पहली नज़र को सलाम | पल्लवी

‘जिसने हमें मिलाया जिसने जुदा किया
उस वक़्त, उस घड़ी,उस ग़ज़र को सलाम।’

ये गीत यूँ तो एक अद्भुत प्रेमगीत है लेकिन इसमें जो हर शय के लिए शुकराने का भाव है वह इस गीत को एक रूहानी ऊँचाई पर पहुंचा देता है।और इन दो पंक्तियों में अच्छे और ख़राब दोनों वक्तों के लिए समान कृतज्ञता का भाव है।जो वक्त मिला रहा है उसे भी सजदा और जो जुदा कर रहा है ,उसे भी सजदा।

अक़्सर हम शुक्रिया कहते हुए सिर्फ खूबसूरत लोगों, खूबसूरत वक्त और खूबसूरत चीजों को स्मरण रखते हैं। लेकिन तथाकथित ख़राब वक्त को भूल जाते हैं।

मैं प्रकृति के ज़र्रे-ज़र्रे, चिड़ियों,जानवरों,संगीत ,किताबों परिवार ,दोस्त, बच्चों , हर नेक दिल शख़्स, यात्राओं का शुक्रिया हमेशा कहती आयी हूँ। ये न होते तो आज मैं जो हूँ ,वह न होती। आज भी इनका शुक्रिया सर झुकाकर करती हूँ ।

लेकिन आज मैं उन चीजों की भी शुकगुज़ार होना चाहूंगी जिन्हें अक्सर भूल जाया करती हूँ।

हर उस इंसान का शुक्रिया जिसने मुझे हर्ट किया । इंसान को पहचानने की सलाहियत इसी ज़ख्मी दिल ने अता की है।

हर उस इंसान का शुक्रिया जिसने मेरे साथ ख़राब व्यवहार किया। अब मैं जान गई हूं कि किसी और के साथ ऐसा कटु व्यवहार नहीं करना है।

हर उस वक्त का शुक्रिया जिसने बेचैन रातें,ख़ाली जेबें और आँसू भरी आंखें दीं।जेहनी मजबूती और इम्पैथी इन्हीं दिनों का तोहफा है।

हर दुःख का शुक्रिया कि उसने हर बार थोड़ा और ज़्यादा इंसान बनाया है।

इस लॉक डाउन के वक्त का भी शुक्रिया रहेगा सदा कि ख़राब से खराब समय भी कभी ख़ाली हाथ नहीं लौटाता। ख़ुद से परिचित हो रही हूँ रोज़,अपनी ताकत,अपनी कमज़ोरियां ,अपने धैर्य को परख रही हूँ। एकांत का इससे बेहतर अवसर कदाचित कभी नहीं मिलेगा। कुछ अच्छी आदतें जीवन में जुड़ गई हैं,कुछ बुरी आदतें अलविदा कह रही हैं।

इस कायनात में कुछ भी ऐसा नहीं जिसके प्रति कृतज्ञ न हुआ जा सके।कोई भी चीज़ अनुपयोगी नहीं।

और सबसे आख़िर में प्रिय दोस्त Sudipti का गले लगाकर शुक्रिया कि वह चंद पल के लिए हृदय को कृतज्ञता से भर देने का माध्यम बनी।

शुक्रिया और प्रेम सभी को ।

[2]

घूंघट को तोड़ कर जो सर से सरक गयी
ऐसी निगोड़ी धानी चुनर को सलाम

सपना वासु की स्मृतियों में खोये हुए चली जा रही है, चली जा रही है ..बस चली ही जा रही है ! उन सारी जगहों पर, जहां कभी उसने वासु के साथ एक भी लम्हा बिताया था, जहां उसका इश्क लोबान बनकर आज भी महक रहा है ! समंदर की लहरें मानो स्मृतियों का प्रतीक हैं जो लगातार पूरे वेग से आकर दिल से टकरा रही हैं ! दोनों आँखों से आंसूओं की लकीर चेहरे के ठीक बीच में आकर रुक गयी है , उनकी अपनी प्रेमकथा की तरह ! इन दो लकीरों के बीच वासु की शरारतें याद कर मुस्कुराते उसके होंठ जैसे पूर्ण सूर्यग्रहण के ठीक पहले बनी वो अद्भुत और दुर्लभ हीरे की अंगूठी । सिर्फ दो क्षणों के लिए दिखाई देती एक ऐसी कौंध जिस पर नज़र टिककर रह जाए ,जो एक बार देखने के बाद फिर कभी न बिसराए । आंसू और मुस्कान के इस संधिस्थल पर जो रोशन है वह प्रेम के अलावा कुछ नहीं हो सकता !
वासु नहीं है लेकिन वासु के अलावा और कुछ नहीं है ! सपना भी सपना नहीं है ,वासु है ।सारा संसार ही वासु है ।

सपना के पीछे पीछे उसे हैरत से देखती चलती उसकी माँ है ! सपना के मन की कोई थाह नहीं मिलती उसे ! उसके चेहरे पर उलझन के भाव हैं ! उसे अपनी बच्ची का यूं दर दर फिरना समझ नहीं आ रहा है , कभी आएगा भी नहीं ! प्रेम क्या क्या कौतुक करवाता है, ये दीवानों के अलावा कौन समझेगा भला ?

दीवानी हर उस शय को सजदा करती है जिसने उसे कहीं का न छोड़ा ! उसे बदनाम करने वाली गली, शहर को सलाम ! प्रेम में डुबो देने वाली लहर और भंवर को सलाम ! मिलाने वाले वक्त के साथ जुदा करने वाले वक्त को भी सलाम कि वह जानती है कि बिछुड़ना मुहब्बत की ज़रूरी रस्म है ! वो सारी रस्में शिद्दत से निभा रही है ! प्रेम में वह टूटी नहीं है , बल्कि बगावती हो गयी है ! सारी दुनिया को ठोकर में रखकर मान से चलती हुई सपना की आँखों में प्रेम का समंदर ठाठ मारता है ।
सारे पहाड़ टूटने के बाद भी इन पलों में सपना से पूछता कोई कि ” बता बावरी ..अब कभी करेगी प्रेम ? ” तो उसका बस एक ही जवाब होता ” सौ बार , हज़ार बार , लाख बार ”

कुछ गीत सारी व्याख्यायों के बाद भी शब्दों के परे हैं ! ये एक ऐसा ही गीत है !

ऐ प्यार तेरी पहली नज़र को सलाम ….

लता को सलाम इस गीत में शहद भरने के लिए, आनंद बख्शी को सलाम इस गीत को रचने के लिए और रति को सलाम इसे जीने के लिए ।

[1]

पन्द्रह अगस्त के बाद | शैलेन्द्र

पन्द्रह अगस्त के बाद ( an excerpt ) 1947/48

राम राज्य का ढोल बजाया ,
नेता ने कंट्रोल उठाया,
काले बाज़ारी बनियों को,
दिल में, दिल्ली में बैठाया;
खुल्लम खुल्ला लूट मच गयी,
महंगाई ने रंग दिखाया !

आज़ादी की चाल दुरंगी ,
घर घर अन्न , वस्त्र की तंगी ,
तरस दूध को बच्चे सोए ,
निर्धन की औरत अधनंगी ,
बढ़ती गयी गरीबी दिन दिन,
बेकारी ने मुँह फ़ैलाया !

तब ग़रीब ने शोर मचाया ,
बहुत सहा अब नहीं सहेंगे !
कहाँ गए वे वादे ?
अब हम भूखे नंगे नहीं रहेंगे !
सुन ललकार जगी जनता की,
दिल्ली काँपी, दिल थर्राया !

लीडर ने तरकीब निकाली,
हिटलरशाही को अपनाया ,
जगह जगह गोलियां चलाई,
नेताओं को जेल भिजाया;
उम्मीदों की सीता हर ली,
अपना रावण रूप दिखाया !

सोशलिस्ट कहलाने वाले, बोले,
” पैदावार बढ़ाओ !”
पेट सेठ का कहाँ भरा है,
और खिलाओ, और ठुंसाओ !
“झुक पटेल की चप्पल चूमी,
मौका देखा, पलटा खाया !

संघ खुला, खददरजी बोले,
” आओ तिरंगे के नीचे !
रोटी ऊपर से बरसेगी,
करो कीर्तन आँखें मींचे !
तुमको भूख नहीं है भाई,
कम्युनिस्टों ने है भड़काया !”

लेकिन भैय्या, भूख आग है,
भड़क उठे तो खा जाती है,
नहीं गोलियों से बुझती है,
गुपचुप जेल नहीं जाती है !
भूख बला है, कुछ मत पूछो,
बड़े बड़ों को नाच नचाया !

गवरमिंट बटुआ दिखलाती,
कहती, कौड़ी पास नहीं है,
चाहो तो गोली खिलवा दें ,
गोली कभी खलास नहीं है !
छोड़ दिए जासूस हज़ारों,
तरह तरह का डर दिखलाया !…

सौजन्य दिनेश शंकर शैलेन्द्र