़प रहे थे
खुले आसमान को
तब किसी बच्चे ने
चुपके से छत पर ले जाकर
खोल दिया वो पिंजरा
जिसमें कैद थी उसकी
प्यारी सखि चिरैया ।
2-एक पखेरू
एक पखेरू
Photohraph – Omesh
कितनी सुन्दर कविता लिखता
एक पखेरू आसमान पर
कविता वह ऐसी लिपि में है
जैसे मोती सीपी में है
यति-गति-लय-ताल की मात्रा
युगों युगों से समता में है
छन्द-स्वच्छन्द अलंकृति-त्रिभुवन
रस-निष्पत्ति ममता में है
तृण जो लिया मातृभू से ऋण
और वारीधि से जो जलकण
उससे उऋण होने को आतुर
व्याकुलता व्याकुल है क्षण-क्षण
अपने पूर्वज खग-कवियों के
काव्य बसे हैं इन पंखों में
उषा-निशा और क्षुधा-तृषा के
गान बसे हैं इन कंठों में
कितनी सुन्दर कविता है यह
और कवि कितना सुन्दर है
सुन्दर-सुन्दरता रहने को
व्याकुल हर क्षण दशकंधर है।।
3.बिखरता आत्म
बिखरता आत्म
Photograph – Omesh
यत्र-तत्र बिखरे
स्वात्म को एकान्त में
बुहारता रहता हूं अपनी देह में
उन सारी जगहों से समेटने की कोशिश करता हूं
जहां जहां गयी है देह
इतने वर्षों में
वे स्थान तो फिर भी मेरे परिचित हैं
किन्तु मैं स्वयं अपरिचित सा
अपने आप से
भटकता
चला जाता हूं
दूर दूर फैले कितने आकाशों तक
उड़कर मनपाखी बन
तिनका तिनका
बुहार कर लाने को
पर इतने लम्बे मार्ग में
तिनका तिनका
छुटता जाता
फिर फिर
बिखरता जाता
आत्म।।
4-त्रस्त एकान्त
एकांत की तलाश
Photograph – Omesh
स्थानांन्तरण से त्रस्त एकान्त
खोजता है निश्चित ठौर
भीतर का कुछ
निकल भागना चाहता
नियत भार उठाने वाले कंधों
और निश्चित दूरी नापने वाले
लम्बे कदमों को छोड
दिन के हर टुकडे को बकरियों की तरह ठेल कर
रात के बाडे में यूँ धकेलना कि अब उनके मिमियानें की आवाज़ें
अवचेतन के गहरे खड्ड से बाहर न आने पाये
पानी छान कर पिया जाता
किन्तु एकान्त को छान
घूंट दो घूंट पीना भी
नहीं होता आसान
समय की छलनी मे से स्मृतियों के बारीक कण अनचाहे ही अटक जाते गले में और
एकान्त की सतत् प्रवाही नदी के बीच अनायास
उग आती
जनाकीर्ण नौकाऐं।।
——————————–
5-अनमना संगीत
अनमना संगीत
Photograph – Komal Rohit Jorwal
बारिश की बूंदों से
गायब था उनका शाश्वत् संगीत
तभी तो बादलों की गर्जनाएँ किसी बेताले मृदंग की थाप सी पड़ रही थी
दिशाओं के गालों पर
पक्षि-कुल
कोई मौन जुलूस निकालता हुआ सा गुज़र रहा था
हवा के विपरीत पंख फैलाए
तो क्या जो हो रहा था
वह प्रकृति का शोक था
अथवा
अत्याधुनिक होती सभ्यताओं पर
नियति का कोप था?
रचनाकार डॉ नितेश व्यास
संस्कृत और हिन्दी दोनों भाषाओं में समानाधिकार रखने वाले डॉ नितेश व्यास, वर्तमान में , जोधपुर में संस्कृत सहायक आचार्य पद पर कार्यरत हैं ।मधुमती,पोषम पा,किस्सा कोताही आदि पत्रिकाओं में कविताऐं इनकी प्रकाशित हैं। अथाई की तरफ इनको शुभकामनाएं ।
परिचय-
नाम-डा.नितेश व्यास

सहायक आचार्य,संस्कृत
महिला पी जी कॉलेज,जोधपुर
निवास-गज्जों की गली,पूरा मौहल्ला,जोधपुर
मो-9829831299,8209005283

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