पिता की वर्णमाला और कुछ कविताएँ| ओम नागर

किसान पिता: कुछ कविताएँ

( 01 )

पिता का खाँसना
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पिता बीमार है
अक्सर मेरी नींद में खाँसते है

लाख कोशिशों के बाद भी जब
नहीं छूटता पिता के गले में जमा हुआ कफ़
तो बिस्तर से उठकर
चला जाता पिता के कमरें की देहलीज़ तक

पिता सोये हुए मिलते
बस सांस दर सांस बज रहे होते पात

पिता के सोने की आवाज सुनकर
लौट आता दबे पाँव

अभी गाँव में हैं पिता
और मेरी नींद में जारी हैं
पिता का खाँसना।

( 02 )

पिता की पगथलियाँ
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मैं अक्सर देखता हूँ
पिता की पगथलियाँ
कितनी सख़्त
कितनी खुरदरी और सपाट

इन सात दशकों में
कितनी धरती नाप ली होगी पिता के पगों ने
खुली पड़ी बिवईयों से
झाँकता हैं पिता का गुजरा हुआ कल

बिल्कुल सफ़ेद झक्क
पूस की रात की ठिठुरन से अकड़ी है
पिता की पगथलियाँ।

( 03 )

पिता के कंधे
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पिता के कंधों पर बैठ
देखा किये मूसेन माताजी का मेला
अंगुली पकड़कर घूमा किये अटरू का हाट

अनाज की भरी बोरियाँ
मिट्टी की भरी तगारियाँ
बड़े-बड़े पत्थर तक ढोये हैं पिता के कंधों ने

भले ही बुढ़ापे में झुकने लगे हो पिता कंधे
लेकिन सदा की तरह आज भी चौड़ा है
पिता का सीना

हम दो भाई
चार कंधे है पिता के।

( 04 )

पिता की हथेलियाँ
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पिता की हथेलियाँ
समय के साथ सख़्त हुए छालों से भरी हैं

बचपन के गाल पर उघड़े है पिता की
अँगुलियों के नीले निशान

माँ के आँचल
और पिता के अंगौछे पर लगा हैं
हमारे आँसूओं का नमक

यह सिर पर रखी
पिता की हथेलियाँ
ईश्वर की हथेलियाँ है मेरे लिए।

( 05 )

पिता के सपनें
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हमारे नन्हें क़दमों-संग आगे बढ़ा
पिता की उम्मीदों का कारवां

हमारे ललाट पर उघड़ी
पिता के संघर्ष से मुक्ति की रेखाएँ

हमारी आँखों में
पले-बढ़े पिता के वो सारे सपने

जिन सपनों पूरा करने के लिये ही
मीलों चले है पिता के खुरदरे पग
पगथलियाँ काठ होती रही धोरे के जल में
और कंधे ढोते रहें जमाने भर का बोझा

पिता जो हथेलियों से थपथपातें रहे
हम नन्हें बिरवों के इर्द-गिर्द की माटी

आज घर के आँगन में
पिता के सपनों का पेड़ लगा हैं।

– खेता राम

( 06 )

पिता की वर्णमाला
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पिता के लिए
काला अक्षर भैंस बराबर।

पिता नहीं गए कभी स्कूल
जो सीख पाते दुनिया की वर्णमाला
पिता ने कभी नहीं किया काली स्लेट पर
जोड़-बाकी, गुणा-भाग
पिता आज भी नहीं उलझना चाहते
किसी भी गणितीय आंकड़े में

किसी भी वर्णमाला का कोई अक्षर कभी
घर बैठे परेशान करने नहीं आया पिता को।

पिता बचपन से बोते आ रहे हैं
हल चलाते हुए
स्याह धरती की कोख में शब्द बीज
जीवन में कई बार देखी है पिता ने
खेत में उगती हुई पंक्तिबद्ध वर्णमाला।

पिता की बारहखड़ी
आषाढ़ के आगमन से होती है शुरू
चैत्र के चुकतारे के बाद
चंद बोरियों या बंडे में भरी पड़ी रहती
शेष बची हुई वर्णमाला
साल भर इसी वर्णमाला के शब्द-बीज
भरते आ रहे है हमारा पेट

पिता ने कभी नहीं बोई गणित
वरना हर साल यूँ ही आखा-तीज के आस-पास
साहूकार की बही पर अंगूठा चस्पा कर
अनमने से कभी घर नहीं लौटते पिता

आज भी पिता के लिए
काला अक्षर भैंस बराबर ही है
मेरी सारी कविताओं के शब्द-युग्म
नहीं बांध सकते पिता की सादगी

पिता आज भी बो रहे है शब्दबीज
पिता आज भी काट रहे है वर्णमाला
बारहखड़ी आज भी खड़ी है हाथ बांधे
पिता के समक्ष।

***

परिचय:- ओम नागर ( युवा कवि ) की कविताएँ अथाई पर पूर्व में प्रकाशित हो चुकी है. कविता में अनुभूति की ईमानदारी और जीवन के सादे लेकिन संघर्ष चित्र उनकी कविता साफ दिखाई देते है।

पुरस्कार– साहित्य अकादेमी, भारतीय ज्ञानपीठ नवलेखन और पाखी के युवा पुरस्कार से सम्मानित।

लेखन– हिंदी-राजस्थानी और अनुवाद की दस पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी कविता संग्रह ’ विज्ञप्ति भर बारिश ’,तुरपाई : प्रेम की कुछ बातें ,कुछ कविताएँ और भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित कथेतर गद्य ( डायरी ) ’ निब के चीरे से ’ और राजस्थानी डायरी ” हाट ” खासतौर पर चर्चित।

संपर्क– ओम नागर
ग्राम व पोस्ट -अंताना, तहसील-अटरू
जिला-बारां ( राजस्थान)-325218
मोबाइल-9460677638

ईमेलdr.opnagar80@gmail.com

आइसोलेशन के अंतिम पृष्ठ |प्रतिभा शर्मा

आइसोलेशन के अंतिम पृष्ठ
(श्रमिक)
अप्रैल के नंगे-नीले दरख्तों और टहनियों से प्रक्षालित
ओ विस्तृत आकाश !
अपने प्रकाश के चाकुओं से
मुझ पर नक्काशी करो…
सम्बोधन हे ! अरे !
(1)
हम अपनी कल्पनाओं में छोटी-छोटी टपकन सुनते हैं
रात अपने चाँदी के नल से चुपके से टपकती रहती है
हम पाँवों के बल
टपकन की एकाग्रता में एक गीत गुनते हैं..
क्रूर अप्रैल में शहर भी सारे क्रूर हो गये
इससे पहले कि वे हमारा भख ले लें
हमने ही उनको छोङ दिया
(2)
भोर में आसमान के शीशे में हम हमारा चेहरा धोते हैं
हवाओं से आचमन करते हैं
पीली,झुलसती पत्तियों से दातुन करते हैं
आँसुओं की क्रीम से गालों को चमकाते हैं
एक संपीङित क्रोध से आँखों को आंजते हैं
आँखों में उभरे लाल डोरों से काली डामर की लम्बाई मापते हैं
हमने कंघी नही करी
चमेली का तेल व काठ की कंघी
माँ के सिरहाने ताखी में पङी है
हम अपने पट्टे पहुँच कर ही जमायेंगे
हम माँ से मिलने जा रहे हैं
(3)
माँ बिहार में कोसी के दलदल में रहती है
पुरूलिया में घुटनों तक पानी में धान रोपती है
थार के एक झोंपे में गोबर से चूल्हा लीपती है
शेखावाटी के दूर-दराज के
पीपल गट्टे पर प्याऊ चलाती है
माँ तेरे लिए सूरत का डायमंड तो नही
डायमंड जैसा मन लेकर आ रहे हैं
(4)
यह ज्येष्ठ की दुपहरी
वसंत जैसी नही खुलती माँ
हम आक्खा दिन डामर पर चलते हैं
और
गृहस्थी को सिर पर चक कर रखते है
(5)
कुछ तेरे लिए माँ,कुछ अपाहिज भाई के लिए
हम कुछ-कुछ बचे हुए हैं
तेरी बहू पेट से है
कोख में ही अभिमन्यु सरीखा है
(For the womb may be either male or female)
पर कौरव पक्ष की गारंटी कौन लेगा
कभी के अठारह दिन समाप्त हुए
अठारहवीं रात्रि बीते कितने ही दिन बीत गये
और कितना चलेगा यह युद्ध?
कृष्ण तुम समाप्ति का शंखनाद क्यों नही कर लेते ?
मेरी माँ तो तेरी परम भक्त है
तुझे छाँटणा छिङके बगैर
वह चा की एक टीपरी हलक से नही उतारती
(6)
हमारे चारों ओर बादल उङते हैं
कपास के नही
छालों के
मरहम के बादल
चीलगाङियों के लिए संरक्षित हो गये
(7)
हमारे अनजाने शरीर कीचङ से ढँक गए
जैसे हम कोकून पहनकर चल रहे
हम उस परिवर्तन को जोह रहे
जो उस तितली को नसीब है
जिसके रंगों की कल्पना से
हमारी पीठ पर पँख उग आए हैं
अब हम फफोलों वाली पगथलियों से नही
रंग-बिरंगे पंखों से उङकर
आ रहे हैं माँ
(8)
हमारे पीछे
तीन मूक-बधिर लुगाइयाँ भी है
उनकी आँखों में
उनकी पेट की भूख मर गई है
पर वे जिंदा है
नागिन सी डामर का काला रंग
उनके कोयों में उतर आया है
सपाट मील से लेकर असीम सफेद आसमान तक
हम सब ध्यान से चबा रहे तपता सूरज
पानी की तरह पी रहे मातम
जब रात के सितारे हमारे बदन पर सुइयां चुभोते है
हम उन्हें तोड़कर दर्द-निवारक गोलियां बना
बेबसी के थूक संग निगल जाते हैं
(9)
दूर से चिलचिलाती पुलिस की गाङी
नजदीक आते-आते
एक दीवार घङी बन जाती है
जो अपने डंके ठीक राइट-टेम पर बजा देती है
मै चाहता था
वे अपने हाथों के गुलदस्ते हमें सौंप जाते
हम गेंदें और गुलाब सूंघ लेते
कुछ हद तक तो प्यास शांत हो जाती
(10)
यह ऐसा है
जैसे हमें एक काँच के वातावरण में उतारा गया है
एक टिप्पणी
काँच की सतह पर
पानी की बूँद की तरह रेंगती है
और हमारे वातावरण को
धुंधला कर देती है
(11)
सङक किनारे
मै मरी हुई पत्तियों को समतल भूमि पर
टिके हुए देख सकता हूँ
और झाड़ियों की गंदगी को
कंक्रीट के टुकड़ों के बीच
जहाँ जमीन अवसाद में चली जाती है
और कंक्रीट का पिघलना शुरू हो जाता है
जिनसे काला-गाढा मवाद रिसता है
(12)
मेरी व्यग्रता
अब पहिए की तरह है
जो ढलान पर लुढकता है
आज दिन ढलते
गोधूलि वेला में
हम ड्योढ़ी को छू लेंगे
मै रगङता हुआ
घुटनों के बल गिर जाता हूँ
सुबकता
यह एक एस्पिरिन के जैसा है
जिसे सिर्फ हमारी रगें जानती है
दुख की एक लम्बी प्रक्रिया है
एक लम्बी यात्रा
फफक कर गिर पङना
इसके मील के पत्थर हैं
मैने हाथ फैला लिए
उस गाँव की ओर
जिसके झोंपों के आकाश में
फोग के धुएं के बादल उठ रहे

परिचय- प्रतिभा शर्मा युवा कवयित्री है। वर्तमान में सरकारी सेवा में कार्यरत है। वर्ष 2018 में राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा चयनित व प्रकाशित काव्य संग्रह “मौनसोनचिरी पर वर्ष 2019 में डॉ रामप्रसाद दाधीच सम्मान से सम्मानित किया गया।