बिंदिया|नितिन यादव

आज उसने कई दिनों बाद यादों की गुल्लक खोली। गुल्लक खोली थी नई स्मृतियों की कतरन संजोने के लिए। स्मृतियां इस सरकारी क्वार्टर की , जो दो साल तक उसका घर रहा था।

शादी के दो सालों में उसने कितनी कोशिश की थी इस क्वार्टर को घर बनाने की। लेकिन आज जब सारा सामान पैक हो गया तो निस्तब्ध और वीरान खड़ा यह मकान अचानक से उसके सामने फिर से घर से क्वार्टर में तब्दील हो गया। क्या सामान ही इसे क्वार्टर से घर बनाता था ? उसे लगा, नहीं इस मकान से जो गायब हुआ है वह सामान नहीं , उसकी भावनाएं और सपने हैं जो इस क्वार्टर में से खिसक कर उसके मन के किसी कोने में समा गए हैं।

तभी उसको अपने पति राकेश की आवाज दूर से कहीं आती सुनाई दी “जल्दी करो, ट्रक वाले का फोन आया है वह पांच मिनट में आता ही होगा । एक बार फिर से देख लो कहीं कुछ सामान छूट तो नहीं गया है।” उसने राकेश की तरफ गौर से देखा वह सामान्य था। उसके लिए ट्रांसफर एक सामान्य और मामूली घटना थी। उसे लगा वह राकेश को नहीं समझा पाएगी कि उसका जो यहां छूट गया है वह सामान नहीं कुछ और है और उस और को वह समेट कर नहीं ले जा पाएगी। जब उसने क्वार्टर का कोना-कोना छान मारा इस डर से कि कहीं  कोई सामान छूट ना जाए। तब अचानक उसे याद आया कि उसे एक बार बाथरूम को भी देख लेना चाहिए। वीरान बाथरूम में जैसे ही उसने लाइट का स्विच ऑन किया तो उसे लगा कि उसके अंदर का खालीपन जैसे उस बाथरूम में आकर फैल गया हो।

Photo: Omesh

अचानक से ही उसकी निगाह बाथरूम की दीवार की तरफ गई, जहां अनेक अलग-अलग रंगों की बिंदिया उसकी ओर ताक रही थी। यह वे बिंदियाँ थी, जो उसने अक्सर नहाने से पहले इस दीवार पर चिपका दी थीं। उसने हाथ से अनेक रंगों की छोटी बड़ी बिंदियों को छुआ। छूते हुए उसे लगा उसकी कितनी अलग-अलग यादें ये बिंदिया समेटे हुए हैं।

उदास शामों से लेकर खिलखिलाती सुबह और बेचैन दोपहरों तक का रोजनामचा इन बिंदियों में दर्ज है। नीम अंधेरे और  ऊंघते सन्नाटे में, यह सब बिंदियाँ जब आपस में बात करती होंगी, तो क्या बतियाती होंगी ? उसे याद आया जब वह इस मकान में शिफ्ट हुई थी, तब भी इस बाथरूम में कई बिंदिया चिपकी हुई थी। उन बिंदियों को देखकर उसने इस मकान में रहने वाली उस स्त्री के बारे में ना जाने कैसी-कैसी कल्पना की थी। वह  स्त्री  उन  बिंदियों से की गई कल्पना से कितना अलग होगी? क्या इस क्वार्टर में आने वाली नई स्त्री भी इन बिंदियों को देख कल्पना में उसका कोई चित्र बनाएगी? वह चित्र मुझसे कितना दूर और कितना पास होगा! क्या कभी राकेश ने भी एकांत के क्षणों में इन बिंदियों को गौर से देखा होगा?

इतने में राकेश की आवाज आयी “कुछ मिला क्या ? ट्रक वाला आ गया है ,मैं सामान रखवाता हूं।” बाथरूम से निकलते हुए उसने सुस्ताती हुई रसोई में झांका। बाथरूम और रसोई यह दो ही तो इस घर के कोने थे , जहां निजी एकांत में वह लंबा वक्त गुजारती थी।

रसोई की स्लैब के पास की टाइल पर बने खाने के धब्बे उसे अपनी बनाई हुई किसी कलाकृति से लगे। क्वार्टर से बाहर आकर उसे लगा बिल्कुल एक जैसे दिखने वाले इन सरकारी क्वार्टरों में कितने विविध रंगों के जीवन सांस लेते हैं और साथ ही अलग-अलग रंगों व आकार की बिंदिया भी इन घरों के बाथरूम में पलके झपकाती हैं । बिंदियों की छाया ने उसे अपने आगोश में ले लिया था।

अचानक उसे याद आयी अपने कॉलेज की सुनीता मैम जो विवाहित होने के बावजूद बिंदी नहीं लगाती थी। सुनीता मैम को देखने वाली आंखों में न जाने उसने कितने प्रश्न चिन्ह देखे थे। अनगिनत मूक सवाल सुनीता मैम के आसपास तैरते रहते थे। बिंदी एक प्रतीक चिन्ह ही तो है। सुनीता मैम एक प्रतीक से बाहर आ गई। लेकिन कस्बे की दुनिया ने उन्हें ही प्रतीक बना दिया, एक उच्छृंखल महिला का।

इन सायास, अनायास प्रतीकों की दुनिया से घिरी स्त्री, इन प्रतीकों से दूर जाकर क्या वास्तव में एक आजाद सांस ले पाती है। भेष बदलकर ये प्रतीक कितनी दूर तक उसका पीछा करते हैं । उसे अपनी माँ की पार्थिव देह की याद आई। एक मृत सुहागन स्त्री की  बिना साँसों की देह से चिपकी एक आखिरी उदास बिंदी।

ट्रक में सामान रवाना हो चुका था। राकेश ने गाड़ी का हॉर्न बजाकर कर उसे बैठने का इशारा किया। उसने आखिरी बार उस क्वार्टर को देखा जिसे लोग जी-फाइव कहते थे और जो कल रात तक उसका घर था ।


नितिन यादव युवा रचनाकार हैं , इनकी कहानियां विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में छपी है। फिलहाल जयपुर में रहते है। रचनाकार से 9462231516 फोन नं पर बात की जा सकती है।

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