प्रदीप अवस्थी की ‘बदहवासी’ भरी ‘याद’ और ‘यातना’ भरी ‘एंजायटी’

 1. यातना

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   कोई सो रहा हो 

   तो उसके आसपास से दबे पाँव निकलो

   नहीं करो ज़रा-सा भी शोर

   क्या पता 

   जो जीवन वह जी रहा है

   उसके कारण 

   कौन सी यातना वह अपनी नींद में भोग रहा हो.

  

2. एंग्ज़ायटी

 एक जिस्म 

 जो जोंक से खेलना जानता है 

 जब वह लिपटता रहेगा 

 अलग होता रहेगा

 खून चूसने वाला हथियार आपके शरीर पर रेंगता छोड़कर 

 फड़कता हुआ दर्द गुज़र जाएगा जब 

 दिमाग़ की कोशिकाओं से बहता हुआ 

 पैरों के नाखून तक 

 जब खींचा जाएगा खून आपके शरीर से 

और भरा भी जाएगा फिर 

असंख्य बार 

एक ही रात में 

कैसे जिंदा रह पाएँगे 

कितने दिन.

3. बदहवासी

फुटपाथ पर बैठा चिंघाड़ता  

आवाज़ लगाता

आवाज़ का गला घोट देता मेरा गला

उठकर दौड़ना चाहता तुम्हें रोकने

निर्दयता से चिल्लाती तुम्हारी आवाज़ों की रस्सी

बाँध देती मेरे पैर

बादल घिरने लगते

एक कोयल की मीठी आवाज़ को ढक देती कौवे की कर्कश आवाज़

दूर कहीं जंगल में एक हिरण का शिकार होता

दिल्ली में फैलता ज़हरीला धुआँ

मेरा दम घुटता  

      

बसों और रेलों में लौटता हुआ

रास्ते भूलता और काली बिल्लियों को घूरता

उखड़ती साँस और कराहों के शोर से बचने को

माँगता बर्फ़रगड़ता कानों पर

फ़ोन पर सुबकताआईना चूमता

तुम्हारी ख़ुशबू में सने फ़र्श पर लोटताउसे सहेजता

पीठ टंगी रह गई जहाँ दीवार में तुम्हारी

जीभ सटाकर बिलखता

पत्थर उठाताघिसता अपना जिस्म

मर जाता

प्यार करता.

4. एक दुश्मन है मेरा जो मुझमें बैठा है

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घर से निकलना चाहिए दिन में एक बार तो कम से कम कहते सब

जाना कहाँ चाहिए कोई नहीं बताता

किसके साथ !

फटी जेब को सिलने का कोई नुस्खा काम नहीं आता

अकेले कमरे में इंतज़ार करता है वह जो है लेकिन उसकी उपस्थिति के बारे में बात नहीं की जा सकतीबताने चलोकिसी को तो समझाना पड़तासमझाने चलो तो क्या ? सब तो सही है

एक दुश्मन है मेरा जो मुझमें बैठा है

मैं जो कह रहा हूँ आपको वही समझना चाहिए जबकि  य शुरुआत है मेरे झूठ बोलने की


अब तक मैंने किसी स्त्री के बारे में बात नहीं की क्योंकि उजाले से जोड़ा जाना चाहिए उन्हें

कुछ रहस्य हमें बचा कर रखने चाहिए

वे हमें दो हिस्सों में चीरें रोज़ थोड़ाथोड़ा भले ही


हम बिना तकलीफ़ के रोयें

जैसे बिना किसी बात के ख़ुश रहते हैं लोग

समय बीत जाने के बाद खोलेगा अपने राज़ स्वयं.

5. माफ़ी मेरी दोस्त

 

जब एकएक दिन बिताना
एक युद्ध लड़ने जैसा था
जो मैं लड़ता ही रहता था 
भीतर गहरी उथलपुथल और

आवश्यकता से अधिक शांत और भावहीन चेहरा लिए

जैसे एक संघर्ष में हूँ लगातार कि किसी को पता नहीं 

चलना चाहिए
तब प्यारी और रोमांटिक बातें नहीं कर पाने के लिए
माफ़ी मेरी दोस्त

 

 तुम्हारा चाहना ग़लत था
 मेरी सूखती जाती इच्छाएँ

 

समय ही शायद ग़लत रहा होगा
हमेशा ही ग़लत रहा जो कमीना

 

यही तो कहना होगा
जब कुछ बचेगा नहीं कहने के लिए.

6. याद

रात भर एक अजगर की तरह कोई कसता रहा

गर्दन की हड्डियाँ

उठा सुबह

तो याद थी तुम्हारी.

 7. रोटी कहाँ ? होंठ याद आते थे

  लोहे की पतली गरम सीखचों की छुअन पलकों पर   

 जैसी तुम्हारे चेहरे की याद

 जितनी बेरहमी बरती गई

उतना मैंने ढोया तुम्हारी यादों को पीठ पर

रातरात भर मनहूस से सुरों में गुनगुनाए हिज्र के गाने

देह को लपेट लिया अपनी बाहों में

मैंने इस धोखे में बहाए घंटे

कि कितना भी पत्थर भरा हो मैंने उसकी आँखों में

एक दिन तो उबल कर गिरेगा ज़रूर बाहर

और

फटता नहीं माथा एक दिन में हज़ार से ज़्यादा दिन नकार देने पर भी

फोड़ना अपनी ज़ुबान उन्हीं पर जिन्हें भरेभरे फिरते थे बाहों में

आपको लगता है आँखें देखने के लिए होती हैं

वो बहने और भुलाने और जलने और दुखने के लिए होती हैं

 मैं जब सो रहा था रात में

एक बच्चा मेरे घर की खिड़की से कूदकर मर गया

उसके मरने की कोई ख़बर कभी नहीं छपी

कोई रोया भी नहीं उस अनाथ के लिए

उसे कभी जगह भी नहीं मिली किसी गर्भ में

वो जन्मा भी नहीं कभी

हमने उसके जन्म की साज़िश रची अपनी बातों और सुनहरे ख़्वाबों में

और अब तुम्हारा और मेरा तो पता नहीं

उसको ज़रूर मार दिया गया है

वह दबा जाता है सिर में बैठे दर्द को ज़रा देर

कभी सोते में रात में चुपके से आकर

तुम्हारे बारे में पूछता है

 चूमते हुए भरते थे ज़हर

 एकदुसरे के घावों में प्यार का बुरादा भरते हुए

हमने ईजाद किए नए घाव

जैसे कितना करते हैं प्यार  

 उसने खतों में रखकर भेजे अपने होंठ और

ज़िद करके लिखवाई गई कविताओं को झोंका लोहड़ी की आग में

इर्दगिर्द नाचते लोगों के बीच,

मरते रिश्ते की सड़ाँध के बारे में चिट्ठियों में दबाए सब राज़

 बेवक़ूफ़ और निर्दयी होने में से चुना जाना चाहिए निर्दयी होना ही

 मैं बचा कर रखता हूँ आम का अचार और इंतज़ार करता हूँ उसमें फफूंद पड़ने तक

पर वो चूरा होता जाता है और

मैं इसमें ढूँढ लेना चाहता हूँ कोई और त्रासदी

त्रासदी जबकि यह है कि वे सड़कें अब तक ज़िंदा है 

जिन्हें खोद देना चाहिए था कब का

मैं फावड़ा हो जाना चाहता हूँ और उखाड़ना चाहता हूँ सारा डामर

जिस पर वो रोते हुए गुज़री कितनी बार और किसी ने नहीं पूछा

जब मैंने छोड़ा शहर 

 मैं इतना खाता था ग़म

भूख और लगती थी

हथेलियों को भींचकर मुट्ठी बनाते हुए

पेट पर मारता था मुक्के

और सो जाता था

रोटी कहाँ ?

होंठ याद आते थे  

 हमें जब बुनना था सबसे रेशमी प्यारकैंचियां खरीद कर चलाते रहे खाली अशुभ

और बिखरते गए  

 यहाँ से अब कभी नहीं उठेगी  

दफ़नाता गया हूँ इसमें हमारी कहानी धीरेधीरे

मेरा सीना ही मेरी क़ब्र है।

रचनाकार  प्रदीप अवस्थी 

बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्य की हर विधा में प्रखर प्रदीप अवस्थी की रचनाएं वागर्थ, कथादेश, हंस, अनुनाद, लल्लन टॉप जैसे विविध मंचों पर प्रकाशित हैं 

मुल्क और आर्टिकल 15 फ़िल्मों की पटकथा का किताब के रूप में प्रकाशन के लिए ट्रांसलेशन। ऑडीओ एप के लिए सिरीज़। एक उपन्यास शीघ्र प्रकाश्य। 

व्याकुल यह बादल की साँझ ~ रवीन्द्रनाथ टैगोर

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व्याकुल यह बादल की साँझ
दिन बीता मेरा, बीता ये दिन
मेघों के बीच सघन
मेघों के बीच ।
बहता जल छलछल बन की है छाया
हृदय के किनारे से आकर टकराया ।
गगन गगन क्षण क्षण में
बजता मृदंग कितना गम्भीर ।
अनजाना दूर का मानुष वह कौन
आया है पास आया है पास ।
तिमिर तले नीरव वह खड़ा हुआ छुप छुप
छाती से झूल रही माला है चुप-चुप,
विरह व्यथा की माला,
जिसमें है अमृतमय गोपन मिलन ।
खोल रहा वह मन के द्वार ।
चरण-ध्वनि उसकी ज्यों लगती है पहचानी ।
उसकी इस सज्जा से मानी है हार ।

प्रयाग शुक्ल अनूदित रविन्द्रनाथ टैगोर की कविता (कविताकोश से साभार)