बादल, बारिश और भूकंप को भांप लेने वाले लोग | जसिंता केरकेट्टा

हम घर से बाहर निकलने वाले थे। उसने रेनकोट पहनते हुए मुझसे कहा “रेनकोट पहन लो।”
मैंने खिड़की से बाहर देखा और कहा
” दूर-दूर तक बारिश के कोई आसार नहीं हैं।”
” भारी बारिश के आसार हैं । मैं कह रही हूं रेनकोट ले लो। और भींगना चाहती हो तो रहने दो। ” उसने कहा
“पर लोग सड़क पर हंसेंगे रेनकोट में देखकर।” मैंने कहा। अंततः मैंने रेनकोट पहन लिया।
हम बाहर निकल आए। आधे घंटे हुए ही होंगे झमाझम बारिश शुरू हो गई। बहुत देर तक सड़क में फंसे रहे। सड़क में बाढ़ सी आ गई थी और आगे बढ़ना मुश्किल था। मैंने कहा ” यह कैसे हुआ?”
“लौटकर बताती हूं।” वह बोली।

उस दिन मोनिका, पोलैंड से रांची आई थी। एक साथ इंग्लिश, जर्मन, पोलिश कई भाषाएं जानती है। मेरी कविताओं पर काम कर रही थी। वह हमारी दूसरी मुलाकात थी। पहली मुलाकात जर्मनी के इसी हार्ट गांव में हुई थी। उसने बताया
” दुनिया में ऐसे लोग हैं जो बादल, बारिश और भूकंप को भी महसूस करते हैं। और उनकी देह में बारिश और भूकंप से पहले ही प्रतिक्रिया शुरू होती है। बादल के घने होने से सिर में भारीपन बढ़ता जाता है। यह थोड़ा तकलीफदेह भी होता है, हर घड़ी बादल को महसूस करना अपने माथे पर। लेकिन यह एक तरह से वरदान भी है। मेरी नानी के साथ यह होता था और अपने गांव में वह इसकी जानकारी लोगों को देती थी। लेकिन घर के लोग इसे बीमारी भी समझते थे क्योंकि इससे सिर भारी-भारी लगता है और उन दिनों कोई डॉक्टर नहीं जानता था कि ऐसा क्यों होता है। मेरे साथ भी यह होता है, मसलन बारिश या भूकंप की तीव्रता के साथ ही देह में प्रतिक्रिया तेज होती है, स्थिति बिगड़ने लगती है लेकिन उसके सामान्य होते ही मैं भी सामान्य होने लगती हूं। अब मौसम विशेषज्ञ दुनिया में ऐसे लोगों को ढूंढ कर उनका भी अध्ययन कर रहे हैं जो बादल, बारिश, भूकंप और प्रकृति को गहराई से महसूस कर सकते हैं। मैं उन गिने चुने लोगों में से हूं । ”

मैंने कहा ” मैं वह कनेक्शन महसूस करती हूं और कई बार उसके जवाब भी मिलते हैं पर मेरा अनुभव बहुत पर्सनल है। ” लेकिन मैंने कभी नहीं सुना कोई बादल, बारिश और प्रकृति में होने वाले बदलाव को इस तरह महसूस करता होगा।
बात करते-करते बहुत देर हो गई। अब उसे अपने होटल लौटना था। मैंने कहा “आसमान साफ दिखता है। अब तुम आराम से जाओ।”
उसने कहा ” भीगते हुए जाऊंगी। हल्की बूंदा बांदी होगी। ” मैंने कहा ” देखते हैं…। यक़ीन नहीं होता है।”
सड़क पर उसे जैसे ही विदा किया, हल्की बूंदा बांदी शुरू हो गई। वह हंसने लगी …
मैं भागते हुए घर आई। उस दिन सारी रात मोनिका की ही बातें घूमती रही दिमाग में।

प्रकृति के साथ जुड़े अद्भुत लोग हैं दुनिया में। लेकिन हमारी पूरी आधुनिक शिक्षा आंकड़ों और जोड़-घटाव के सिवा कुछ नहीं सिखाती हमें। पढ़ा-लिखा आदमी भी अनकही, अनसुनी, अलिखित बातों को कभी नहीं महसूस कर पाता। आदमी, आदमी की भाषा नहीं समझ पाता, प्रकृति को समझना दूर की बात है। असल दुनिया तो वहां से शुरू होती है जो अलिखित और अनकही है। उसका संसार कितना बड़ा और व्यापक है? एक पढ़ा- लिखा आदमी अभी ठीक से इसे नहीं महसूस कर पाया है। जंगल से जुड़ा आदिवासी समाज अब भी धरती को सुनता है। उसकी अलिखित बातें पढ़े-लिखे लोग कभी नहीं समझ पाते। तथाकथित सभ्य समाज में आदमी, फूलों की परवाह नहीं करता, पेड़ों की परवाह नहीं करता, एक लंबी दूरी तय कर प्लेट तक पहुंचने वाले अनाज की परवाह नहीं करता, बोले हुए शब्दों की परवाह नहीं करता। ऐसा मनुष्य , मनुष्य की परवाह कैसे कर सकता है ?

हार्ट विलेज
नौसडट, जर्मनी

मेरी बहन अब्बू | सबाहत आफ़रीन

मोबाइल स्क्रीन पर एक अनजाना नम्बर बार बार जगमगा रहा था…
ये किसका नम्बर है ? रिसीव करूँ या.. उँह पता नही कौन होगा , नही उठाती।
सर झटक कर मैं बिखरा कमरा ठीक करने लगी। बच्चो के स्कूल जाने के बाद कमरे की हालत यूँ हो रही थी जैसे छोटी मोटी जंग लड़ी गयी हो।
सोफ़े का कवर लगाते हुए सफ़ेद कागज़ पर नज़र रुक गयी। चमकीले पेन से लिखा गया था,”अम्मी अब्बू” आगे हार्ट बना कर गुलाबी रंग से सजाया गया था। यक़ीनन ये ड्राइंग महविश ने की थी। लेकिन न जाने क्या हुआ कि हाथ मे कागज़ लिए एकदम से उसी सोफ़े पे बैठ गयी। मुझे अब्बू याद आने लगे, मेरे अब्बू!
आंखे बंद किये मैं फ़िर से वहीं पहुंच गई जब संडे के रोज़ अब्बू से सौ नख़रे करती थी। ,”मेरी कोई बहन नही है, मुझे बाल बनाना है चोटी करनी है।” ठुनकती हुई मैं अपने तीनो भाइयों को चिड़चिड़ा कर देखती, जिनके बाल खूंटी की शक्ल से आगे नही बढ़ने दिये जाते थे। अब्बू भाईजान के काले रेशमी बालों के गुच्छे नाई के सुपुर्द कर आते ये कहते हुए कि ,”हमारे घर में लड़के ज़ुल्फ़ी कट नही रखते।”
और अम्मी से हम डरते थे उनका बाल छूते हुए उनमे कलाकारी करने की हिम्मत नही थी तो ले देकर उम्मीद की नज़रें अब्बू पे टिक जाती।
बाक़ी दिन कोर्ट में मुक़दमे लड़ते हुए मेरे अब्बू सन्डे के रोज़ मेरा मुक़दमा देखते। बरामदे में लगे तख़्त पर लेट जाते और 7,8 साल की सबाहत की पुकार होने लगती।
हम हाथ मे कंघा, कटोरी में पानी छोटा सा शीशा और रबरबैंड थामे गिरते पड़ते अब्बू के पास पहुंच जाते।
“अब्बू दो चोटी करूँ कि एक?”
“अब्बू बीच का बाल पकड़कर फुग्गा बना दी हूँ, देखो शीशे में।”
अब्बू आंख बंद किये रहते, ऐसे लेटे लेटे जाने कब सो जाते। लेकिन मेरा पानी लगा लगा कर छोटे बालों में चोटिया बनाना जारी रहता।
क्या क्या याद करूँ…
एक दफ़ा कोई ख़ास मेहमान आने वाले थे , अम्मी ने नाश्ते के सामान के साथ थोड़े रसगुल्ले भी मंगवाए। उस वक़्त मिठाइयां इतनी आसानी से घरों में नही आती थीं जितनी अब आती हैं। मिठाई तब आती थी जब मामू आते या फूफी आतीं या फिर खाला आतीं। वरना फिर शादी का बैना आता जिसमे लड्डू बालूशाही होती जो मुझे बिल्कुल पसंद नही थे।
चीनी मिट्टी की ख़ूबसूरत प्लेटों में जो अम्मी को दहेज में मिली थीं, उनमे नाश्ते सज गए बाहर जाने के लिए। सफेद रसगुल्ले वाली प्लेट मेरे सब्र का इम्तहान ले रही थी। आख़िर..
सब्र का दामन छूटा, रसगुल्ला उठाया और बिजली की तेजी से मुँह में भर लिया।
अम्मी आयीं तो प्लेट उठाते ही बोलीं ” , अरे एक रसगुल्ला कम कैसे? गिन के रखे थे मैंने।”
हम मुंह दूसरी तरफ़ फेरे जल्दी जल्दी रसगुल्ले को पेट मे उतारने लगे कि देखा अम्मी की ग़ुस्से भरी आवाज़ आयी,”बेबी! इधर आओ।”
मैं घूमती उससे पहले अब्बू बोले ,”मैंने खाया , देखते ही लालच लग गयी थी।”

अब्बू…बचपन से ही समझ गयी थी आप हमेशा मेरी ढाल बनोगे। फ़िर… ऐसे छोड़ क्यों गए? मुझे पढ़ते हुए देखते…मेरी विदाई में मुझे सीने से चिपकाते…आपको कौन बताये कि जब दो दो बार जल्दी जल्दी ऑपरेशन हुआ, मन्तशा महविश इस दुनिया मे आयीं, आपको कितना याद किया मैंने!
कितना रोई हूँ रात में आंख खुलने पर।
मन्तशा के फ़ौरन बाद महविश हुई तब लोगो की बातें… उनकी नज़रें…
“फ़िर से लड़की? सब्र करो, लड़की हुई है अगली बार लड़का हो जाएगा..”
अब्बू मेरे टांके दर्द होने लगते थे, मैं रोते हुए कहती बहुत दर्द हो रहा है, नर्स हैरान होकर कहती,”दर्द का इंजेक्शन लगाया है , उससे कम नही हुआ?”
लाइट आ गयी, कूलर चल रहा है ,हाथ मे पकड़ा कागज़ फड़फड़ा कर उड़ गया। मैं जिस्म को ढीला छोड़े न जाने कितनी देर से सोफ़े में घुसी हूँ। मोबाइल पर फिर से वही अनजान नम्बर चमक रहा है, मैं हरे निशान पे अंगूठा फिरा देती हूं।
“हैलो.. हैलो…
ये किसकी आवाज़ है जानी पहचानी सी..जैसे जैसे…

“,जी आप कौन?
“मैं हूं बेटा.. तुम्हारा चाचू!”

चाचू..मेरे अब्बू के भाई, इकलौते भाई। सालों बाद आवाज़ सुनी थी, पहचान ही नही पायी। घरेलू मसलों ज़मीन की लड़ाइयों ने ख़ूनी रिश्तों की नींव खोद डाली थी,इमारत ढह गई थी या बस..गिरने वाली थी..
“बेटा.. कैसी हो तुम? ”

आह! मुझे एकदम से अब्बू का चेहरा याद आया , वही आवाज़ वही नरमी..
मैंने क्या बात की, कैसे जवाब दिए, वो सब याद नही,
याद है तो इतना कि नम्बर सेव कर लिया,”चाचू”!