व्याकुल यह बादल की साँझ ~ रवीन्द्रनाथ टैगोर

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Photo-Omesh

व्याकुल यह बादल की साँझ
दिन बीता मेरा, बीता ये दिन
मेघों के बीच सघन
मेघों के बीच ।
बहता जल छलछल बन की है छाया
हृदय के किनारे से आकर टकराया ।
गगन गगन क्षण क्षण में
बजता मृदंग कितना गम्भीर ।
अनजाना दूर का मानुष वह कौन
आया है पास आया है पास ।
तिमिर तले नीरव वह खड़ा हुआ छुप छुप
छाती से झूल रही माला है चुप-चुप,
विरह व्यथा की माला,
जिसमें है अमृतमय गोपन मिलन ।
खोल रहा वह मन के द्वार ।
चरण-ध्वनि उसकी ज्यों लगती है पहचानी ।
उसकी इस सज्जा से मानी है हार ।

प्रयाग शुक्ल अनूदित रविन्द्रनाथ टैगोर की कविता (कविताकोश से साभार)

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