पानी बाबा बादल बन – प्रमोद पाठक

बाल कविताएँ

पानी उतरा टीन पर

Water droplets
Photo: Omesh

पानी उतरा टीन पर
फिर कूदा जमीन पर

पत्ती और फूल पर
खूब-खूब झूलकर

कोहरे में हवाओं में
नाचकर झूमकर

छुप गया खो गया
मिट्टी को चूमकर


पानी बाबा

Rain
Photo: Omesh

पानी बाबा बादल बन
जा बैठा आसमान में
कोहरे की दाढी़ उसकी
उड़ रही हवाओं में

अँधेरे का छाता ताने
बैठकर पहाड़ों में
बौछारों का झमझम बाजा
झमझम बजा झाड़ों में

फुहारों की लाठी लिए
घूमा नदी गाँवों में
भर गई थकान खूब
फुहारों के पाँवों में

टिप टिप टिप गाया गान
बागों में बगीचों में
ओस की चदरिया तान
सो गया वो खेतों में


बुनकर हैं बया जी

Bunkar Baya
Photo: Kishan Meena

दया जी दया जी
देखो बया जी

देखो देखो बिट्टी
घोंसले में मिट्टी

सूखी-सूखी घास
बहुत ही खास

लाई चुन चुनकर
बया जी हैं बुनकर

बया जी का हौंसला
बुना लम्बा घोंसला

बया जी ने चुनकर
अण्डे दिए गिनकर

अण्डा फूट गया जी
चूजा निकला नया जी

दया जी दया जी
चहक रही बया जी


चोंच

Chonch

Photo: Pompi Bera

चिड़िया की चोंच
चूजे की चोंच
चूजे की चोंच में
चिड़िया की चोंच

चुग्गा लाए
चिड़िया की चोंच
चुग्गा खाए
चूजे की चोंच


प्रमोद बच्‍चों व बड़ों दोनों के लिए लि‍खते हैं। उनकी लि‍खी बच्‍चों की कहानियों की कुछ किताबें गैर लाभकारी संस्‍था ‘रूम टू रीड’ द्वारा प्रकाशित हो चुकी हैं। और कुछ कविताएँ व कहानियाँ बच्‍चों की प्रत्रिका चकमक, साइकिल व प्‍लूटो में। उनकी कविताएँ अहा जिन्‍दगी, डेली न्‍यूज, माटी के कविता वि‍शेषांक, पूर्वग्रह, बनास जन आदि पत्र-पत्रिकाओं में तथा वेब पत्रिका प्रतिलिपी, समालोचन व सदानीरा में प्रकाशित हो चुकी हैं। वे बतौर फ्री लांसर बच्‍चों के साथ रचनात्‍मकता पर तथा शिक्षकों के साथ पैडागॉजी पर कार्यशालाएँ करते हैं। 2016-19 तक दिगन्‍तर, जयपुर से निकलने वाली शिक्षा की महत्‍वपूर्ण पत्रिका ‘शिक्षा विमर्श’ के संपादक रह चुके हैं.
सम्पर्क : 9460986289; pathak.pramod@gmail.com
27 ए, एकता पथ, (सुरभि लोहा उद्योग के सामने), श्रीजी नगर, दुर्गापुरा, जयपुर, 302018, राजस्‍थान।

‘ओ सौंदर्य’ व अन्य कविताएँ | कुमार मुकुल

ओ सौंदर्य

ओ सौंदर्य
भागो मत यौवन की राह

कैशोर्य की शिराओं में खुद दौडेगा काल
तुम्हारे गालों पर भी
उगेंगी रेखाएं तन्मयता की

ओ सौंदर्य
शक्तिशाली हो आज भी
मेरी आत्मा को निचोडकर
उसमें नहाते हो उब-डूब

लो मेरी तृष्णाएं लो
उतरो मेरी शिराओं में भी।


वहां मेले में

वहां मेले में रोशनी थी बहुत
पर इससे
मेले के बाहर का अंधेरा
और गहराता सा डरा रहा था
एक जगह लाउड स्पीकर चीख रहा था
… लडकी – लडकी – लडकी
बस अभी कुछ ही देर में जादूगर
इस लडकी को नाग में बदल देगा
… लडकी – लडकी – लडकी

वहां मंच पर दो लडकियां
चाइनों की तरह
मुस्कुरा रही थीं

और कर भी क्या सकती थीं वो

फिर गाना बजने लगा…

सात समंदर पार मैं तेरे पीछे …

अब लडकियां नाचने लगी थीं

फिर मोटी सी लडकी ने कुछ इस अदा से
अपनी जुल्फें झटकारी
कि सामने नीचे जमीन की गर्द उड चली
…यह देख मेरे साथ बैठी बच्ची
ने मुस्कुराते हुए मेरी ओर देखा …

उसकी आंखों में एक सरल रहस्य
जगमगा रहा था।


मेरे इतने पास एक स्त्री

मेरे इतने पास से
गुजरती है एक स्त्री
उसका आंचल छूता है मेरे कान की लवें

उसे क्या पता
उसके पांवों की धमक
बैठती जाती है
खालीपने में मेरे भीतर

वह जा रही अपनी गति में, लय में
नये जीवन की ओर

उधर
जिधर बच्चे हैं
इंतजार में उसके
उनके लिए थाली में कुछ लिए
फल या खजूर या कुछ और

उसकी क्षणिक, आभासी उपस्थिति को
महसूसता हूं मैं

एक गंध
जो उठ रही है उससे
जैसे गर्म पत्थर भीगता हो पहली बारिस में

एक लय पसरना चाहती है निकलकर उससे

बच्चों की क्षुधा को तृप्त करती

यह मुझे भी भासती है

यह सब
सोचता होता हूं मैं
कि लौटती है वह

उसकी निगाह पडती है मुझ पर

अपनी लय,गंध, धमक को
समेट लिया है उसने

अब वह गुजर रही है फिर
मेरे पास से

एक स्त्रीं
जो
नहीं है कहीं…।


कि एक पत्ती लौ की

भीतर

पीडा की फुनगी सा
रहता हरा कुछ

सीले भावों का झोंका भी
भर जाता मोच
उसकी रगों में

कि तीरी जा रही हों नसें
आंखों की

शिखाकंप सा
सुरसुरा स्पर्श
देता फडफडा जडें

कि उमगने लगा हो कंपन
रोमछिद्रों से
कि एक पत्ती लौ की
तेजस नीरव सी।


आगरा सिकंदरा की एक गली में शाम

शीशे संगमरमर स्टील और कंकरीट के भवनों से
आ रही हैं
तरह तरह के कुत्तों के भौंकने की आवाजें

बाकी सन्नाटा है

शीशे और सरिए की दीवारों के पीछे
काले सफेद खरगोशकद से लेकर आदमकद तक कुत्ते हैं

अधिकतर बेडौल
बीच के तल्लों पर किसी सरिए या सीखचे से लटका है
एक राक्षसनुमा मुखौटा
बुरी नजर से बचाने को

नीचे तीन गदहे
भवनों की आलीशानियत से बेपरवाह
नजरें झुकाए मुंह मार रहे इधर उधर

बीच सडक पर पहिए से कुचल गयी
गिलहरी पडी है आंखें निकाले

आगरा सिकंदरा की एक गली में
ढल रही है शाम
भवनों पर लटके मुखौटों को मुंह चिढाते
बंदरों की जमात ही है
जो कुत्तों की चुनौती का मौन प्रतिवाद करती
छलांगे लगाती
चली जा रही है
अपने ठिकानें को।


जीवन-वृत्त : कुमार मुकुल (अमरेन्‍द्र कुमार) पिता: श्री गंगा प्रसाद सिंह जन्म: 2-5-1966 शिक्षा: एम ए ( राजनीति विज्ञान ) पेशा: पत्रकारिता कार्यानुभव: 1994 से 2015 के बीच हिन्दी की आधा दर्जन पत्र-पत्रिकाओं अमर उजाला, देशबन्‍धु, पाटलिपुत्र टाइम्स, प्रभात खबर,कल्‍पतरू एक्‍सप्रेस आदि में संवाददाता, उपसंपादक, संपादकीय प्रभारी, फीचर संपादक व स्‍थानीय संपादक के रूप में कार्य।

2005 से 2007 के बीच द्वैमासिक साहित्यिक लघु पत्रिका ‘सम्प्रति पथ’ का दो वर्षों तक संपादन। 2007 से 2011 त्रैमासिक ‘मनोवेद’ में कार्यकारी संपादक। 2011 से 2012 तक आकाशवाणी में ‘को-आर्डिनेटर’। जनवरी 2012 में कल्‍पतरु एक्‍सप्रेस आगरा में फीचर संपादक। अक्‍टूबर 2012 से नवंबर 2014 तक दैनिक कल्‍पतरु एक्‍सप्रेस में स्‍थानीय संपादक के रूप में कार्य।
2015 दिल्‍ली के दैनिक देशबन्‍धु में स्‍थानीय संपादक के रूप में कार्य।

फिलहाल – राजस्‍थान पत्रिका, जयपुर में कंटेंट स्‍ट्रेटेजिस्ट।
कृतियां: पुस्‍तकें – 2000- ‘परिदृश्‍य के भीतर’; 2006- ‘ग्‍यारह सितंबर और अन्‍य कविताएं’ शीर्षक कविता संग्रह; 2012- ‘डा लोहिया और उनका जीवन-दर्शन’; 2012- अंधेरे में कविता के रंग – काव्‍यालोचना; 2014 – हिन्‍दी की कविता : प्रतिनिधि स्‍वर, के पांच कवियों में शामिल; 2015- सोनूबीती-एक ब्‍लड कैंसर सर्वाइवर की कहानी; 2016 – एक उर्सुला होती है, कविता संग्रह।

सम्‍मान: 2000 में ‘परिदृश्‍य के भीतर’ के लिए पटना पुस्‍तक मेले का ‘विद्यापति सम्‍मान। अनुदान – 2006 ‘ग्‍यारह सितंबर और अन्‍य कविताएं’ पुस्‍तक के प्रकाशन के लिए दिल्‍ली हिंदी अकादमी द्वारा।

अन्य: वसुधा, हंस,पाखी, कथादेश, इंडिया टुडे, सहारा समय, समकालीन तीसरी दुनिया, जनपथ, जनमत, समकालीन सृजन, देशज, शुक्रवार, आउटलुक, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, जनसत्ता, दैनिक जागरण, कादम्बिनी, आजकल, समकालीन भारतीय साहित्य, अक्सर, प्रथम प्रवक्ता आदि पत्र-पत्रिकाओं में लेखन।
कुछ विश्‍वकविताओं का अंग्रेजी से हिन्‍दी अनुवाद, प्रकाशन।