‘औघड़’ । टिप्पणी

“हुक्के को सुलगाने का प्रयास किया तो घड़.. घड़… की ध्वनि औघड़..औघड़..हो गई!किताब को पुनः नजर गड़ाकर देखा,उस पर बने चित्र को देखा… क्या यही है औघड़…काश हम भी औघड़ हो जाये,कितना कुछ करना होता है औघड़ होने के लिये”

राजू धीरोड़ा । टिप्पणी

नीलोत्पल मृणाल के उपन्यास ‘औघड़’पर टिप्पणी

औघड़ का अंतिम अध्याय 31 वां पढ़कर किताब को दराज की और सरकाने को हाथ बढ़ाया ही था कि,लगा जैसे किताब हाथ से चिपक गई है,कोई फेविकॉल से चिपक गया।

हुक्के को सुलगाने का प्रयास किया तो घड़.. घड़… की ध्वनि औघड़..औघड़..हो गई!किताब को पुनः नजर गड़ाकर देखा,उस पर बने चित्र को देखा… क्या यही है औघड़…काश हम भी औघड़ हो जाये,कितना कुछ करना होता है औघड़ होने के लिये…

उपन्यास की शुरुआत एक हंसी गुदगुदी के साथ हुई थी,गजब व्यंग्यात्मक शैली में लिखा गया ये उपन्यास अपने सफर में गांव,देहात की पगडंडियों के रास्ते चलते चलते श्मशान पर यात्रा खत्म कर गया!कहानी का अंत बिरंचिया के प्रति इतना प्रेम जगा गया,लगा उस श्मशान में लाश पर हम भी रोते…. गजब लिखे हो मृणाल भाई!

प्रेमचंद के बाद ऐसा नही है कि गांवों पर साहित्य नही लिखा गया,लिखा गया है लेकिन शायद शहर की दौड़ती भागती जिंदगी के सबसे ऊपरी पुल पर बैठकर,गांव को दूरबीन से देखकर!
प्रेमचंद के गांव उस सदी के थे जिसमें गांव सिर्फ गांव हुआ करते थे!न टेक्नोलॉजी न टी वी न गाड़ी…..आदि….

लेकिन मृणाल का गांव आधुनिक भारत का गांव है,जिसमे तकनीकी ने पैर तो पैसारे है लेकिन बिना चप्पल!यानी मोबाइल तो है लेकिन नेटवर्क के लिये अभी भी मोबाइल के डंडे कभी आते है कभी जाते है! डिश,एंटीना तो है, लेकिन बिजली उनका मजा किरकिरा कर देती है। वो खेती किसानी में मजा नही रहा यानी मान लो कि दम नही रहा! हाँ गांव के राजनीतिक षड्यंत्र ज्यों की त्यों बरकरार है यू कहे कि अपने परिष्कृत रूप में।

दरअसल मृणाल ने अपनी रचना में किसी को नही छोड़ा! न ब्राह्मणवाद,न अंधविश्वास, न पाखण्ड, न दलितवाद, न स्त्रीवाद, पुलिसवाद, डॉक्टर, दिखावा, जातिवाद, सबको लपेट लिया! मार्क्सवाद, समाजवाद को तो गांव की चोंतरी पर औंधा पटक कर मारा है।

“मार्क्सवाद ने साला सब सिखाया, लेकिन एक भारतीय बाप को कैसे हैंडिल करे ये नही सिखाया।” शेखर का कथन जब गांव में बाप के सामने सारा मार्क्सवाद ढह गया।

अपनी परंपरागत हास्य व्यंग्यात्मक शैली और शब्दो के देशीपन ने उपन्यास को और रोचक बना दिया है। उपन्यास ने गांव के यथार्थ को जीवंत कर दिया जहाँ सच मे जीवनधारा में सभी विचारधाराएं घुली मिली होती है। गांव की महफ़िलो में हुक्के की जगह गांजे का धुंआ उड़ने लगा है! राजनीति का घटियापन गांवो की मिठास को जहरीली कर चुका है।

कहानी का सबसे मजबूत और मजेदार पात्र है बिरंचिया जो सच को सच कहने का माद्दा रखता है, औघड़ है, औघड़! लेकिन उपन्यास के अंत मे सामंती ताकतों द्वारा मार दिया जाता है।

गांव आज भी भरोसे और विश्वास पर चलते है! “ये गांव का ही माहौल था कि भले दीमकों ने बक्से की लकड़ी खाली है लेकिन एक जंग लग रहे ताले की भरोसे की लाज आज तक कायम थी!” ये गांव का ही विश्वास है कि घर का दरवाजा तोड़ा जा सकता है लेकिन ताला तोड़ने का पाप कोई नही करता!

उपन्यास का प्रारम्भ आप को सीधे गांव ले जाता है,आप समझ नही पाते कि ये घटना बिहार के गांव की है या अपने गांव की! इसे पढ़कर लगा कि गांवों की आत्मा एक है, संस्कृति एक है। जो विरासत शहर खा गया उसके खंडहर गांवों में आज भी आबाद है! “बर्तन पर मिट्टी के घरड़ घरड़ की आवाज,मानो अपने आंगन में सुबह का संगीत बज रहा हो!”

शहर की साम्प्रदायिकता अभी गांवो में अपनी उपस्थिति दर्ज नही करा पाई है! आज भी गांव के जागने का अलार्म मन्दिर की घण्टी,और मस्जिद की अजान ही है,जिसे सुनकर हिन्दू मुस्लिम सब भोर का स्वागत करते है! “गांव में मन्दिर मस्जिद में अधिक दूरी नही होती,अजान की आवाज अल्लाह तक जाने से पहले मन्दिर के देवी देवताओं तक जाती थी मन्दिर का पंडित भी अजान की आवाज सुन आरती के लिये जग जाता था।

कितना सुकून देती है न ये गंगा जमुना संस्कृति! जो अब दम तोड़ चुकी है धर्म और सियासत के एकाकार होने से! “ये गांव को ही नसीब हो सकता था जहाँ ईश्वर अल्लाह दोनो एक दूसरे को प्रेम से सुन लेते थे!”

गांव की चरमराई चिकित्सा व्यवस्था को भी उपन्यास ने बढ़िया व्यंग्यात्मक शैली में समेटा है!21 वी सदी में भी गांव एक चिकित्सक की भाट जोहता रहता है!इसका फायदा उठाते है कुछ नही जानने वाले प्रक्टिशनर डाक्टर!
“वैसे मलखानपुर में एक बिना डॉक्टर वाला प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सरकार द्वारा स्थापित था!”
“और बिना डाक्टरी की किताब देखने वाले डॉक्टर के पास मरीज कभी लेटे भी तो फिर उठ नही पाए बल्कि उठ गए!”

सदियों बाद भी गांव में अगड़ी जातियों का सामंतवाद जिंदा है, जो खुद को आज भी अठारवीं सदी सा महसूस करता है। जिसके पास आदमी और लाठी दोनो हो तो फिर उसकी जड़े कौन हिला सकता है।

“सामंती दौर गुजर जाने के बाद भी भारतीय लोकतंत्र में उस परिवार की अहमियत कभी कम नही होनी थी जिसके पास लोग भी थे और लाठी भी।”
गांव में आज भी अगर कोई किसी के बाउंड्री के पिछवाड़े भी मूत दे तो लगता है कोई दुश्मनी निकाल रहा है। “कौन है रे बेटी चोद साला हमारी दीवाल पर मूतता है”
मृणाल ने सामन्तवाद के पतन को भी अपने ही रोचक शब्दो मे व्यक्त किया है- “ये वो दौर था जब सामन्तवाद का निशाना चूकने लगा था,अब किसी ठाकुर साहब के हाथ से चली लाठी ठीक निशाने पर नही भी लगने लगी थी।”

कविता और छन्द

देवानन्द आर्य

छंद का सार्वकालिक आग्रह कविता को मंचीय बना देता है और पूर्णकालिक दुराग्रह उसे जनसामान्य से निर्लिप्त कर देता है ।

छंद कविता की सपाटबयानी ढंकने का उपकरण नहीं है । छंद मुक्त कविता में सपाटबयानी यानी गद्यात्मकता की शिकायत भी कभी-कभी काव्य ग्राहिता की कमी के कारण होती है ।

कविता को जानबूझकर सरल बनाना और जानबूझकर कठिन बनाना , दोनों कविता और पाठक के हक़ में नहीं हैं ।

‘जिस तरह तू बोलता है उस तरह तू लिख’ , ही सर्वोत्तम काव्य प्रकिया है ।

कविता छंद विहीन हो सकती है लय विहीन नहीं । एक अंतर्निहित सांगीतिकता ही कविता को जीवित और चर्चित रखती है ।

कविता की पहली और अंतिम शर्त उसका कविता होना है चाहे वह छंद में हो या छंद मुक्त । कविता दोनों जगह गायब या छिछली हो सकती है , छंद में भी और मुक्त छंद में भी ।

कविता सिर्फ शिल्प नहीं होती कि शिल्प विशेष की अनुपस्थित से उसे पास या फेल कर सकें ।

गद्य कविता छंद कविता का आगे बढ़ा हुआ विकसित और अब अपरिहार्य रूप है । गद्य में होके भी कविता कविता हो सकती है , होती ही है । छंद में होकर भी कविता कविता नहीं हो सकती , अक्सर नहीं होती भी है । यह होना न होना काव्य क्षमता और समझ से जुड़ा मामला है ।

अक्सर छंद की अनावश्यक वकालत कवि में काव्य प्रतिभा की कमी के कारण भी होता है ।