शैलजा पाठक की कविताओं में स्त्री | राजेन्द्र देथा

समकालीन कविता में हिन्दी के जिन युवा स्वरों में कुछ प्रतिनिधि उभर कर आये हैं उनमें शैलजा का नाम अगली सफ़ में है।वह कुर्सी लगाकर विमर्श करने वाली स्त्री कवियों से दूर अपने एक लौकिक मुहावरे की कवयित्री हैं।जिस तरह के वाद फर्जी स्त्रीवाद को पेश करते हैं उन सबसे दूर शैलजा अपनी कविताओं में भारतीय स्त्री के सच्चे बयान पेश करती हैं।उनके यहां स्त्री कविताओं का अतिक्रमण जरूर है लेकिन वह अतिक्रमण इतना अलग ढंग का है कि उसको अतिक्रमण कहना मुश्किल हो जाता है।उनकी कविता की एक पंक्ति लीजिए –

“तुम्हारे देर से आने पर
मैं फिक्र जताती हूं
और मेरे देर से आने पर तुम शक”

दरअसल शैलजा इस नुगरे समाज की सच्चाई को बयान करती है जिसे हम कविता कह देते हैं।इतनी सपाटबयानी में भी वह बहुत ठीक बात कह जाती हैं।यह उनकी कविता की मुनादी ही मानी जाए।’अधूरी सुफेद कहानियों सी औरतें में की कुछ पंक्तियाँ देखें –

“जब मांग उजड़ जाती उनकी
तो उनके भाग्य भी उजड़ जाते
जिस घर की नींव में उन्होंने धूप दबाई थी
उस घर के आँगन से बेदखल कर दिए जाते
उनके हिस्से के उजाले
वो औरतें छुवा छूत की बीमारी की तरह रहती
कि सामने आ जाएँ तो
बज्जर पड़ जाए शुभ काम में”

हम इतने दुर्गम और दोगले समाज में हैं जहां पुरुष अपनी प्रगतिशीलता दिखाने के तमाम ढोंग रचता है लेकिन पर्दे के पीछे वह अपना एक नया चेहरा लिए हुए रहता है।इन नकाब में छुपे चेहरों की पहचान पाठक अच्छे से जानती हैं।उनके यहां कृत्रिमता का लेशमात्र अभाव है।छद्म विमर्श भी नहीं।जो इस समाज में दिखता वही वह चुपचाप दर्ज करती हैं।उनकी कविता निर्णायक का निर्णय आप करिए –



“वे निर्णायक की भूमिका में थे
अपनी सफ़ेद पगड़ियों को
अपने सर पर धरे
अपना काला निर्णय
हवा में उछाला

इज्जतदार भीड़ ने
लड़की और लड़के को
जमीन में घसीटा
और गाँव की
सीमा पर पटक दिया

सारी रात गाँव के दिये
मद्धिम जले
गाय रंभाती रही
कुछ न खाया

सबने अपनी सफ़ेद पगड़ी खोल दी
एक उदास कफन में सोती रही धरती

रेंगता रहा प्रेम गाँव की सीमा पर”

जब पहली बार बोधि प्रकाशन गया था तो माया जी से कुछ अच्छी किताबें लेनी चाही तो उन्होने शैलजा पाठक का एक संग्रह दिया था।वह पूरा पढ़ लिया था और मन में एक बार बैठ गयी थी कि यह कवि सच्चाई को बयान करने वाला कवि है विमर्श का नहीं।उनकी कविताओं में आयी स्त्री मेरे गांव में, आपके गांव में, सूबे में,राष्ट्र में आयी स्त्री है।शहर की हालात को छोड़कर कस्बाई,और गांवों की स्थिति देखें तो स्त्रियों की स्थिति वही है जो शैलजा की कविता में हैं।उनकी कुछ कविताएँ देखिए –

स्त्रियाँ
————————-
स्त्रियाँ कोई वर्ग नही होता
धर्म नही जात नही होता
सब मिलकर बस वो स्त्री होती है

कुछ प्रकार होते है

कुछ ऐसी जिनकी चमचमाती
गाड़ियों के पीछे काले शीशे होते हैं
उनके तलवे नर्म मुलायम होते हैं
उनके नीचे जमीं नही होती
वो लड़खड़ाती चलती हैं

कुछ ऐसी जो गाली खाती है
मार खाती है और अपने आप को
अपने बच्चों के लिए बचाती है

एक ऐसी जो अपने को दाव पर लगा कर
पति के सपनों को पंख देती है

और एक ऐसी जो सपने नही देखती
एक वो जो जलती भुनती अपने
मुस्कराहट को सामान्य बनाए रखती है

कुछ स्त्रियाँ मरी हुई एक देह होती हैं
मशीनी दिनचर्या की धुरी पर
घुरघुराती काम निपटाती

ये सभी प्रकार की स्त्रियाँ
मरती हैं एक सी मौत

जब इनका सौदा किया जाता है
जब इन्हें रौदा जाता है
जब इनके गर्भ में इन्हीं का कतल होता है
इनके आसुओं का रंग लाल होता है

दर्द के थक्के जमे होते है इनकी देह में..

एक औरत
—————————
एक औरत तेज़ बुखार में बडबडा रही है
छत पर फैला हुआ हैः गेहूं
आंधी से बिखर ना जाए
समेट लेना
छोड़ देना मुठ्ठी भर दाने
उस घयाल कबूतर के लिए
जो चलता सा घिसटता हुआ कुछ दाने उठा ले जाने की पूरी कोशिश करता है
घोसले में भूखे न रह जाए बच्चे

एक औरत सफ़ेद छत की तरफ देखती बडबडा रही है
आँगन के नल से लगातार गिर रहा है पानी
कोई सुनो बंद कर दो
लगा दो उसके निचे कोई बाल्टी
की बूंद बूंद से भरा रहेगा आँगन

अरे पीछे गली के मोड़ पर पर सब्जी वाले को देने रह गये हैं कुछ पैसे दे देना
याद से और लेते रहना उसके यहाँ से हरी सब्जियां
पुरे आठ लोगों का परिवार चलाता है वो

एक औरत की बीमार खटिया के आस पास कोई नही है
कुछ रंगीन गोलियां है कुछ कड़वी पर्चियां
कटोरी में लगभग सूखे हुए दाल का पानी है
औरत लगभग उसी रंग की हो चली है

बीमार हो तो बहक जाती हैं औरतें
तेज़ बुखार से तेज़ होती हैं इनकी फिक्रें
आज व्रत है की दिन है कोई पूजा का अरे छूट गया प्रदोष का व्रत खाली हो गई होगी भोग की कटोरी
पौधों में पानी डाल तो रहे हो न
गेट में दो ताला बन्द करना
मोगरे गिरे तो प्लेट में रख देना
लगातार बड़बड़ा रही औरत के मुह पर भिनक रही मख्खियों को नही उड़ा पाते उसके हाथ
आँखे उलट पलट कर करती हैं किसी आहट का इंतज़ार
हज़ार हज़ार फ़िक्र में पड़ी बीमार औरत की खटिया तक कोई नही आता जल्दी
मौत भी

दाल की सूखी कटोरी में चमक दमक महक स्वाद आग भूख की यात्रा समाप्त होने को है

बस पीली पपड़ी सी बची रह गई औरत के हिस्से की आंधी जो चल जाए …

ये दूर बियाही बेटी की खबर लेते रहना बड़बड़ा रही है
ये बड़बडाएगी
ये कमाल की औरतें हैं
अपनी आदत से बाज नही आएँगी….

वे कविताओं में ज्यादा कलात्मक होने का पक्ष नहीं रखती।अपनी बात सामान्य ढंग से कहकर प्रभाव छोड़ती है।उनकी तमाम कविताएँ इस बात का प्रमाण पेश करती हैं।शिल्प विधान को भी इतनी तरजीह नहीं देती वे।

(एक और बार)

जानेमन तुम कमाल करती हो….
————————————
साडीयों में लगा रही है पिन
बड़ी सजग है कन्धों और पेट को लेकर
ये दो चीजें ढांकती है
जो अक्सर उधेड़ देते हो तुम

ये पतली कलाइयों पर फटाफट
खनका लेती है रतजगे

ये सूरज को तुम्हारी आँख से ओझल कर जाती हैं
इनकी पुरानी बिंदियों से चिपकी हैं दीवारें
ये नई को उसके बगल में चिपकाती हैं
इनकी उलझनों से चोक हो जाती है नालियाँ
ये गलियों के घूरे पर टीले सी पाई जाती हैं

सुनहरे बाल गहरी आँखों चिकने शरीर वाली औरतें
नहाती हुई गुनगुनाती हैं
सजती हुई बड़ी देर लगाती हैं
ये काले घेरों में भरती हैं मुलायम सफेदी
आँख को खिंच लेती हैं कान तक
बालों को बिखेरे रहती हैं कमर के इर्द गिर्द
बेवाइयों पर फेरती हैं हाथ और सिसक जाती हैं
ये चुनती हैं सेंडिल की ढंकी रहे एडी
ये जरा ऊँचे हील पर उचक जाती हैं
ये सबसे चमकीली चप्पल पहन कर बाहर जाती है
इनके थके हुए पैर हँसते हैं इनपर
ये बेवजह बिछिया को गोल गोल घुमाती हैं

बीस साल की व्याहता कमर के गिर्द उभरी है मांसल करधनी
ये सफ़ेद पड़ गई औरतों की यशगाथा है
ये बड़ी धीरे से उठती हैं
संभल कर बैठती हैं
ये बार बार निहार आती है
वाशरूम में लगा आइना

इनके बैग में भरे हुएहैं लाल गुलाबी रंग बिंदी और खुशबु
ये उन्हें छाती से लिपटा रखती हैं
ये खिलखिलाती हैं तो हाथ मुँह पर रखती है
ये रोतीं हैं तो हाथ छाती पर
ये चलती हैं तो घुटनों पर सहलाती है हाथ
ये एक हाथ से दूसरे हाथ की चूड़ी पहनती है उतार जाती है

और तुम कहते हो कमाल की औरतें है
कितने तिरिया चरित्तर दिखाती हैं!

तमाम छद्म और पश्चिम के विमर्श को आगे लाकर कविताओं में मसाला भरने वाले/वालियों को शैलजा पाठक को पढ़ना चाहिए।

टिपण्णी- राजेन्द्र देथा युवा कवि है और कविताओं पर समय- समय पर टिप्पणी करते है. मूलतः बीकानेर जिले के गाँव के रहने वाले है । अभी जयपुर में अध्ययनरत है।

उत्सवनुमा कोलाहल | हेमन्त झा

यह भी राजनीति का एक पक्ष है। आप अपनी सुविधा के हिंसाब से इसे कुरूप या सुरूप कह सकते हैं।
आपदा में भी अपना पोस्टर आगे कर लेना…और…चारणों की जमात का लग जाना उस पोस्टर पुरुष की जय जय कार में, तालियां बजाते सेलिब्रिटीज, सिर हिनहिनाते भेड़ों के झुंड के झुंड…शहर दर शहर…उन्हें थालियां पीटते, घण्टे बजाते, पटाखे फोड़ते हुए लाइव दिखाते न्यूज चैनल…।

ऐसे उत्सवनुमा कोलाहल में ये सवाल पीछे छूट जाते हैं कि कोरोना संक्रमण से निबटने की सरकारी तैयारियां कैसी हैं…कि इस संकट से उपजी अन्य आपदाओं से निबटने के लिये सरकारें क्या कर रही हैं।

“…मोदी जी के आह्वान पर 130 करोड़ भारतीय एकजुट…” का कैप्शन लगातार दिखाते न्यूज चैनलों पर मंत्री जी, नेता जी, सेलिब्रिटीज जी आदि लोगों को थालियां-तालियां पीटते ऐसे दिखाया जा रहा था जैसे दीवाली में फुलझड़ी जलाते बड़े लोगों को दिखाया जाता है। फिर उनका वक्तव्य, जैसा कि प्रकाश जावड़ेकर को हमने कहते सुना, “देश के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि किसी नेता के आह्वान पर 130 करोड़ लोग एक साथ थालियां बजा रहे हों”…या कि अनुपम खेर का यह कहना…”अपने जीवन में मैंने ऐसा कभी नहीं देखा…।”

अपनी ब्रांडिंग करने और करते रहने का बेहतरीन हुनर जिसमें हो, राजनीति में वह उतना आगे जा सकता है। यह ‘पोस्ट-ट्रूथ पॉलिटिक्स’ के आज के दौर का स्वभाव है, उसकी प्रकृति है।

सत्य को नेपथ्य में धकेल कृत्रिम माहौल की निर्मिति, जिसमें जनमानस अजीब से धुंध का शिकार हो जाए। सत्ता की विफलताएं ढकी रहें और राजनीति चलती रहे…भेड़ों के झुंड मुंडियां हिनहिनाते रहें, विचारशील लोगों की चिंताएं अप्रासंगिकताओं के हाशियों में गुम होती जाएं।

जिस वक्त न्यूज चैनल बॉलकनी और चौराहों पर थालियां पीटते लोगों को दिखा कर हमें देशभक्ति और राष्ट्रीय एकता से ओतप्रोत कर देने की भाषा में संबोधित कर रहे थे, हर तीसरे चौथे वाक्य में ‘मोदी जी के आह्वान’ की महिमा को बखान रहे थे, ठीक उसी वक्त पटना के विभिन्न रेलवे स्टेशनों पर, बस स्टैंड पर सुदूर राज्यों से भाग कर आए बिहारी श्रमिक, आम लोग हलकान हो इधर-उधर भटक रहे थे। अचानक से तमाम ट्रेनों को रद्द करने की घोषणा, बसों का बंद हो जाना, दुकानों, रेस्टोरेंट्स की बंदी… हजारों लोग सांसत में।

आखिर… रोजगार खो कर मुंह लटकाए अपने गांव को वापस लौटते लोगों की भीड़ भी इसी ‘130 करोड़ भारतवासियों’ का हिस्सा है जिनके लिये न सरकार के पास कोई स्पष्ट और कल्याणकारी दृष्टि है, न मीडिया को उनके लिये वक्त है।

कोई नहीं जानता कि बाहर से आने वाली उस भीड़ में कितने लोग संक्रमित हैं। यहां तो तीन अस्पतालों से गुजरने के बाद पटना एम्स में रोगी मर गया उसके बाद पता चला कि…”अरे, यह तो कोरोना संक्रमित था”।

जब हम अपने राज्य और देश की आधारभूत संरचना के बारे में वास्तविक तथ्यों का पता करने का प्रयास करते हैं तो सांसें थमी की थमी रह जाती हैं…”हे भगवान, अगर संक्रमण का दायरा थोड़ा भी बढ़ा तो हालात काबू से बाहर हो जा सकते हैं।” विशाल आबादी को देखते हुए स्वास्थ्य तंत्र की आधारभूत संरचना के मामले में हमारा देश तो दरिद्र है ही, हमारा राज्य तो परम दरिद्र है।

तो…सच्चाइयों का सामना करने-करवाने से बेहतर है कि आपदा में भी उत्सव के सूत्र तलाशे जाएं।

तो, हमने सुसज्जित फ्लैट्स की बॉलकनी में जा कर, सड़कों और चौराहों पर भीड़ लगा कर उत्साह और जिजीविषा के साथ थालियां पीटी, तालियां बजाईं, पटाखे फोड़े। झुग्गियों और फुटपाथ के बच्चों का भी उत्साह देखने लायक था…छोटे छोटे हाथों में थामी थालियों की टन टन टन टन की आवाजों के साथ उनकी उन्मुक्त खिलखिलाहटें…।

हम उम्मीद करें कि ये मासूम और निर्दोष खिलखिलाहटें कायम रहें और आपदा जल्दी से गुजर जाए।