ज़रूरी क्षणिकाएँ | हर्षिता पंचारिया

नहीं देना चाहती तुम्हें….
कोई गुलाब या रूमाल,
मैं रखना चाहती हूँ तुम्हारी हथेली पर…
कुछ बूंदें हैंड वाश की,
ताकि तुम्हारे धुले हुए स्वच्छ हाथ
“विवश कर दें“…
मृत्यु को ख़ाली हाथ लौटने पर ।
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आपका शहर ज़िंदा रहें,
इसलिए घर की लक्ष्मण रेखा पार ना करें….
क्योंकि रावण किस रूप में किसे, कब ,कहाँ मिल जाएँ,
ये ना सीता को पता है…
ना राम को…
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मृत्यु का दरोग़ा…
जाति, लिंग, रंग, धर्म, सम्प्रदाय के भेद से परे है…
अतः आवश्यक है…
कृपया एक फर्लांग की दूरी बनाएँ रखिए ।
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इस बार तुमसे गले मिलने…
और….
हाथ मिलाने से बेहतर था….
एकांतवास में…
तुम्हारी कविताओं को पढ़ना….

और सच कहूँ!!!

मैं संक्रमित हो गई हूँ….
तुम्हारी कविताओं के प्रेम में….
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© हर्षिता पंचारिया