धान रोपती स्त्रियां और चरवाहे की टिटकारी – रमाशंकर सिंह की कविताएं

जमींदार का रोपनी गीत :

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Photo -Ramashankar Singh

मुझे जन्म के ठीक बाद बताया गया
पूरे गाँव में कितनी औरतें हैं
कितनी झुकती है किसकी कमर
किसकी उँगली में है जादू
कौन कम मजूरी में ज्यादा काम करती हैं

मुझे यह भी पता था कि अगले आषाढ़ में
किसकी लड़की धान लगाने वाली हो जाएगी
किसकी होगी शादी
किसे होगी कर्ज की कितनी जरूरत
सब कुछ निर्भर था
धान के रकबे पर

मुझे चावलों का स्वाद पता
उनका आकार पता
यहाँ तक कि जब वे थाली में जूठन की तरह छूट जाते थे
तब लगता था कि आसमान में तारे बिखरे हों
वे जो कनई में रोपती थीं
काला नमक और बासमती चावल
आधे पेट
नसीब नहीं हुई उन्हें
काला नमक और बासमती की खुशबू

मुझे बचपन से ही मिली सिखावन
कैसे बुलाते हैं मजूर
सुबह कितने समय जाना है उन्हें हाँककर लाने
नहीं बैठना है उनकी चारपाई पर
कायम रखनी है शरीर और वाणी की अकड़

धान रोपती स्त्रियों को देखकर
मुझे सावन में गाए जाने वाले गीत नहीं
अपने पुरखों की मूँछें और गालियाँ याद आती हैं
जो मुझे सिखायी गयीं
कैसे बुलाते हैं
धान रोपने वाली स्त्रियों को।

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Photo-Hetal Joshi

न कविता
न गीत
न सुग्गे
न धान
न पान
न कस्तूरी
न केसर
और न ही फूल भेजूँगा तुम्हें

मैं तुम्हारे लिए भेजूँगा
बांस की बनी झपली
उसी में भर लेना
हमारा आज का दिन
सुगंध
विदाई के क्षण
मिलन का ठहराव।

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Photo-omesh

समय एक स्त्री का नाम है

समय को देवता कहा गया
काल को पुरुष

इसे थोड़ा उलट दीजिए
समय एक स्त्री का नाम है
वह बम्बई से बलिया जा रही है
अपना बच्चा गोद में लिए

समय गर्भवती है
उसका चल रहा है नवाँ महीना
वह हैदराबाद से देवास जा रही है

समय एक माँ है
उसका नवजात बच्चा अभी-अभी मर गया है
उसके स्तनों में उतर आया है दूध
उसी से धुल गए हैं
इस देश के तपते हुए राजपथ।

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क़ब्र

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Photo-Omesh

क़ब्र लिए फिरता हूँ

शहर दर शहर
दर ब दर

एक क़ब्र बचपन के किसी दोस्त की है
चेचक से मर गया था वह
रेख उठान के दिनों में

एक पतली सी
मरियल किशोरी की कब्र
अंदर धँसी है शरीर के किसी कोने में

आत्महत्या किए हुए भाई की कब्र
मेरी पसलियों के ठीक नीचे है
बैसाख में चलती पछुवा से
चिता की लकड़ी तड़कती है
मद्धिम सी आवाज़ में

एक गूँगे आदमी की भी क़ब्र दफ़न है मेरे अंदर
जो कभी बोल नहीं पाया
लेकिन जिसकी आँखे हँसती थीं
किसी चरवाहे की टिटकारी तरह
मन में धँसी है
पिता की कब्र
सांझ ढलते ही
खूंटे पर लौटी गाय की तरह
आराम से सो जाती है

एक और क़ब्र है
मेरी माँ की
ठीक मेरे चेहरे के नीचे

उसके दांत चमकते हैं अँधेरी रात में
जैसे जुगनू चमकते हैं।

 

परिचय – रमाशंकर सिंह 

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रमाशंकर सिंह मूलत: स्वतंत्र शोधार्थी हैं लेकिन समाज संस्कृति और  साहित्य सभी पर इनकी पैनी नजर रहती है। इनकी कविताएं इनके शोध और सोच दोनों की खिड़कियां हैं ।

संपर्क  7380457130

तुम खोजना मुझे, जन, गण, मन में – आलोक आज़ाद

 ईश्वर

Sheetla
Photo- Kishan

मैं उस सबसे पुराने,
लूट का साक्षी हूं,
जब दिन भर तपती धूप में,
काम करने के बाद,

रोज़ शाम आने वाले,
शीशी भर तेल,
और सेर भर अनाज का,
एक निश्चित हिस्सा,
मंदिर में बैठे ईश्वर,
को भेंट हो जाता था…

जिसका दिया,
हमारे घर के,
चूल्हे से,
पहले जलता था,

उस रात से,
मंदिर में,
बैठा ईश्वर,
मुझे डाकू और लुटेरा दिखाई देता है।
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दीवार पर टंगा देश

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Photo-omesh

दीवार पर टंगे देश का मानचित्र,
जिसमें खींची हैं तमाम रेखाएं,
और उन लकीरों पर पहरा देते,
ज़मीदारों के लठैत,
जिसे सब भारत समझ रहे हैं…

इन लकीरों की तलहटी में,
गुमशुदा एक लंबी वीरान सड़क,
जिस पर मजदूरों के मुर्दा जिस्म,
ट्रकों में लाद कर मानचित्र में खींची,
रेखाओं के इर्द- गिर्द,
गिराए जा रहे हैं,
और ख़ून की नदियां बह रही हैं,

और उन सड़कों पे मजदूरों के,
लहूलुहान पैरों के निशान,
दीवार में टंगे मानचित्र के पीछे,
उभर आए हैं,चीख- चीख कर,
दिखाने को असली भारत,
पर कोई इस दीवार से,
मानचित्र को हटाना नहीं चाहता,

इससे खतरा है,
ना सिर्फ़ इस दीवार के गिर जाने का,
बल्कि उस बहरी दीवार के भी ढह जाने का,
जहां सपनों का मानचित्र लगाकर,
हुईं हैं बेहिसाब हत्याएं,

हां, इससे ख़तरा है,
संसद की दीवार के गिर जाने का।
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कुछ लोगो की भीड़

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Photo-Nandini

जिस्म के भीतर,
झीने वस्त्रों के नीचे,
मेरे स्तनों तक झांकती,
मेरी योनि को निहारती,
कुछ लोगो की भीड़…

बालकनी में टंगे,
लाल,नीले, पीले,
अंतःवस्त्रों से,
विकल, उत्तेजित,
और अशांत हो जाती,
कुछ लोगों की भीड़…

हिंसा का उत्सव,
मर्यादा पर आख्यान,
लज्जा का ज्ञान,
संस्कृति का सम्मान,
राष्ट्र पर अभिमान,
अपने इतिहास पर इठलाती,
कुछ लोगों की भीड़….

हाँ कुछ लोगों की भीड़,
जिनकी संस्कृति,
गौरवशाली इतिहास,
और नैतिकता कि,
“मैं” सबसे बड़ी गवाह हूँ…

औऱ गवाह है,
मेरे जिस्म के हर हिस्से पर,
तुम्हारी घूरती आँखों से लगे,
ख़रोंच के निशान,
औऱ बालकनी कि अलगनी
पर टंगे मेरे,
लाल,नीले, पीले, अंतःवस्त्र।
——————————
औरत

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Photo-Rohitjain

वो खूबसूरत है,
क्योंकि वो दहलीज में है,
वो दायरों में है,
इसलिये माँ है,
बीवी है,
बहन है..

वो गलीचों पर बैठ,
तुम्हारे घर को,
स्वर्ग बनाती है..

फिर अचानक ,
वो सड़क पर आती है,
और पूछती है,
सदियों की ग़ुलामी में,
लिपटी तुम्हारी चुप्पी,

और फिर वो,
दुबारा,
बन जाती है,
रंडी, वेश्या, और कुल्टा।

एक दिन

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Photo-D. Ravinder Reddy Outlook

एक दिन गिरा दिए जायेंगे,
तुम्हारे धर्मो के मेहराब,
जिसमें आज भी रक्तस्राव करती,
औरतें अछूत, और अपवित्र हैं,

जिसकी मिनारे करती हैं,
ओछी मर्यादा का अट्टहास,
जहां औरत की योनि के नाम मात्र से,
मलिन हो जाते हैं तुम्हारे मंदिरों,
मस्जिदों, गुरुद्वारों की झूठी शुचिता

वो पहली औरत,
जिसके कोख़ से जन्मे बच्चों को,
चार वर्णों में बाट दिया ब्रम्हा ने,
वो पहली औरत,
जिसकी अवज्ञा को हिंसा योग्य,
बताया गया कुरान की आयतों में,

वो पहली औरत,
जो मेरी,तुम्हारी,हम सब की मां है,
इतिहास के कठघरे में खड़ा करेगी,
तुम्हारे ईश्वर और अल्लाह को,
और पूछेगी कि आसमान फटने से,
कैसे आया फरिश्ता,
धरती पर गिरे वीर्य से ,
कैसे पैदा हुआ ईश्वर,

वो जला देगी तुम्हारे ग्रंथों को,
मर्यादा की मीनारों को,
ब्रम्हा के सफ़ेद झूठ को,
फ़िर ना आसमान के फटने से,
पैदा होगा कोई फरिश्ता,
और ना ही धरती पर गिरे वीर्य से,
जन्म लेगा कोई ईश्वर।

कानून के हाथ

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Photo-OMESH

कानून,
के हाथ बहुत लंबे होते हैं,
बिल्कुल उस लंबे काग़ज़ी फ़रमान की तरह,
जिसमें होती है महज़,
सांस लेने की स्वीकृति,

सब चुप-चाप सह जाने की पेशगी,
और ज़िंदा होने की शर्त के बदले,
क़ैद कर दिए जाते हैं,
मोटी बेड़ियों में स्वप्न बुनते आंख,
गीत गाते होंठ,
और सर उठाए जिस्म….

कानून,
के हाथ बहुत लंबे होते है,
बिल्कुल जमींदार के हाथों की तरह,
जो भूख से चिल्लाते, कराहते,
बच्चे की मां के सूखे वक्षस्थलों,
के रास्ते उसकी बेबसी तक पहुंच जाते है,

और दूध की एक थैली के बदले,
मूल और सूद की लिखापढ़ी में,
एक मां से कागज़ पे,
रखवा लेते हैं गिरवी,
उसकी आत्मा, उसका शरीर…

कानून,
के हाथ बहुत लंबे होते हैं,
क्योंकि इन हाथों से,
जिन लोगों का गला घोंटा जाता है,
उन हाथों में बंदूके, टैंक,
क़लम और क़ानून की किताब नहीं होती,

उनके हाथों में होती है एक कुदाल,
जिसे लेकर ये मैले, कुचैले, असभ्य,
जंगली,भद्दे लोग तपती दुपहरी में,
नफ़रत और सियासत की जगह,
धरती की सतह पर धान बो रहे होते हैं।

अख़बार

Akhabar
Photo-Omesh

सभ्यताएं,
महज़ टैंकों से,
नहीं ख़त्म की जा सकती,
और ना सिर्फ़ मिसाइलों से,
रौदी जा सकती हैं..

मौत के लेखापत्र,
और बंदूक की ट्रिगर,
पर रखी उंगलियों को,
होती है दरकार,
बहुसंख्यक सम्मति की..

इस सम्मति का बारूद,
तैयार होता है,
प्रिंटिंग प्रेस में,
जहां नफ़रत और ताक़त की,
काली स्याही से की जाती है,
वर्ग-चेतना की हत्या…

अंततोगत्वा,
लोकतंत्र के नेपथ्य में,
बनाया गया,
तंत्र के सबसे विनाशकारी,
असलहे का बारूद,

दरवाजे के,
सामने,
हर सुबह,
अख़बार बना कर,
गिरा दिया जाता है.
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जन- गण-मन

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तुम खोजना मुझे,
जन,गण,मन में,

जब मैं किसी पुल से,
लटका दिया जाता हूँ,
ताकि मेरी शरीर से रिसता लहू,
ना करे दूषित तुम्हारी,
सड़कों कि पवित्रता,

जिस सड़क की पहली ईट और रेत में,
सना है जून की दुपहरी में,
मेरे माथे से गिरा पसीना,
औऱ जिसकी अस्तित्व की आख़िरी डोर,
ख़त्म हो जाती है,
किसी ताक़तवर कि अट्टालिका में जा कर …..

तुम खोजना मुझे,
जन, गण, मन में,

जब मेरे शऱीर का रक्तस्राव,
बना देता है मेरे जिस्म को,
मैला- मलिन औऱ उपेक्षित,
औऱ मेरे दैहिक स्पर्श से,
सड़ने लगती है रोटी की सुवास,

जब मेरे देह से निकला लहू,
सींचता है तुम्हारे सृजन को,
औऱ धमनियों में तुम्हारी,
पलने लगता है श्रेष्ठता का ज्वार,
औऱ न्यायालय के कटघरे में,
मुझे मिलता है ताड़ना का अधिकार….

तुम खोजना ,
मुझे जन गण मन में…

जब एक भीड़,
बांध देती है मेरे दोनों हाथ,
औऱ मुझसे मांगा जाता है,
मेरे वतनपरस्ती का सबूत,
औऱ मेरी हर एक चीख़ के साथ,
होता है “भारत जिंदाबाद” का आह्वान..

औऱ मेरी सांसों के ख़त्म होने के साथ,
‘भारत जिंदाबाद’ का आह्वान,
औऱ तेज होता है..
अंततोगत्वा मेरी सांसे हार जाती हैं,
और भारत जीत जाता है…..

तुम खोजना मुझे,
जन, गण, मन में,
और देखना कि तुम्हारे,
जन गण मन का अधिनायक,
किसी पुल से लाश बन कर लटका हुआ है.
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परिचय- आलोक आज़ाद

जेएनयू शोधार्थी 

कई समाचारपत्रों व पत्रिकाओं में आलेख प्रकाशित, एक काव्य संकलन (दमन के ख़िलाफ़) प्रकाशित।
ईमेल- alokjnusocio@gmail.com
संपर्क- 9560172459