मौन | अभिषेक रामाशंकर

मेरे भीतर पसरा सन्नाटा है
मैं चाहता हूँ कोई चूमे उसे और मैं झूम उठूँ

जैसे झूमता हुआ पेड़

मैं चाहता हूँ ऐसी हवा
कि
पत्ते ज्यों के त्यों रहें
लेकिन गिर पड़े, पेड़
उठे और टहलने लगे

टहलने का हल बहलने के हल से पृथक नहीं है
फिर भी मैं चाहता हूँ बहलना
टहलना नहीं

मैं थका हुआ हरगिज़ नहीं हूँ
– सोया हुआ शख़्स हूँ
जिसे नींद में चलने की बीमारी है
ऐसा आप सोचेंगे
लेकिन मैं हैपनिक जर्क से ग्रसित हूँ

नींद में आसमान से गिरता हूँ
तो धरती मुझे लोक लेती है
चुम्बन की चोट
चोट में औचक मिले चुम्बन से जुदा है

मैं वहीं पड़ा रहना चाहता हूँ
धरती की खोह में – खनिज की तरह
कोयले में हीरे की तरह

मेरे भीतर पसरा सन्नाटा है
मैं चाहता हूँ कोई चूमे उसे और तोड़ दे
जैसे कंकर तोड़ता है ठहरे हुये पानी का सन्नाटा

जैसे कविता तोड़ती है भीतर का मौन

[ डायरी नोट्स : १७/०९/’१९ ] 🌼