रोमानी विचारोध की प्रखर और आत्मीय अभिव्यक्तिः आधी रात की प्रार्थना | आईदानसिंह भाटी

सतीश छिम्पा राजस्थानी और हिन्दी के चेतना-प्रवणकवि है। इनकी चेतना की नींव रोमानी विचारबोध है। जिस पर समकालीन की प्रखर और आत्मीयकाव्य-ईमारत खड़ी है। अंग्रेजी शब्द ‘रोमेन्टिसिज्म’ हिन्दी तक आते आते छायावाद में रूपान्तरित हो गया लेकिन यहाँ भी इसे स्थूल के विरूद्ध सूक्ष्म का विद्रोह’ ही कहा गया रोमेन्टिक को हिन्दी में रूमानी अथवा रोमानी शन्य से अभिव्यक्त किया गया। रोमानियत में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों और सामाजिक रूढ़ियों के प्रति विद्रोह अथवा क्रान्ति की ज्वाला समाहित रहतीं है। सतीश छिम्पा के हिन्दी काव्य-संग्रह ‘आधी रात की प्रार्थना’ की कविताएँ इस विद्रोह और क्रांति – ज्वाला को प्रत्येक कदम पर पुण्ट करती है।
स्त्री-पुरुष प्रेम सम्बन्धों को सतीश छिम्पा ने रूढ़ नैतिकता से निकालकर मानवीय संवेदना के आधुनिकता बोध से प्रकट किया है। प्रसाद ज्ञान की इड़ा को ‘तर्कों के जल से रूपायित करते हैं तो छिम्पा भी किसी पुराने घिसट चुके निम्न का प्रयोग नही करते हैं और अपने भीतर उठ रहे भावों के ज्वालामुखी को उत्सव का नाम देते हैं। उनका प्रेम ‘इस मौजूदा दुनिया का पहला और अंतिम अनछुआ शब्द है ‘जिसे वे अपनी से गालेना चाहते हैं।’ उनके इस रोमेन्टिक प्रेम में ‘लालों के सुन्दर फूल’, ‘बहुत सा प्यार है , फूलों के नीले अहसास है, रंगों से भरा अकेलेपन का संसार’, ‘प्यार रात और एक मुलायम सी लडकी’ है, ‘यादों के रूप में भविष्य की कॉफी पीती बांहों में नीले महकते पर”, ‘लाल अक्षरों से लिया लिखें, प्रेम कहानियों के बीच चुबन के निशान’ है ,“एक धुंधरे से अक्स में हँसती दुबली सी लड़की जेनी है, मौसमी के पर हवाएँ प्यार का संगीत बजाती है,’ , चश्में के पीछे चमकती आंखों में ख्वाबों के बीजों की अंगड़ाईयाँ है, प्रीत के फिरोजी मौसम’ है , प्रेमिल नजरों की धडकनें महबूबा की पलकों को चूम लेना चाहती है?, ‘चेरी के फूल से प्रीत होठ हैं, प्रीत की ‘पछुआ सांसें, है’ सपनों के पिघलते शब्द’ है, रातें भीगी’ याद के आँसूनों से, “खिलता दिन, बारिश और चश्में वाली लड़की” है, ‘पनिराईलाल आंखों वाला लड़का है, ‘बॉयकट वाली लड़किया’ है, फूलों, पेड़, और पर्वतों और नदियों के सपने देखने वाली, एक बदचलन लड़की है , प्रश्नों और लाहदनों के घेरे उलांघती’ प्रीत है.’धरसी-सी दमकती और फलों सी कविता हैकविता’, प्रेम इस धरती का सबसे प्यारा गीत है, जो शब्दहीन है, “जवान मौसमों के रियल दिन है, प्रीत की धार सी प्यासी आँखे,है और है बुद्रो जो खरीदे गये मूल्यों या सड़क छाप नैतिकता से परेखुद के मौलिक अहितकर के साथ’ खड़ा है”
आधी रात की प्रार्थना की ये प्रेम-व्यंजनाएं न केवल रोमानी और मौलिक है वरन प्रेम पर लगी वर्जनाओं को तोड़ती और ध्वस्त करती, सामाजिक रुढियों को ललकारती विद्युत क्रोध सी शब्दावली है, जो कविताओं को ***प्रणव आत्मीय और प्रखर चेतना सम्पन्न बनाती है। कवि सतीश छिपा की भाषा आंवनिकता में पगी धार के थोर सी अलग ही दिखाई पड़ती है। माँ के लिए कविताओं में इसे स्पष्ट देखा जा सकता है। ‘रोटी की चिटक, रोटी की मुळक, सूखा मरू उजाड़ बिना सपनो और उमीदों का ठाँचा जैसी शब्दावली सहेजता कठि लिखता है-
‘माँ आप बिरखा सी बरस गयीं| हरख गयीं इस घर की भीतें आँगन, देहरी और छत, भाप रोटी, पानी, साग और दिनों के पार खट्टी हिम्मत हो बुझती सांसों की आस।
‘कवि सतीश छिम्पा प्रखर वैचारीकता में पगे क्रान्तिधर्मी कवि है जो अपनी कविताओं में दोस्तोएव्सकी, लियोनार्डो, मायकोवस्की, हो ची मीन्ह, गार्सीयो द लोर्का और चे तथा जेनी जैसे नामों से अपनी विचारधारा की जडे़, प्रखर बनाते हैं।’ भेड़िया खतरनाक होता है आदमी के लिए’, भेडिया दुखी नहीं होता आदि कविताएं मुखौटा धारियों का मुखौटा नौचती यथार्थ उजागर करती है-
ये एक काली सच्चाई है कि जीवन का गद्दार जब मानवीय हित की बात करता है तो उसकी अमानवीय आंखों में एक भेड़िया हँसता रहा।
भेड़िया सिर्फ टोह में होता है अवसर के भेड़िया मार देता है आदमी को भेड़िया बनाने के लिए फिर खत्म हो जाता हैं। प्यार, पीडाएं, उल्लास या अवसाद सभी कुख भेड़िया दुखी नही होता।ये सही| जिजीविषा और जीवतता की मौत पर खड़ी है। जैसी काव्य-पंक्तियां लिखने वाले सतीश छिम्पा का कवि बिना रोमानी रोमानी भावबोध के यह खन नहीं लिख सकता। मैं कवि नहीं हूँ जैसी कविताएं इस कृति में कम ही है क्योंकि कति व्यक्तिवादी नहीं, जागती आंखों में कविता लिखता है जिसमें बीमार पड़ चुके लोकतंत्र का जिक्र होता है, क्योंकि सजग आंखें समय की तासीर का हिसाब लिखती है और ये तासीर बड़ी मारक होती है। आप हम और समग्र कविता कवि की प्रखर विचारणा की गवाही देती है-
‘मैकडॉनल्ड्स में बैठ बर्गर खाते आप कर सकते हो – चे ग्वेरा हो ची मिन्ह गार्सीयो द लोर्का पर बहस महंगी सिगरेट के धुएं में उड़ा सकते हो क्रांति की बातें। पर दोस्त हमने चे को जिया है,
लोर्का बसा है हमारे घर प्रतिरोध में।’
कवि आओ शोक मनाएं, हरजंस गाएं कविता कहता है कि ये बुद्धिजीवी, परजीनी और पूंजीवाद के पोषक ‘ युग का महान पलटाब ‘ नहीं करेंगे। युग का महान पलटाव हम असभ्य लोग ही करेंगे-
हम असभ्य लोग, अनपढ़ निम्न जीवन शैली के मगर हर वर्ग से शत्रु से युद्ध की हद तक घृणा से भरे हुए हम असभ्य लोग इस अँधेरे गांव के लोग’
कवि हल की कलम में श्रम की स्याही डालकर प्यार की कविता लिखना चाहता है। वह दुनिया के सभी शरीफ़ों, देवपुरुषों पारलौकिक, आकाशीष्ट आर महान लोगोंक , मूखौटे नोचता है। वह गली में खेलतेनंग – धडंग बच्चों को देखता है। वह मखमली गड़ों में छिपी सपनों की नींद में सोये बालकों को देखता है, तो उसे लगता है कि यर कैसा समाज अवसरवादी, धूर्त, कॉम्पिटिशन में डूबा, दूसरों के कंधों पर रखकर कामयाबी छूता हुआ रोज धर्म, जाति, भाषा के नाम पर कत्ल करवाता, ब्लैकमेलिंग को हथियार बनाता उसकी आँखों के सामने पसरा है। वह सोचता है, सवाल करता है। उसको बैचेनी है। अनिद्रा और कसमसाहट है। कवि जी रहा है खुद के मोलिक के साथ। किताबें कोख है। महान मनुष्य की ‘ करता कविता में कविशब्द स्थापित करता है।”किताबें एतिहासिक कब्रगाह है हिटलर मुसोलिनी, हिरोहितो और बेतिस्ताओं और पिनोशे की। / किताबें कोख है। महान मनुष्यों की मुक्ति की, शब्द की और सामूहिकता सुन्दरता और न्याय की किताबें धर्म की अंधी तासीर को खत्म करके जीवन को स्थापित करती है। कवि सतीश छिम्पा आओ साथी ‘ में आव्हान करते हुए कहते हैं कि आओ झूठ के नवजात हाथों को उखाड़ आएमान के भरम को तोड़ दें। कवि दलालों की रातों की नींद उड़ाते हैं भेड़ियों ,की भी नींद हराम हो जाती है जब कलमें न्याय की स्याही से मुक्ति गावाएं लिखती है। अथवा जब हाथ जुड़ने की बजाय मूट्ठी की शक्ल लेते हैं। कवि का विश्वास है कि मौत की देह पर हरियल जीवन और जीवन की चमकती लो अवश्य जलेगी और अंधेरे को दूर करेगी।
इस कृति की भाषा संवेदनशील, विचारप्रक्ता प्रतीकात्मक और बोधगम्य है। आधुनिक हिन्दी कविता में यह संग्रह प्रीत और सामूहिकता के प्रकाश पुंज के रुप में पाठकों को सदैव याद रहेगा। आधी रात की प्रार्थना की विषयवस्त और क्लारूप कविता की सम्प्रेषणीयता में सहायकसहायक है। क्रांति की इस रोमानी लौ का मेरा सलाम।

शैलजा पाठक की कविताओं में स्त्री | राजेन्द्र देथा

समकालीन कविता में हिन्दी के जिन युवा स्वरों में कुछ प्रतिनिधि उभर कर आये हैं उनमें शैलजा का नाम अगली सफ़ में है।वह कुर्सी लगाकर विमर्श करने वाली स्त्री कवियों से दूर अपने एक लौकिक मुहावरे की कवयित्री हैं।जिस तरह के वाद फर्जी स्त्रीवाद को पेश करते हैं उन सबसे दूर शैलजा अपनी कविताओं में भारतीय स्त्री के सच्चे बयान पेश करती हैं।उनके यहां स्त्री कविताओं का अतिक्रमण जरूर है लेकिन वह अतिक्रमण इतना अलग ढंग का है कि उसको अतिक्रमण कहना मुश्किल हो जाता है।उनकी कविता की एक पंक्ति लीजिए –

“तुम्हारे देर से आने पर
मैं फिक्र जताती हूं
और मेरे देर से आने पर तुम शक”

दरअसल शैलजा इस नुगरे समाज की सच्चाई को बयान करती है जिसे हम कविता कह देते हैं।इतनी सपाटबयानी में भी वह बहुत ठीक बात कह जाती हैं।यह उनकी कविता की मुनादी ही मानी जाए।’अधूरी सुफेद कहानियों सी औरतें में की कुछ पंक्तियाँ देखें –

“जब मांग उजड़ जाती उनकी
तो उनके भाग्य भी उजड़ जाते
जिस घर की नींव में उन्होंने धूप दबाई थी
उस घर के आँगन से बेदखल कर दिए जाते
उनके हिस्से के उजाले
वो औरतें छुवा छूत की बीमारी की तरह रहती
कि सामने आ जाएँ तो
बज्जर पड़ जाए शुभ काम में”

हम इतने दुर्गम और दोगले समाज में हैं जहां पुरुष अपनी प्रगतिशीलता दिखाने के तमाम ढोंग रचता है लेकिन पर्दे के पीछे वह अपना एक नया चेहरा लिए हुए रहता है।इन नकाब में छुपे चेहरों की पहचान पाठक अच्छे से जानती हैं।उनके यहां कृत्रिमता का लेशमात्र अभाव है।छद्म विमर्श भी नहीं।जो इस समाज में दिखता वही वह चुपचाप दर्ज करती हैं।उनकी कविता निर्णायक का निर्णय आप करिए –



“वे निर्णायक की भूमिका में थे
अपनी सफ़ेद पगड़ियों को
अपने सर पर धरे
अपना काला निर्णय
हवा में उछाला

इज्जतदार भीड़ ने
लड़की और लड़के को
जमीन में घसीटा
और गाँव की
सीमा पर पटक दिया

सारी रात गाँव के दिये
मद्धिम जले
गाय रंभाती रही
कुछ न खाया

सबने अपनी सफ़ेद पगड़ी खोल दी
एक उदास कफन में सोती रही धरती

रेंगता रहा प्रेम गाँव की सीमा पर”

जब पहली बार बोधि प्रकाशन गया था तो माया जी से कुछ अच्छी किताबें लेनी चाही तो उन्होने शैलजा पाठक का एक संग्रह दिया था।वह पूरा पढ़ लिया था और मन में एक बार बैठ गयी थी कि यह कवि सच्चाई को बयान करने वाला कवि है विमर्श का नहीं।उनकी कविताओं में आयी स्त्री मेरे गांव में, आपके गांव में, सूबे में,राष्ट्र में आयी स्त्री है।शहर की हालात को छोड़कर कस्बाई,और गांवों की स्थिति देखें तो स्त्रियों की स्थिति वही है जो शैलजा की कविता में हैं।उनकी कुछ कविताएँ देखिए –

स्त्रियाँ
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स्त्रियाँ कोई वर्ग नही होता
धर्म नही जात नही होता
सब मिलकर बस वो स्त्री होती है

कुछ प्रकार होते है

कुछ ऐसी जिनकी चमचमाती
गाड़ियों के पीछे काले शीशे होते हैं
उनके तलवे नर्म मुलायम होते हैं
उनके नीचे जमीं नही होती
वो लड़खड़ाती चलती हैं

कुछ ऐसी जो गाली खाती है
मार खाती है और अपने आप को
अपने बच्चों के लिए बचाती है

एक ऐसी जो अपने को दाव पर लगा कर
पति के सपनों को पंख देती है

और एक ऐसी जो सपने नही देखती
एक वो जो जलती भुनती अपने
मुस्कराहट को सामान्य बनाए रखती है

कुछ स्त्रियाँ मरी हुई एक देह होती हैं
मशीनी दिनचर्या की धुरी पर
घुरघुराती काम निपटाती

ये सभी प्रकार की स्त्रियाँ
मरती हैं एक सी मौत

जब इनका सौदा किया जाता है
जब इन्हें रौदा जाता है
जब इनके गर्भ में इन्हीं का कतल होता है
इनके आसुओं का रंग लाल होता है

दर्द के थक्के जमे होते है इनकी देह में..

एक औरत
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एक औरत तेज़ बुखार में बडबडा रही है
छत पर फैला हुआ हैः गेहूं
आंधी से बिखर ना जाए
समेट लेना
छोड़ देना मुठ्ठी भर दाने
उस घयाल कबूतर के लिए
जो चलता सा घिसटता हुआ कुछ दाने उठा ले जाने की पूरी कोशिश करता है
घोसले में भूखे न रह जाए बच्चे

एक औरत सफ़ेद छत की तरफ देखती बडबडा रही है
आँगन के नल से लगातार गिर रहा है पानी
कोई सुनो बंद कर दो
लगा दो उसके निचे कोई बाल्टी
की बूंद बूंद से भरा रहेगा आँगन

अरे पीछे गली के मोड़ पर पर सब्जी वाले को देने रह गये हैं कुछ पैसे दे देना
याद से और लेते रहना उसके यहाँ से हरी सब्जियां
पुरे आठ लोगों का परिवार चलाता है वो

एक औरत की बीमार खटिया के आस पास कोई नही है
कुछ रंगीन गोलियां है कुछ कड़वी पर्चियां
कटोरी में लगभग सूखे हुए दाल का पानी है
औरत लगभग उसी रंग की हो चली है

बीमार हो तो बहक जाती हैं औरतें
तेज़ बुखार से तेज़ होती हैं इनकी फिक्रें
आज व्रत है की दिन है कोई पूजा का अरे छूट गया प्रदोष का व्रत खाली हो गई होगी भोग की कटोरी
पौधों में पानी डाल तो रहे हो न
गेट में दो ताला बन्द करना
मोगरे गिरे तो प्लेट में रख देना
लगातार बड़बड़ा रही औरत के मुह पर भिनक रही मख्खियों को नही उड़ा पाते उसके हाथ
आँखे उलट पलट कर करती हैं किसी आहट का इंतज़ार
हज़ार हज़ार फ़िक्र में पड़ी बीमार औरत की खटिया तक कोई नही आता जल्दी
मौत भी

दाल की सूखी कटोरी में चमक दमक महक स्वाद आग भूख की यात्रा समाप्त होने को है

बस पीली पपड़ी सी बची रह गई औरत के हिस्से की आंधी जो चल जाए …

ये दूर बियाही बेटी की खबर लेते रहना बड़बड़ा रही है
ये बड़बडाएगी
ये कमाल की औरतें हैं
अपनी आदत से बाज नही आएँगी….

वे कविताओं में ज्यादा कलात्मक होने का पक्ष नहीं रखती।अपनी बात सामान्य ढंग से कहकर प्रभाव छोड़ती है।उनकी तमाम कविताएँ इस बात का प्रमाण पेश करती हैं।शिल्प विधान को भी इतनी तरजीह नहीं देती वे।

(एक और बार)

जानेमन तुम कमाल करती हो….
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साडीयों में लगा रही है पिन
बड़ी सजग है कन्धों और पेट को लेकर
ये दो चीजें ढांकती है
जो अक्सर उधेड़ देते हो तुम

ये पतली कलाइयों पर फटाफट
खनका लेती है रतजगे

ये सूरज को तुम्हारी आँख से ओझल कर जाती हैं
इनकी पुरानी बिंदियों से चिपकी हैं दीवारें
ये नई को उसके बगल में चिपकाती हैं
इनकी उलझनों से चोक हो जाती है नालियाँ
ये गलियों के घूरे पर टीले सी पाई जाती हैं

सुनहरे बाल गहरी आँखों चिकने शरीर वाली औरतें
नहाती हुई गुनगुनाती हैं
सजती हुई बड़ी देर लगाती हैं
ये काले घेरों में भरती हैं मुलायम सफेदी
आँख को खिंच लेती हैं कान तक
बालों को बिखेरे रहती हैं कमर के इर्द गिर्द
बेवाइयों पर फेरती हैं हाथ और सिसक जाती हैं
ये चुनती हैं सेंडिल की ढंकी रहे एडी
ये जरा ऊँचे हील पर उचक जाती हैं
ये सबसे चमकीली चप्पल पहन कर बाहर जाती है
इनके थके हुए पैर हँसते हैं इनपर
ये बेवजह बिछिया को गोल गोल घुमाती हैं

बीस साल की व्याहता कमर के गिर्द उभरी है मांसल करधनी
ये सफ़ेद पड़ गई औरतों की यशगाथा है
ये बड़ी धीरे से उठती हैं
संभल कर बैठती हैं
ये बार बार निहार आती है
वाशरूम में लगा आइना

इनके बैग में भरे हुएहैं लाल गुलाबी रंग बिंदी और खुशबु
ये उन्हें छाती से लिपटा रखती हैं
ये खिलखिलाती हैं तो हाथ मुँह पर रखती है
ये रोतीं हैं तो हाथ छाती पर
ये चलती हैं तो घुटनों पर सहलाती है हाथ
ये एक हाथ से दूसरे हाथ की चूड़ी पहनती है उतार जाती है

और तुम कहते हो कमाल की औरतें है
कितने तिरिया चरित्तर दिखाती हैं!

तमाम छद्म और पश्चिम के विमर्श को आगे लाकर कविताओं में मसाला भरने वाले/वालियों को शैलजा पाठक को पढ़ना चाहिए।

टिपण्णी- राजेन्द्र देथा युवा कवि है और कविताओं पर समय- समय पर टिप्पणी करते है. मूलतः बीकानेर जिले के गाँव के रहने वाले है । अभी जयपुर में अध्ययनरत है।