शहतूत आ गए है| शचीन्द्र आर्य

वक़्त की क़ैद में


इससे ज़ादा यह हमें और क्या करेंगे? हम सब वक़्त पर काम करने के लिए ख़ुद को तैयार करते रहते हैं। तय वक़्त एक अजीब क़िस्म की संरचना है। जिसके बाहर हम कुछ भी नहीं हैं। ऐसा ढ़ांचा जिसमें सब समा जाता है। उमर इसी तरह कितने बंद खाँचों में हमें कैद कर लेती है। सब कुछ वक़्त के उस दायरे में सिमट कर रह जाता है। जिसमें हम कहने न कहने के बीच में हमेशा झूलते रहते हैं। मैं जो भी कहना चाहता हूँ, वह शायद इसके पीछे कहीं छिप जाये। पर जो सामने भी होगा, वह भी कम ज़रूरी बात नहीं होगी। मौसम ने शायद यही सीमा कहीं पीछे छोड़ दी है। वह भी मनमर्ज़ी करने लगा है। उसका ऐसा करना हमें हरकत लगता है। अपनी ज़िम्मेदारियों से भाग लेने के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण तर्क है।



जब हमने अपनी सीमाओं को तोड़ दिया, तब मौसम या पेड़ या मिट्टी, दिवार, कोटर में कहीं उग जाने वाले पौधे के लिए यह क्यों मायने रखे? हमारे लिए मायने रखता है, वक़्त पर पानी का आ जाना। इसतरह हम हमेशा तयशुदा चीज़ों के लिए ख़ुद को तैयार करने में लग जाते हैं। हम सोचते हैं, कुछ भी इसके बाहर नहीं है। यही हमारी सबसे बड़ी हार है। लेकिन अगर हम ऐसे हैं, तब यह दुनिया हमने नहीं बनायीं। यह दुनिया उन्होंने बनायीं, जो ख़ुद को इस वक़्त के दायरे से बाहर ले जा पाये।

हम शायद यही बात भूल गए हैं। किसी को याद आ जाये और कोई कुछ कर ले, इसीलिए इसे यहाँ याद कर दोबारा लिख दिया। शहर ऐसे ही ठहर गए हैं। उमर की तरह। हमारी तरह। वक़्त की तरह।
**

केले का छिलका और खिड़की


केले के छिलके को खिड़की से फेंकते हुए, ख़ुद केले का छिलका होने की इच्छा से भर जाना, कहीं से कूदने की तमन्ना का फिर से जन्म लेना नहीं है। यह ऊँचाई से कूदने के अधूरे सपने का प्रतिफलन भी नहीं है। तब प्रश्न उठता है, यह क्या है? शायद इस खिड़की से हवा में नीचे जाते हुए केले के छिलके के साथ उस भाव से भर जाने का ख़याल है, जिसमें एक मंज़िल से नीचे आते वक़्त वह छिलका किन भावों से घिर जाता होगा? उसे नीचे आते हुए कोई चोट लगती है, उसका एहसास बस उस आवाज़ से लग पाता है, जो उसके ज़मीन से टकराने के बाद आती है। हम सब भी इसी तरह कहीं-न-कहीं से टकराते हुए आवाज़ करना चाहते होंगे। यह आवाज़ की संरचना में ख़ुद बख़ुद कहने की ताकत की तरफ़ इशारा ही नहीं, कहीं सुने जाने की ख़्वाहिश भी है। आवाज़ किन्हीं ध्वनियों के एक साथ निकलने की परिघटना है। जो बार-बार उसी तरह घटित होगी, जब-जब हम उस छिलके को इस खिड़की से नीचे फेंकते रहेंगे।

एक दिन होगा, जब यह आवाज़ दब जाएगी। खिड़की दीवार में न रहकर रेलगाड़ी की दीवार में चिपक जाएगी। तब उसकी ध्वनि की सघनता भले इस एक मंज़िला इमारत से गिरते हुए, उसके मन में बनती भावुक रक्त संचार प्रणाली के अनुपात में बिलकुल बराबर हो, पर उसकी तीव्रता में स्थिरता का अभाव उसे ढक लेगा।चलती हुई रेलगाड़ी कहीं भी स्थिर भूमि का निर्माण नहीं करती। वह पटरियों पर दौड़ते हुए लगतार एक नयी ज़मीन पर स्थगित अवकाश की तरफ़ बढ़ती जाती है। जब हम गति में होते हैं, तब हमारी सुनने की शक्ति उन ध्वनियों में इतनी ही तीव्र गति से वर्गीकरण नहीं कर पाती। हम तब असल में सुन भी नहीं पाते हैं।

जिन्हें यह अभिधा समझने में कठिनाई हो रही है, उनके लिए थोड़ा सरल करते चलते हैं। यह स्थिर ज़मीन, जिसके लगभग एक मंज़िल ऊपर एक रुकी हुई खिड़की, मेरे कमरे का अवकाश है, जिसका उपभोग करते हुए मैं इन पंक्तियों को रच रहा होता हूँ। जब मैं इस कमरे के बाहर होता हूँ, तो लगातार मेरे पैरों के घर्षण से वह स्थिर जमीन पीछे छूटती जाती है। तब ख़ुद को इस तरह महसूस करता हूँ कि उन सारी घटनाओं को देखने के लिए मेरे पास जो खिड़की है, उसमें कई घटनाएँ एकसाथ घट रही हैं और उनकी सघनता, तीव्रता, ताप आदि को पकड़ पाने, वहाँ ठहरे रहने का अवसर मुझे यह अवकाश नहीं देता कि उन्हें यहाँ कमरे में लाकर दोबारा केले की तरह खा सकूँ और उसके छिलके को नीचे फेंकते हुए उसके अंदर की ध्वनि को इन कमज़ोर जिद्दी कानों से सुन सकूँ। अब थोड़ा लग रहा है, थोड़ा तो समझ आया होगा। नहीं आया, तब भी मैं कुछ नहीं कर सकता।
**

किसी ओट से


हर तस्वीर ठहरे हुए वक़्त की एक कोशिश है। वक़्त को पकड़ने की जद्दोजहद में हम कहीं वक़्त की गिरफ़्त में ऐसे जकड़ गए कि उससे बाहर कभी देख ही नहीं पाये। वह घड़ी मेट्रो स्टेशन पर लगातार असमान गति से चलते हुए भी ‘अंडर मेंटेनेंस’ हो सकती थी और उसके भागने पर भी वक़्त को कोई फरक नहीं पड़ने वाला था। वह रुक जाती तब क्या होता(?) इसकी कल्पना कोई नहीं करता। क्या वक़्त सचमुच घड़ी के बाहर नहीं है? पता नहीं। पता नहीं यह क्या है, जिसे समझ नहीं पा रहा। समझना एक तरह की सहूलियत में पहुँच जाना है। यही समझना नहीं हो पा रहा इधर। इधर नहीं हो पा रहा कुछ भी। कुछ भी नहीं। मैं वहीं आते-जाते लोगों के बीच कहीं कोने में खड़ा उन सुइयों के बीच घूमते वक़्त को देखता रहा। मेरे एकांत के उन क्षणों को किसी ने छुआ तक नहीं। मैं खड़ा भी कितनी देर तक रह सकता था। यह नहीं सोचा। बस खड़ा रहा। चुपके से। वहीं। एकदम अकेले।

वहीं खड़े-खड़े यह बात दिमाग में घूमती रही। हम एक अक्षांश पर झुकी पृथ्वी को कभी घूमता हुआ महसूस नहीं करते। भूगोल जैसा विषय इतना व्यावहारिक होते हुए भी कभी समझ नहीं आता। हमने उसे विषय में तब्दील करने के साथ विदिशा से गुजरती कर्क रेखा जितना अदृश्य कर दिया। हमने मान लिया, वह दिख भी नहीं रही इसलिए है भी नहीं। मानना कितना आसान है, अपनी दुनिया को रचने, उसे बनाने के लिए। शायद यही पहली शर्त है, जिसके बाद सब गढ़ा जाता है। यह गढ़ना हमारी सीमाओं के भीतर बनती अजीब सी दुनिया का नक्शा है। जिसमें हमारे तय करने के बाद भी कितना कुछ बचा रह जाता है। बचना हमारे लिए बहाना भी है। हम यहीं अंधविश्वास गढ़ते हैं। रोज़ सुबह सूरज की किरणें हमारी धरती की तरफ़ आने के लिए न जाने कितने प्रकाश वर्ष का फासला हर पल तय करती होंगी। वह सिर्फ़ हम तक नहीं आ रहीं, पूरे ब्रह्मांड में न जाने कहाँ-कहाँ उसकी किरणें रौशनी बनकर जाती होंगी। कभी मेरे बूते में हुआ और अपनी इस पृथ्वी को अन्तरिक्ष से देख सका, तब सूरज को उगते हुए देखुंगा। देखुंगा उन साढ़े आठ मिनटों में सूर्य की किरणें किस तरह हमारे ग्रह तक आती हैं? वह कैसे अँधेरे को चीरती हुई लगातार रौशनी, हवा, जगह इत्यादि से घर्षण करती हुई हम तक पहुँचती होंगी?

मुझे पता है, मैं इन पंक्तियों में इस दृश्य को बिलकुल भी वैसा नहीं लिख सका, जितना इसे अपने अंदर महसूस करता रहा। मैं भी रात घास पर पड़ी ओस की बूंद होकर उस इन्द्रधनुष के अपने अंदर बनने की प्रतीक्षा में न जाने किन-किन ख़यालों से भर जाऊँगा। भर जाऊँगा उन खाली क्षणों से और थाम लुंगा उन पलों को। यह पलों को कैद करने की पहली कोशिश होगी। वैसे हम सब इन गिनतियों से कुछ देर के लिए भाग लेना चाहते हैं। जब हम सोते हैं, तब भी यह पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती हुई हमें कितने प्रकाश वर्ष की गति से हमें अपने छोटे से कैलेंडर से कितना आगे ले जाती होगी। लेकिन हम ढीठ हैं।

हम यहीं बिस्तर पर करवट लेते-लेते अपने दरवाजे को उसी दिशा में पाना चाहते हैं, जहाँ सोने से पहले उसे छोड़ा था। कितना अच्छा होता न जब-जब हम उठते, तब-तब हमारी खिड़की, दरवाज़े, सड़कें, घर सब एकदूसरे में घुलमिल जाते। दिशा का एकाधिकार टूट जाता। सूरज को भी रोज याद नहीं रखना पड़ता। उसको कितनी आसानी होती। पर हम लोग समझते नहीं है। हम सबका दिमाग एक बिन्दु पर आने के बाद काम करना बंद कर चुका है, लेकिन हम मानना ही नहीं चाहते। हम जिद्दी हैं, पर उससे जादा डरपोक हैं। हम डरते हैं। क्योंकि हमने कुछ किताबें लिख दी हैं और उनके पलटने से डरने लगे हैं। यह डर ही है, हम कुछ भी सोचने के लिए तय्यार नहीं हैं।
**

राकेश २०११
पता नहीं कबसे तुम्हारी तरह होना चाहता हूँ, पर सचमें हो नहीं पाता. तुम दिल्ली से गए तो पर दिल में और गहरे बैठ गए. यह जो तुम्हारी तरह होना है, बहुत अजीब सा है. क्या है तुममें जो ख़ुद में देख पाता? शायद सपनों को देखने की शिद्दत वह बात होगी. कुछ-कुछ जो सोचते हो, उसे उतनी ही साफ़गोई से कह जाने वाले राकेश की तरह कभी नहीं हो पाऊं, पर कोशिश हमेशा करता रहूँगा. पर इसबार तुम मेरी बात मान जाओ. यह जो तुम लिखने से भागते रहते हो, अब थोड़ा थम जाओ. थोड़ा ठहर कर सोचो. लिखने से कुछ भी नहीं टूटेगा. और जो अन्दर टूट रहा है, उसका सामना किये बिना नया कैसे बन सकता है? कभी समझ नहीं पाया.

तुम कभी-कभी मेरी यादों में वही पुराने वाले राकेश की तरह दिख आते हो, तो अच्छा लगता है. मैं भी ख़ुद को पुराने वाले लबादे में पसंद तो क्या ख़ाक करता रहा होऊँगा पर उसे मिस ज़रूर करता हूँ. हमारी दोस्ती उसी पुरानेपन में कई बार जाकर वापस ख़ुद को टटोलती होगी तो कैसा लगता होगा? पता नहीं. तुम्हारा दिल्ली से जाना पता नहीं कैसा कर गया. इतनी बाद तो ऐसा साथी मिला था, जिससे अपने मन की कोई भी बात कह सकता था.

तब से तुम्हें देख रहा हूँ. अन्दर सिमटते हुए. मैं भी इधर तुम्हारी तरह होता गया. कुछ कछुए की तरह. कुछ घोंघे की तरह. पर मैं लिख देता, तुम कुछ नहीं कहते. कैसे चला लेते हो, यह न कहना? इस सालगिरह पर थोड़ा लिखने लगोगे तो हम भी कुछ बेहतरीन हिस्से पढ़ लेंगे. सोचना. मिनट भर ही सही, पर सोचना. और तब बिन सोचे लिखना.
**

मन मेरा
क्या लिखने के लिए सोचना ज़रूरी है? यह प्रश्न जितना सीधा है, इसके जवाब उतने ही घुमावदार हो सकते हैं. मैं इससे शुरुवात क्यों कर रहा हूँ? शायद ऐसे ही शुरू करने के लिए. कहीं से तो शुरू होना ही है, यहीं से सही. पर ऐसी बात नहीं है. जब इन पंक्तियों को लिख रहा हूँ, तब मेरे मन में वह बात घूम रही है, जब मैं कह रहा था कि लगता है, वैसा नहीं लिख पा रहा, जैसा लिख सकता हूँ. यह कब और कैसे तय हुआ होगा कि जो अभी तक लिखा है, वह वैसा नहीं है जैसा अभी तक नहीं लिखा गया है. एक के होने और एक के न होने पर ऐसी स्थिति आश्चर्यजनक स्थिति है. एक है, जिसे देख रहे हैं. पर कह रहे हैं कि यह वह नहीं है, जैसा लिखा जा सकता था. एक कहीं नहीं है. वह शायद जेब में, बगल में दबाये छाते, गले में लपेटे मफ़लर में कहीं छुपा होगा. पर उसकी निशानदेही न होने पर भी उसकी कल्पना कर अभी लिखे जा रहे को कमतर कहना कैसा होता होगा? होने से न होने तक पहुँचना शायद कहीं लेकर न जा पाए. दिमाग ऐसे ही कसरत करता रहे. पर क्या करें, यह काम भी किसी को तो करना था. हम ही इसे अपने जिम्मे ले लेते हैं. किसी को अपनी तरह इसमें फँसने के बाद दूर से देखने से बेहतर है, ख़ुद फँस जाना.

हम फँसेंगे, हमारे पास वक़्त है, उसके पास शायद यह वक़्त ही न हो. तब? अगरचे, यह जो भी है, इसमें ख़ुद की सीमाओं को जान लेने के बाद की बैचैनी जैसा भाव ज़रूर होगा. हो सकता है, कहीं उन बातों के न होने का क्षोभ दुःख बनकर ,आसपास बादलों की तरह मँडराने लगा होगा. क्या यह हर लिखने वाले के साथ होता है? कह नहीं सकते. पर इसका होना लिखने में गुणात्मक परिवर्तन का कारण बनेगा से पहले उधेड़बुन का सबब ज़रूर हो जाता होगा.

नहीं होता होगा, तब उसने लिखना शुरू किया होगा, कहना नहीं. कागज़ पर कहना एकदम छूटा हुआ है. लिखने का जो मन इन उँगलियों से होता रहता है, वह हाथ से लिखने का नहीं हो रहा. ऐसा भी क्यों हुआ, इसके भी कई ग़ैरज़रूरी कारण रहे होंगे. इनकी तह में जाने से पहले ज़रूरी है, वह बात जो वहाँ लिखी जा रही. इसे कथ्य कहा जाता है शायद. जिसे कहा गया है. जिसे वहाँ कहना है. यहाँ नहीं कहना है. अगर कहना भी है, तब उसकी भाषा क्या होगी, इस पर भी घण्टों बात हो सकती है. पर मैंने देखा है, अगर किसी दिन लिखने बैठ गया, तब पूरा का पूरा दिन बिता दूंगा. घण्टों यहीं लैपटॉप के सामने तस्वीरें देखते हुए उनकी तासीर में शब्दों के मानी भरते हुए, घड़ी की तरफ़ नज़र नहीं उठाउँगा.

इन सबके बाद भी क्या है, जो कहीं दूसरी तरफ़ खींच रहा है. क्या है, जो अभी तक नहीं लिखा गया है. एक लेखक होने के नाते यह सोचना ज़रूरी है. हो सकता है, कहीं कोई एक पंक्ति लिख कर रख दी हो, उसके ब्यौरे नहीं कहे गए हों. ज़रूरी है, उस नज़र का होना, जो सब कहलवा दे. मन होना दूसरी बात है और नज़र में आना दूसरी. देखते हैं, कब उन घड़ियों में ख़ुद को पायेंगे, जहाँ, जो कहना है, उसे कह देंगे. जब तक नहीं कहते, तब तक यही सही.




परिचय:
शचीन्द्र आर्य (जन्म- ०९ जनवरी, १९८५)
दिल्ली विश्वविद्यालय से हिन्दी में स्नातकोत्तर करने के पश्चात इसी विश्वविद्यालय से बीएड और एमएड करने के बाद शिक्षा विभाग से पीएचडी शोधार्थी ।
पूर्व में कुछ कविताएँ ‘हंस’, ‘वागर्थ’ और ‘पहल’ में प्रकाशित । ‘हंस’ में डायरी के कुछ अंश तथा एक कहानी ‘चुप घर’ का प्रकाशन ।
पहली किताब: ‘शहतूत आ गए हैं’ ।
संपर्क: shachinderkidaak@gmail.com
ब्लॉग: https://karnichaparkaran.blogspot.com

एक उत्तर दें

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s