बड़े शहर और हमारे पते|गिरीश शास्त्री

बड़े शहर

बड़े शहरों में जब भी कोई पूछे तुम कौन हो
उसे अपना नाम मत बताओ
ना ही अपने नाम का अर्थ।

बड़े शहरों में सब बिकता है

बड़े शहर चौबीस घंटे का बाज़ार होते हैं,
इसके अलावा और कुछ नहीं।


बड़े शहर किसी को जगह नहीं देते
वे भरे होते हैं खचाखच
ठीक जानवरों के बाड़े की तरह।

बड़े शहर बहुत छोटे होते हैं।


यह जानते हुए भी कि बड़े शहर कभी कुछ नहीं देते,
हम चले जाते थे हफ़्ते में एक बार।

हम शहरों से बाहर के लोग थे
जो पूरी तैयारी के साथ जाते थे
और बस एक तरफा सौदा करके लौट आते थे।


हम और हमारे पते

इस देश को बनाने वाले तुम हो
तुम ही हो राष्ट्र के कर्णधार
बरसों से हमें यही कहा गया
हालाँकि
हम राजधानियों में नहीं रहते थे
हमें बाज़ार भाव से कोई मतलब नहीं था

हम तो झुग्गी झोपड़ियों वाले लोग थे
जिनके स्थाई पतों पर डाक नहीं पहुँंचती थी।


अख़बार में दुर्घटनाओं की ख़बर हम सबसे पहले बाँचते थे
इस उम्मीद में कि पता नहीं कौनसी ख़बर हमें काम दे दे।

हम ज्यादा नहीं सोचते थे
हम ज्यादा नहीं बोलते थे
अधिकार हमारे लिए कल्पित थे

हम बस काम करना जानते थे।

Photo: Omesh


कल-कारखानों की चिमनियों में हमारा बहुत कुछ खप गया था
हमारे हाथ कठोर थे लेकिन मन कोमल था
हम भावनाओं के बंधक थे
जो यह जान गये थे
सिक्का हमारे ही हाथों में है
और अब इसे हासिल करने के लिए
धन्ना सेठों को हमारे पास आना होगा
अब बात हमारे पतों पर होगी
हाँ वही पते
जिन्हें हम पोस्ट-बॉक्स नम्बर से बताते थे।


गिरीश शास्त्री बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ से जर्नलिज्म व मास कम्यूनिकेशन में पीएचडी स्कॉलर है. वे नयी नस्ल के युवा कवि है. वे मूलतः तलावगांव, दौसा (राजस्थान) से है. गिरीश से – girishshastri1@gmail.com मो. – 9461858766 पर बात की जा सकती है.

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