छपनिया- अकाल: राजस्थान का भीषणतम अकाल | प्रो. हनुमानाराम इसराण

“छपनिया काल रे छपनिया काल,
फेर मत आइयो म्हारी मारवाड़ में।
आइयो जमाइड़ो धड़कियाँ जीव,
काँ ते लाऊँ शक्कर, भात, घीव, जमाइड़ो?
फेर मत आइयो म्हारी मारवाड़ में।
छपनिया काल रे छपनिया काल,
फेर मत आइयो म्हारी मारवाड़ में।।”

काकड़िया- मतीरे के बीजों को भूनकर खाए और किसी तरह दिन गुजारे। क़ुदरत की खूबियों को बख़ूबी समझा। उसकी गोद को ख़ूब खंगाला। भूख से लड़ने के लिए नई नई तरकीबें खोजीं। खेत-जोहड़े में विपरीत परिस्थितियों में पनपने वाले ”’बांठ”’ ( वनस्पति यथा-दरख़्त, झाड़-झंखाड़, बेल आदि ) की फलियों व उनके बीजों को अन्न के विकल्प के रूप में खाकर भूख को चकमा देने की कोशिश की। उस बीते जमाने में खेतों में बेर की झाड़ियों की बहुतायत होती थी। इसलिए हर साल उनकी कटाई करते समय भारी तादाद में बेर इकट्ठा कर बोरियां भरकर रख लेते थे। बेर खाकर भूख मिटाने का जतन किया। बेर की गुठलियों को कूटकर उसका चूर्ण बनाकर पानी के साथ उसकी ”’फाकी”’ लेकर भूख के दंश को दिलासा देते रहते। गर्मियों में खेजड़ी की फलियां अर्थात सांगरी के पकने पर जो खोखे बन जाते हैं, उन्हें खाकर संतोष करने लगे।

पुरखों की व्यथा-कथा।

राजस्थान में अनावृष्टि का मतलब घनघोर अकाल। अन्न, पानी, चारे की दुर्लभता। मानव और मवेशी –सबके जीवन पर संकट। इसका नतीज़ा भुखमरी और महामारी का भयानक दृश्य। अकाल का अन्य सांदर्भिक अर्थ दुर्भिक्ष या दुष्काल होता है।

मानसून की बेरूखी और बेदर्दी के चलते अवर्षा, अल्पवर्षा व खण्ड वर्षा ( rains in pockets ) से अकाल ने राजस्थान में जनजीवन को भारी क्षति पहुंचाई है। वस्तुतः यहाँ अकाल का मुख्य कारण अनियमित, अपर्याप्त एवं अनिश्चित वर्षा रहा है।

पश्चिमी राजस्थान का थार मरुस्थल अक़्सर सूखे और अकाल की मार सहने को अभिशप्त रहा है। जटिल भौगोलिक और विषम मौसमिक परिस्थितियों वाले इस इलाके को प्रकृति ने अतिशय गर्मी, सर्दी, सूखा, बलुई मिट्टी के उबड़-खाबड़ धरातल और अकाल जैसी आपदाओं की विकटताएं दी हैं। दूर-दूर तक फैला बालू रेत का समंदर, रेत के ऊंचे-ऊंचे टीले, गर्मी में चिलचिलाती धूप, धूल भरी आंधी और गर्म हवाएं/ लू के थपेड़े। जेठ- आषाढ़ ( माई-जून ) के महीनों में दिन के चढ़ने के साथ सूरज का रौद्र रूप। पारा 50-52 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचना यहाँ आम बात है।

इतिहास की खिड़की से झांक कर देखें तो पता चलता है कि मानसून की बेरुख़ी और बेदर्दी के कारण पश्चिमी राजस्थान में अकाल बार- बार उधम मचाता रहा है। यहां अकाल को लेकर एक कहावत प्रचलित है:

तीजो कुरियो, आठवों काल।’
अर्थात हर तीसरे वर्ष अर्द्ध अकाल, और हर आठ वर्ष में एक बार भीषण अकाल पड़ता है। इसलिए गांवों में लोग अकाल को ”’अणखावाणा पावणा”’ ( unwelcome guest ) कहते हैं।

पश्चिमी राजस्थान में अकाल का मतलब सिर्फ अन्न का अभाव ही नहीं होता बल्कि यहाँ वर्षात नहीं होने का मतलब तिहरे अकाल (अर्थात अन्न, जल एवं तृण/ चारा का अभाव ) से त्रस्त होना है। अन्न, पानी, चारे का अभाव ही भीषणतम अकाल कहा जाता है।

राजस्थान में सामान्यतया अकाल कहाँ- कहाँ अपनी धौंसपट्टी जमाता रहा है, इसे इंगित करने वाला एक दोहा है। इलाके के हिसाब से इस दोहे में कुछ रूपांतर देखने को मिलता है।

“पग पुंगल धड़ कोटड़ा, बाहां बाड़मेर ।

आवत -जावत जोधपुर, ठावो जैसलमेर ।।”

अर्थात अकाल के पैर पुंगल ( बीकानेर) में और धड़ कोटड़ा में और भुजाएं बाड़मेर में स्थाई रूप से पसरी रहती हैं। जोधपुर में भी आवाजाही रहती है परन्तु जैसलमेर तो अकाल का रहवास है।

भीषणतम अकाल
राजस्थान में सबसे भयंकर अकाल 1899 ईसवी में पड़ा। उस वर्ष विक्रम संवत 1956 होने के कारण लोक भाषा में यह ‘छपनिया/ छपन्ना काल’ के रूप में कुख्यात है। इस अकाल से मुख्यतया राजस्थान, पंजाब, गुजरात, मध्य भारत आदि क्षेत्र प्रभावित हुए।
अनावृष्टि का ऐसा कहर बरपा कि लोग बादलों की बाट जोहते रहे पर तपती रेत को बरसात की सुकून भरी बूंदे नसीब नहीं हुईं। यह भंयकरतम तिहरा ( अर्थात अन्न, जल एवं तृण/ चारा का अकाल ) था। अंग्रेजों के गजेटियर में यह अकाल ‘द ग्रेट इंडियन फैमिन 1899’ के नाम से दर्ज है।

अनावृष्टि से खेतों की जुताई नहीं हो सकी। अन्न का उत्पादन कैसे होता? बिना बरसात के तालाब, जोहड़े, कुंडों में वर्षाजल की आवक कैसे होती? पानी का जुगाड़ करना भी एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा। खारे पानी की किल्लत झेलने वाले इलाकों में तो इस समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया। गर्मियों में जलसंकट जीवन लीलने लगा। सूखी धरती पर मवेशियों के लिए चारा भी कैसे पैदा होता? इस तरह छपनिया अकाल असल में तिहरा अकाल –अन्न, जल, चारा–था।

अकाल की मार ऐसी क्रूर थी कि आमजन के लिए जीवन की गाड़ी खींचना मुश्किल हो गया। एक- एक दिन सबके लिए भारी पड़ रहा था। रात- दिन सबकी एक ही चिंता। रोटी- पानी- चारे का जुगाड़ कहाँ से और कैसे करें? वक़्त गुज़रने के साथ घरों के चौके-चूल्हों पर इस अकाल का असर साफ नज़र आने लगा। भुखमरी के हालात बनने लगे। लोग दो जून की रोटी को तरसने लगे।

जीवटता
हमारे पुरखों की संघर्ष करने की क्षमता और उनकी जीवटता कमाल की थी। भूख-प्यास, हारी-बीमारी, प्राकृतिक विपदा का सामना हिम्मत से करते थे। पलायनवादी प्रवृत्ति से बचकर रहते थे। जानते थे कि ज़िंदगी सुख-दुःख का तानाबाना है। धूप-छांव ज़िंदगी का हिस्सा है।

हमारे पूर्वज विषम परिस्थितियों से घिरे रहे; राज-सत्ता की बेरुख़ी झेली; ज़ुल्म के खिलाफ़ आवाज़ उठाई तो राज सत्ता ने कहर बरपाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। फिर भी उन्होंने हिम्मत कभी नहीं हारी। हर तरह का अभाव झेलते-सहते पले-बढ़े थे। संकट की घड़ी से उबरने के लिए कुछ नवाचार करना और बेहाली के दिनों में भी उम्मीद का दामन थामे रखना उनके स्वभाव की खासियत थी।

छपनिया अकाल के दौर में संयम को सारथी बनाकर ज़िंदगी की गाड़ी को दुर्गम रास्तों से खींचकर लाए। भूख पर नियंत्रण करना सीखा, भूख सहना सीखा। भरपेट खाना खाने की आदत त्याग दी ताकि पिछले साल का जो अनाज बचा था उससे ज्यादा दिन तक काम चलाया जा सके। अनाज बचाने की जुगत में रोटियां पकाने की बज़ाय कम आटा डालकर राबड़ी बनाकर उससे भूख मिटाने लगे।

जिंदा रहने की जुगत में क्या- क्या किया?
ज़रूरत इंसान से बहुत कुछ अप्रत्याशित करवा देती है। पेट का सवाल था। भीषण अकाल की मार सहते लोगों ने भूख से निपटने हेतु कई नवाचार किए। शतायु के नजदीक पहुंच चुकी मेरी माँ, स्वर्गीय पिता जी और मेरे गांव मेघसर ( तहसील-जिला चूरू ) के बुज़ुर्गों से छपनिया अकाल के बारे में सुनी कुछ बातों को साझा कर रहा हूँ।

अन्न की किल्लत के कारण गाँवो में शुरू में तो पिछले साल के घर में संग्रहित काकड़िया- मतीरे के बीजों को भूनकर खाए और किसी तरह दिन गुजारे। क़ुदरत की खूबियों को बख़ूबी समझा। उसकी गोद को ख़ूब खंगाला। भूख से लड़ने के लिए नई नई तरकीबें खोजीं। खेत-जोहड़े में विपरीत परिस्थितियों में पनपने वाले ”’बांठ”’ ( वनस्पति यथा-दरख़्त, झाड़-झंखाड़, बेल आदि ) की फलियों व उनके बीजों को अन्न के विकल्प के रूप में खाकर भूख को चकमा देने की कोशिश की। उस बीते जमाने में खेतों में बेर की झाड़ियों की बहुतायत होती थी। इसलिए हर साल उनकी कटाई करते समय भारी तादाद में बेर इकट्ठा कर बोरियां भरकर रख लेते थे। बेर खाकर भूख मिटाने का जतन किया। बेर की गुठलियों को कूटकर उसका चूर्ण बनाकर पानी के साथ उसकी ”’फाकी”’ लेकर भूख के दंश को दिलासा देते रहते। गर्मियों में खेजड़ी की फलियां अर्थात सांगरी के पकने पर जो खोखे बन जाते हैं, उन्हें खाकर संतोष करने लगे।

मरता आदमी क्या नहीं करता? घर में बचा- खुचा अनाज ख़त्म होने की कगार पर पहुंचा तो रेगिस्तानी धरती का कल्प वृक्ष कहे जाने वाले पेड़ खेजड़ी की ”’छोडे”’ ( सूखी छाल ) को कूटकर- पीसकर उसके महीन बुरादे को राबड़ी बनाते समय आटे की जगह इस्तेमाल कर या उसे पानी में उबालकर पीने को मजबूर हुए। जोहड़ों एवं खेत की चौड़ी ”’सींव”’ (मुंडेर ) पर उगे ”’भरूंटिया घास”'( कांटेदार घास ) के कांटो के एकदम बीच में जो बाजरे के दाने जैसे दाने छुपे रहते हैं, उन्हें बड़े धीरज से बीनकर इकट्ठा करते और फिर उनको उबालकर खाते। जिंदा रहने की जिद्द में उन्होंने वो सब कुछ किया जो करना संभव हो सकता था।

राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में शिक्षा की ज्योति को परवान चढ़ाने वाले और स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी स्वामी केशवानंद ( जन्म: दिसम्बर 1883 ) खुद ने छपनिया अकाल की त्रासदी झेली। माँ के साथ अपना गांव मंगलूणा ( सीकर ) छोड़कर केलनिया गाँव ( जिला-हनुमानगढ़ ) पहले ही पहुंच गए थे। संवत 1956 (1899 ई.) में ये इलाका भी भयंकर ‘छपनिया अकाल’ की चपेट में था। आंखों देखे हाल का बखान उन्होंने ये किया है:

“अकाल की कालिमा गहराती गयी। एक-एक कर प्राणी काल-कवलित होते गए। वनस्पति का तरल द्रव्य और जीवों की रगों में बहने वाला रक्त धीरे-धीरे सूखता गया। क्षुधा शांत करने की ऐसी भगदड़ मची कि सामाजिक रिश्ते एक बीती बात हो गई। माताओं ने अपने बच्चों को छोड़ दिया और भूखे-तड़पते मृग-मरीचिका के भ्रम में जहाँ जिसे सूझा आसरा लिया। पशुओं द्वारा खाई जाने वाली ग्वार की सूखी फलियां विलास की वस्तु बन गयी। लोग वृक्षों की छाल और भरूट घास के कांटे खाने को मजबूर हुए। शासन-तंत्र नाम की कोई चीज नहीं थी। मानव शरीरों के खून का अंतिम कतरा तक हजम करने की गीदड़ दृष्टि वाले जागीरदार, शासक इस घोर अकाल की स्थिति में सहयोग की बजाय भूख से तड़पते लोगों से कोसों दूर जश्न मनाते रहते।

( स्रोत: पं. बनारसीदास चतुर्वेदी ( प्रधान संपादक ) , ठाकुर देशराज ( संपादक ): स्वामी केशवानंद अभिनंदन ग्रंथ, मार्च 1958 ई. )

हमारे पूर्वज अनपढ़ थे पर वक़्त की जरूरत के हिसाब से अपने को ढालने और नवाचार करने में कतई नहीं हिचकते थे। इसकी एक और मिसाल प्रस्तुत कर रहा हूँ। छपनिया अकाल के दौरान गाय-बैलों के लिए पारंपरिक चारा अनुपलब्ध था। हमारे पूर्वजों ने इसका एक विकल्प खोजा। सीकर के वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी और पूर्व सदस्य, राजस्थान विधानसभा श्री रणमल सिंह ( अभी उम्र 97 वर्ष ) के अनुसार छपनिया अकाल से पूर्व गाँवो में खेजड़ियाँ छांगने का रिवाज़ नहीं था। बस खेजड़ी की कुछ टहनियों को कुल्हाड़ी या अकूड़ा से काटकर भेड़ -बकरियों को खिला देते थे। खेजड़ियों की ”’छंगाई”'( lopping ) कर उनके ”’लूंग”’ ( खेजड़ी की पत्तियां ) को पशुओं के चारे के रूप में खिलाने की जरूरत महसूस भी नहीं होती थी। कारण यह था कि खेतों में बाजरे की ”’कड़बी”'( बाजरे के डंठल ), झाड़ियों का ”’पाला”’ ( बेर की झाड़ियों की पत्तियाँ), घासफूस आदि की बहुतायत रहती थी। इसलिए मवेशियों के चारे के रूप में इन्हें ही इस्तेमाल करते थे। बता दें कि उस दौर में बुवाई के लिए ट्रेक्टर आदि उपलब्ध नहीं थे, इसलिए खेतों में छोटे बेर की झाड़ियां बहुतायत में होती थीं। उस समय गाय ही प्रमुख पशुधन था। ( शेखावाटी में ) भैंस व ऊंट की संख्या बहुत सीमित थी। लोक में उस समय की एक कहावत प्रचलित थी कि “घोड़ां राज और बल्दां (बैल) खेती”। एक बात और भी है। उस समय बाजरे के पूलों की ”’छानी”’ भी नहीं काटी जाती थी। छपनिया अकाल में पशुओं के लिए चारे की किल्लत से निपटने के लिए हमारे पूर्वजों ने एक तरक़ीब निकाली। खेजड़ियाँ ”’छांगकर”’ उसका ”’लूंग”’ और ”’छानी”'( बाजरे के डंठलों की को छोटे- छोटे टुकड़ों में काटना ) मवेशियों को खिलाने का नवाचार किया। (कुट्टी)

( स्रोत: ‘शताब्दी पुरुष – रणबंका रणमल सिंह’, द्वितीय संस्करण 2015, पृष्ठ 111-12 )

तिहरे अकाल का ताण्डव
त्रिकाल ने हर जगह, हर स्तर पर अपना तांडव नृत्य किया। भूख हर घर में पसरने लगी। हर तरफ़ भूख से बिलखते और तड़पते बच्चे, बूढ़े, जवान। हर ओर दिल दहलाने वाला मंज़र था। त्राहिमाम! त्राहिमाम! हर तरफ यही सुनाई देता था। आमजन हालात ये थे:

छपनिया अकाल के उस दौर में जिंदा रहने के लिए हर दिन लड़ाई लड़नी पड़ती थी। रात-दिन की भूख ने बूढ़े-बच्चे, जवान सबकी काया को एकदम कमजोर कर दिया। कितने कमजोर? इसे शब्दबद्ध करना मुश्किल। इंटरनेट से साभार प्राप्त कुछ फोटो इस पोस्ट के साथ नत्थी कर रहा हूँ, इन्हें गौर से देखिए और अकाल की मार से त्रस्त लोगों की दुर्दशा का अंदाज़ा लगाइए।

A picture is worth thousand words.
जो बात हज़ार शब्दों से नहीं समझाई जा सकती, वो एक तस्वीर से बख़ूबी समझाई जा सकती है।

भुखमरी का असर साफ दिखने लगा। भूख ने लोगों के तन को चूस लिया था। अत्यंत कमजोरी के कारण लोगों में उठने-बैठने के लिए भी सहारे की जरूरत होती थी। घर में सभी की हालत एक जैसी हो गई थी। कौन किसको सहारा दे? इसलिए झौपडों में जहां सोते-बैठते थे वहाँ लकड़ी का लट्ठा ( wooden support ) रोप लिया था ताकि उसको पकड़कर उठ-बैठ सकें।

बीतते दिनों के साथ भूखे लोग हड्डियों के ढांचे में तब्दील होने लगे। भूख की मार कैसी होती है ये कोई भूखा ही जान सकता है। बहुतेरे लोग भूख से इस लड़ाई में हारते गए। मौत के मुंह में समाते गए। कुछ लोग ऐसे भी थे जिनकी कमर में बंधी न्योली में चांदी के सिक्के थे पर उनके दूर दराज़ गाँवो में अनाज उपलब्ध नहीं था। नतीज़तन भूख के मारे दम तोड़ दिया।

दुर्भिक्ष ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया। अन्न का भीषण अभाव झेल रहे जन समुदाय में चोरी-चकारी, लूट-खसोट आदि कई तरह की बुराइयां बढ़ने लगीं। भूख की आग में रिश्ते-नाते झुलस गए। यहाँ तक की कुछ मनुष्य नरभक्षी हो गए। अनाज के बदले बच्चों को बेचने के भी कुछ मामले सामने आए। उस दौर में सबसे कीमती अगर कोई चीज़ थी तो वो अन्न था। किसी ओट में छुपा कर रखी हांडियों में रखे अनाज की चोरियाँ ख़ूब होने लगीं।

पलायन
आज़ादी से पहले और उसके बाद के कुछ दशकों तक राजस्थानवासी अकाल की चपेट में आने पर भादवा ( अगस्त-सितंबर ) महीने में अपने मवेशियों को लेकर पैदल ही मालवा, आगरा, मऊ की ओर चले जाते थे। वर्षा होने पर वापस लौट आते थे। मारवाड़ व बीकानेर संभाग के कुछ लोग आज़ादी से पहले सिंध की ओर भी पलायन करते थे। बता दें कि मालवा आदिवासी और किसानों के बाहुल्य वाला पश्चिमी मध्य प्रदेश का हराभरा भूभाग है जबकि मऊ उत्तरप्रदेश का जिला है। गांवों में बुजुर्गों से अब भी पलायन के बारे में एक कहावत सुनने को मिलती है, जो इस प्रकार है:

“मऊ कुण जासी?
पहली गया बे ही जासी।”

अर्थात जिन साधनहीन परिवारों के लिए अकाल में रोजी- रोटी का जुगाड़ करना यहां पर मुश्किल है, वे पहले भी यहाँ से पलायन करते रहे हैं और अब भी करेंगे। छपनिया अकाल में भी गाँवो से कई परिवार खाने-पीने और पशुओं के लिए चारे की तलाश में दूर- दराज़ प्रदेशों की ओर पलायन करने के लिए मजबूर हुए। बदक़िस्मती से मालवा भी छपनिया अकाल की चपेट में आ गया था।

जनहानि
सन 1899 में लार्ड कर्ज़न की भारत में वायसराय पद पर नियुक्ति हुयी और उसी साल छपनिया अकाल पड़ा। इस अकाल में ब्रिटिश सरकार के सीधे अधीन प्रदेशों में अकाल से प्रभावित लोगों के लिए कुछ राहत शिविर खोले गए पर उनमें लगभग 25 प्रतिशत लोगों को ही सीमित राहत मिली।

छपनिया अकाल व्यापक रूप से जनसंहारक साबित हुआ। सन 1908 में भारत के इम्पीरियल गज़ेटियर में छपे एक अनुमान के अनुसार इस अकाल से अकेले ब्रिटिश भारत अर्थात सीधे अंग्रेज़ी हुक़ूमत द्वारा शासित प्रदेशों में 10 लाख लोग भुखमरी और उससे जुड़ी हुई बीमारियों से मौत के मुँह में समा गए थे। कुछ इतिहासवेत्ता मानते हैं कि ये आंकड़ा 40- 45 लाख तक पहुंच गया था। इसमें उस समय के रजवाड़ों/ रियासतों में इस अकाल की वजह से हुई जनहानि की संख्या शामिल नहीं है।

राजस्थान और गुजरात की देशी रियासतों में शासन राजाओं के हाथ में था, वहाँ पर यह अकाल बहुत ज़्यादा जनसंहारक साबित हुआ। रियासती राजाओं ने शहरों में पीड़ित प्रजा के लिए कुछ राहत कार्य शुरू किए। पर गाँवो के प्रति राजशाही की बेरुख़ी इस भयावह त्रासदी के दौरान भी पहले की तरह बनी रही। राज-काज के नाम पर जमींदारों/ कुछ गांवों में चौधरियों के जरिए गाँवो से लगान वसूल करने पर ही ध्यान दिया जाता रहा।

शहरों में जनहानि कम हुई क्योंकि वहाँ पर कुछ दानवीर धन्ना- सेठों ने बावड़ी-कुएं खुदवाकर, खुद के लिए हवेलियां बनवाकर भूख से त्रस्त लोगों को राहत पहुंचाई। शहरों के आसपास के कुछ गाँवो में भी सेठों ने कुएं व जोहड़े खुदवाकर कुछ राहत प्रदान की। एक अनुमान के अनुसार राजस्थान की उस समय की रियासतों की जनसंख्या का 25 प्रतिशत जनता ( एक अनुमान के अनुसार 10 लाख लोग ) इस अकाल से मौत की ग्रास बन गई थी।

मवेशियों पर भी इस अकाल ने करारा कहर बरपाया। खेतों में वीरानगी पसरी पड़ी रही। चारे-पानी के अभाव में असंख्य मवेशियों ने दम तोड़ दिया था। भूख से तड़पते हजारों पशुओं की जान चली गई। खेतों व गांवों में हर तरफ हड्डियों के ढेर लग गए थे।

लोक साहित्य में छपनिया अकाल
लोक साहित्य में छपनिया अकाल के बारे में तत्समय के रचनाकारों ने क्या लिखा है, इसे जानने के लिए इन दिनों कई पुस्तकें खंगाली। कॉलेज में मेरे सहकर्मी रहे डॉ शक्तिदान कविया द्वारा संपादित पुस्तक ‘उमरदान ग्रंथावली’ ( जनकवि उमरदान की जीवनी और काव्य कृतियां ) और डॉ गजादान चारण ‘शक्तिसुत’ का आलेख ‘डिंगल काव्यधारा में प्रगतिशील चेतना’ में छपनिया अकाल पर मारवाड़ के जनकवि उमरदान की दो रचनाएं पढ़ने को मिलीं, जिन्हें यहाँ साभार उद्धरित कर रहा हूँ। छपनिया अकाल से त्रस्त मारवाड़ की जनता की बदहाली का बखान करते हुए उमरदान जी ने ये लिखा है:

“मांणस मुरधरिया माणक सूं मूंगा ।
कोड़ी- कोडी़ रा करिया श्रम सूंगा ।
डाढी मूंछाला डळियां में डुळिया ।
रळिया जायोडा़ गळियां में रूळिया ।।
आफत मोटी ने खोटी पल आई।
रोटी-रोटी ने रैय्यत रोवाई ।।”

अर्थात मरूधर के रहवासी (मारवाडी) जो मणिक और मुंगा आदि रत्नों के समान महंगे थे, वे अकाल के प्रहार से एक-एक कोडी़ की सस्ती मज़दूरी करने को मजबूर हुए। गर्वीली दाढ़ी-मूंछों वाले लोग टोकरियां उठाने लगे। महलों में पैदा हुए गलियों में भटकने को मजबूर हुए। रोटी को तरसती जनता रोने को मजबूर हुई ।

इस प्रकार प्रगतिशील धारा के जनकवि उमरदान लालस ने छपनिया-अकाल में भूख से बिलबिलाते- करहाते आमजन की व्यथा को प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त किया। पीड़ित जन की लाचारी एवं बेबसी, राजसत्ता की स्वार्थपरता और प्रजा के कष्टों के प्रति घोर अनदेखी को भी सशक्त शब्दों में उजागर किया। एक छप्पय छंद में उन्होंने पोंगापंथ, पाखण्ड और मठवाद की पोल खोलते हुए इस बात को रेखांकित किया कि ‘करसा एक कमावणा’ है, बाकी सब उसकी कमाई पर पलने वाले परजीवी हैं। किसान की कर्मठता को सर्वोपरि मानते हुए उन्होंने ये कहा –

” मारवाड़ रो माल मुफत में खावै मोडा।
सेवग जोसी सैंग, गरीबां दे नित गोडा।
दाता दे वित दान, मौज माणै मुस्टंडा।
लाखां ले धन लूट, पूतळी पूजक पंडा।
जटा कनफटा जोगटा, खाखी परधन खावणा।
मुरधर में क्रोड़ां मिनख (ज्यांमें) करसा एक कमावणा।।”

लोकगीतों में बहुसंख्यक समाज के यथार्थ की अभिव्यक्ति है। इनके रचनाकारों ने जीवन संघर्षों को भोगा था, अपार कष्टों को सहा था और भोगे हुए यथार्थ की ऊर्जा से लोकगीतों की रचना की। मेरे विचार से तो इन अधिकांश लोकगीतों के ‘अज्ञात’ ( anonymous ) रचनाकार ‘हम'( ‘शिष्ट जन’/ नज़रों में बने रहने वाले taking centre stage ) नहीं अपितु ‘वे’ ( others / marginalized हाशिए पर धकेले ) हैं। यह बात इस आधार पर कह रहा हूँ कि लोकगीतों में आमजन की आशाओं, आंकाक्षाओं, अंदेशों, आस्थाओं और झेले गए कष्टों की अभिव्यक्ति मिलती है। आमजन की ज़िंदगी की करुण कहानी और ज़िंदगी में खुशियों की सौगात–दोनों की गूँज लोकगीतों में आमजन की भाषा में अभिव्यक्त की गई है।

राजस्थान में छपनिया अकाल की विभीषिका का डर अब भी बुजुर्गों को सताता रहता है। मारवाड़ में गाया जाने वाला ये लोकगीत इसका सबूत है:

“छपनिया काल रे छपनिया काल,
फेर मत आइयो म्हारी मारवाड़ में।
आइयो जमाइड़ो धड़कियाँ जीव,
काँ ते लाऊँ शक्कर, भात, घीव, जमाइड़ो?
फेर मत आइयो म्हारी मारवाड़ में।
छपनिया काल रे छपनिया काल,
फेर मत आइयो म्हारी मारवाड़ में।।”

लोकगीतों के दरवेश देवेंद्र सत्यार्थी ने इस लोकगीत को भारत के लोकगीतों के संग्रह में खास स्थान दिया है।

एक लोकगीत और है, जिसमें डरे- सहमे लोग छपनिया अकाल से अरदास कर रहे हैं कि इन भोले-भाले लोगों के देश में फिर लौटकर मत आना:

“ओ म्हारो छप्पन्हियो काल्ड
फेरो मत अज भोल्डी दुनियाँ में।

( O Cursed Chhapaniya famine, return no more to this innocent land. )

बाजरे री रोटी गंवार की फल्डी
मिल जाये तो वह ही भली

म्हारो छप्पन्हियो काल्ड
फेरो मत अज भोल्डी दुनियाँ में।”

(काल्ड =अकाल, भोल्डी =भोली, फल्डी= फलियां )

तब’ और ‘अब’ के हालात में अंतर
छपनिया अकाल में हमारे पूर्वजों की हुई दुर्दशा से युवा पीढ़ी अनभिज्ञ है क्योंकि ‘तब’ और ‘अब’ के हालात में काफी अंतर आ चुका है। भारत में आज़ादी के पहले और बाद के लगभग दो दशकों तक खाद्यान्न का उत्पादन जनसंख्या के हिसाब से काफी कम होता था। इसलिए मई 1960 में अमेरिका और भारत के बीच चार वर्ष की अवधि के लिए पी.एल.480 ( पब्लिक ला 480 ) नामक एक समझौता हुआ, जिसके तहत भारत को अमेरिका से लाल गेहूं हासिल होता था। अमेरिका में पशुओं को खिलाए जाने वाले उस गेहूं को हमारे पूर्वज अकाल के समय खाने को मजबूर थे। जब अकाल पड़ता था तब सरकार द्वारा परमिट के ज़रिए उपलब्ध करवाया गया धान जैसे लाल जंवार, लाल गेंहू, घाट आदि को खाकर लोग भूख मिटाते थे।

सन 1966-67 में सरकार ने एक दीर्घ नीति अपनाते हुए देश में खाद्यान्न की कमी को दूर करने के लिए हरित क्रांति की शुरुआत की। इसका मुख्य उद्देश्य भारत को खाद्यान्न के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना था। भारत में हरित क्रांति लाने और इस दिशा में विशेष योगदान देने का श्रेय एम. एस. स्वामीनाथन को जाता है। हरित क्रांति के फलस्वरूप भारतीय कृषि प्रणाली और बुवाई हेतु प्रयुक्त होने वाले बीजों की गुणवत्ता में परिवर्तन किए गए। इसके फलस्वरूप कृषि उत्पादन में काफी कम समय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। हरित क्रांति का ही कमाल है कि भारत दुनिया के बड़े कृषि उत्पादकों के रूप में स्थापित हुआ है।

सन 1987 और 2000 में भी पश्चिमी राजस्थान दुर्भिक्ष का शिकार हुआ। पर देश के गोदामों में सरप्लस अनाज के भंडारण की व्यवस्था होने से अकाल प्रभावित इलाकों में अनाज की आपूर्ति संभव हो सकी। सड़क और रेल परिवहन की सुविधाओं में विस्तार होने से अनाज और चारे-पानी की एक जगह से दूसरी जगह ढुलाई में सहूलियत हुई है। काम के बदले अनाज योजना अकाल से त्रस्त लोगों के लिए जीवनदायनी साबित हुई है। राशन कार्ड से मिलने वाले गेंहू से गरीब परिवारों का गुजारा हो जाता है। इसके अलावा अकाल के समय सरकार द्वारा अकाल राहत कार्य भी शुरू किए जाते हैं।

बीकानेर संभाग में इंदिरा गांधी नहर का पानी पहुंचने के बाद यहाँ की विकट परिस्थितियों में काफी सुधार हुआ है। भूजल स्तर में सुधार हुआ और उसकी लवणता में कमी आई है। नतीज़तन यहाँ पिछले लगभग तीस सालों में ख़ूब पेड़-पौधे पनपने लगे हैं। आंधियों का प्रकोप कम हुआ है। इंदिरा गांधी नहर के पानी से पीने के पानी की किल्लत झेलने को अभिशप्त इलाकों को राहत मिली है।


छपनिया अकाल पर यह आलेख मैंने न्यूज़18 टीवी चैनल ( पूर्व में ईटीवी राजस्थान ) के प्रखर संवाददाता हमारे प्रिय श्री बाबूलाल धायल के आग्रह पर लिखा है। मक़सद है नई पीढ़ी को हमारे पूर्वजों की जिजीविषा से अवगत करवाना।


आख़िर में एक बात कहनी है। राजस्थान की लोक संस्कृति के विभिन्न पहलुओं पर मैंने गत वर्ष कुछ पोस्ट फेसबुक पर अपलोड की थीं। वर्तमान पीढ़ी ने इन्हें पढ़ने में खूब रुचि दर्शायी। हज़ारों ने इन्हें शेयर किया। बड़ी संख्या में लोगों ने उनकी कॉपी पेस्ट कीं। सबका शुक्रिया।

ध्यान देने की बात है कि लोक संस्कृति कभी किसी की चालाकी नहीं सिखाती। पर कुछ युवाओं ने उन पोस्ट की कॉपी कर उसके अंत में लिखे मेरे नाम को हटा कर खुद उस पोस्ट के लेखक बनकर खुद की वॉल और अपने नाम की वेबसाइट पर अपलोड करने के साथ- साथ पत्रिकाओं में भी अपने नाम से छपवा दिया।

एक मिसाल दे रहा हूँ। ‘ग्राम्य अर्थव्यवस्था के बदलते स्वरूप’ पर मैंने एक आलेख 5 दिसंबर 19 को फेसबुक वॉल पर अपलोड किया था। अभिषेक मुंडेल नाम के एक युवा हैं। पता नहीं कहाँ के हैं। इस युवक ने उस आलेख का टाइटल और मेरा नाम हटाकर उस पर Rajasthan : A Deserted Land टाइटल लगाया और उसको हूबहू अपने नाम की वेबसाइट पर इस साल 26 जनवरी को अपलोड कर दिया। कुछ सद्भावी सज्जनों ने उसकी लिंक भेजकर मुझे जानकारी दी।

युवाओं को एक सलाह। शिष्टाचार निभाना सीखें। स्तरीय साहित्य पढ़ें, विद्वान वक्ताओं को सुनें और अच्छी बातों पर ख़ूब मनन करें। ऐसा करेंगे तो आप अच्छा लिख सकेंगें। याद रखिए, ‘मण’ भर पढ़ने-सुनने के बाद कोई कण भर लिखने-कहने के क़ाबिल बन पाता है।

कोविड 19 महामारी के इस दौर में सावधानी बरतें, संयम का दामन थामे रहें। ‘सुरक्षा हटी, दुर्घटना घटी।’

इस बीमारी के फैलाव पर अंकुश लगाने के लिए लागू किए गए लॉक डाउन से उत्पन्न संकट के दौर में हम हमारे पूर्वजों के संयम और सब्र से प्रेरणा लें।

सोशल डिस्टेंसिंग का मतलब समाज से दूर हो जाना या कट जाना नहीं है। ये वक़्त समाज से मुंह फेर लेने का नहीं बल्कि एक-दूजे से शारीरिक दूरी बनाए रखकर मन की नजदीकियां प्रगाढ़ करने का है।

वैज्ञानिक सोच को अपनाएं। खुद चेतें, और औरों को चेताएं।


प्रो. हनुमानाराम इसराणा
पूर्व प्राचार्य, कॉलेज शिक्षा, राजस्थान

दिनांक: 4 अप्रैल 2020

मैं नास्तिक क्यों हूँ? | भगत सिंह

भगतसिंह (1931)

मैं नास्तिक क्यों हूँ?


यह लेख भगत सिंह ने जेल में रहते हुए लिखा था और यह 27 सितम्बर 1931 को लाहौर के अखबार “ द पीपल “ में प्रकाशित हुआ । इस लेख में भगतसिंह ने ईश्वर कि उपस्थिति पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किये हैं और इस संसार के निर्माण , मनुष्य के जन्म , मनुष्य के मन में ईश्वर की कल्पना के साथ साथ संसार में मनुष्य की दीनता , उसके शोषण , दुनिया में व्याप्त अराजकता और और वर्गभेद की स्थितियों का भी विश्लेषण किया है । यह भगत सिंह के लेखन के सबसे चर्चित हिस्सों में रहा है।

स्वतन्त्रता सेनानी बाबा रणधीर सिंह 1930-31के बीच लाहौर के सेन्ट्रल जेल में कैद थे। वे एक धार्मिक व्यक्ति थे जिन्हें यह जान कर बहुत कष्ट हुआ कि भगतसिंह का ईश्वर पर विश्वास नहीं है। वे किसी तरह भगत सिंह की कालकोठरी में पहुँचने में सफल हुए और उन्हें ईश्वर के अस्तित्व पर यकीन दिलाने की कोशिश की। असफल होने पर बाबा ने नाराज होकर कहा, “प्रसिद्धि से तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है और तुम अहंकारी बन गए हो जो कि एक काले पर्दे के तरह तुम्हारे और ईश्वर के बीच खड़ी है। इस टिप्पणी के जवाब में ही भगतसिंह ने यह लेख लिखा।


एक नया प्रश्न उठ खड़ा हुआ है। क्या मैं किसी अहंकार के कारण सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी तथा सर्वज्ञानी ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करता हूँ? मेरे कुछ दोस्त – शायद ऐसा कहकर मैं उन पर बहुत अधिकार नहीं जमा रहा हूँ – मेरे साथ अपने थोड़े से सम्पर्क में इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये उत्सुक हैं कि मैं ईश्वर के अस्तित्व को नकार कर कुछ ज़रूरत से ज़्यादा आगे जा रहा हूँ और मेरे घमण्ड ने कुछ हद तक मुझे इस अविश्वास के लिये उकसाया है। मैं ऐसी कोई शेखी नहीं बघारता कि मैं मानवीय कमज़ोरियों से बहुत ऊपर हूँ। मैं एक मनुष्य हूँ, और इससे अधिक कुछ नहीं। कोई भी इससे अधिक होने का दावा नहीं कर सकता। यह कमज़ोरी मेरे अन्दर भी है। अहंकार भी मेरे स्वभाव का अंग है। अपने कामरेडो के बीच मुझे निरंकुश कहा जाता था। यहाँ तक कि मेरे दोस्त श्री बटुकेश्वर कुमार दत्त भी मुझे कभी-कभी ऐसा कहते थे। कई मौकों पर स्वेच्छाचारी कह मेरी निन्दा भी की गयी। कुछ दोस्तों को शिकायत है, और गम्भीर रूप से है कि मैं अनचाहे ही अपने विचार, उन पर थोपता हूँ और अपने प्रस्तावों को मनवा लेता हूँ। यह बात कुछ हद तक सही है। इससे मैं इनकार नहीं करता। इसे अहंकार कहा जा सकता है। जहाँ तक अन्य प्रचलित मतों के मुकाबले हमारे अपने मत का सवाल है। मुझे निश्चय ही अपने मत पर गर्व है। लेकिन यह व्यक्तिगत नहीं है। ऐसा हो सकता है कि यह केवल अपने विश्वास के प्रति न्यायोचित गर्व हो और इसको घमण्ड नहीं कहा जा सकता। घमण्ड तो स्वयं के प्रति अनुचित गर्व की अधिकता है। क्या यह अनुचित गर्व है, जो मुझे नास्तिकता की ओर ले गया? अथवा इस विषय का खूब सावधानी से अध्ययन करने और उस पर खूब विचार करने के बाद मैंने ईश्वर पर अविश्वास किया?

मैं यह समझने में पूरी तरह से असफल रहा हूँ कि अनुचित गर्व या वृथाभिमान किस तरह किसी व्यक्ति के ईश्वर में विश्वास करने के रास्ते में रोड़ा बन सकता है? किसी वास्तव में महान व्यक्ति की महानता को मैं मान्यता न दूँ – यह तभी हो सकता है, जब मुझे भी थोड़ा ऐसा यश प्राप्त हो गया हो जिसके या तो मैं योग्य नहीं हूँ या मेरे अन्दर वे गुण नहीं हैं, जो इसके लिये आवश्यक हैं। यहाँ तक तो समझ में आता है। लेकिन यह कैसे हो सकता है कि एक व्यक्ति, जो ईश्वर में विश्वास रखता हो, सहसा अपने व्यक्तिगत अहंकार के कारण उसमें विश्वास करना बन्द कर दे? दो ही रास्ते सम्भव हैं। या तो मनुष्य अपने को ईश्वर का प्रतिद्वन्द्वी समझने लगे या वह स्वयं को ही ईश्वर मानना शुरू कर दे। इन दोनो ही अवस्थाओं में वह सच्चा नास्तिक नहीं बन सकता। पहली अवस्था में तो वह अपने प्रतिद्वन्द्वी के अस्तित्व को नकारता ही नहीं है। दूसरी अवस्था में भी वह एक ऐसी चेतना के अस्तित्व को मानता है, जो पर्दे के पीछे से प्रकृति की सभी गतिविधियों का संचालन करती है। मैं तो उस सर्वशक्तिमान परम आत्मा के अस्तित्व से ही इनकार करता हूँ। यह अहंकार नहीं है, जिसने मुझे नास्तिकता के सिद्धान्त को ग्रहण करने के लिये प्रेरित किया। मैं न तो एक प्रतिद्वन्द्वी हूँ, न ही एक अवतार और न ही स्वयं परमात्मा। इस अभियोग को अस्वीकार करने के लिये आइए तथ्यों पर गौर करें। मेरे इन दोस्तों के अनुसार, दिल्ली बम केस और लाहौर षडयन्त्र केस के दौरान मुझे जो अनावश्यक यश मिला, शायद उस कारण मैं वृथाभिमानी हो गया हूँ।

मेरा नास्तिकतावाद कोई अभी हाल की उत्पत्ति नहीं है। मैंने तो ईश्वर पर विश्वास करना तब छोड़ दिया था, जब मैं एक अप्रसिद्ध नौजवान था। कम से कम एक कालेज का विद्यार्थी तो ऐसे किसी अनुचित अहंकार को नहीं पाल-पोस सकता, जो उसे नास्तिकता की ओर ले जाये। यद्यपि मैं कुछ अध्यापकों का चहेता था तथा कुछ अन्य को मैं अच्छा नहीं लगता था। पर मैं कभी भी बहुत मेहनती अथवा पढ़ाकू विद्यार्थी नहीं रहा। अहंकार जैसी भावना में फँसने का कोई मौका ही न मिल सका। मैं तो एक बहुत लज्जालु स्वभाव का लड़का था, जिसकी भविष्य के बारे में कुछ निराशावादी प्रकृति थी। मेरे बाबा, जिनके प्रभाव में मैं बड़ा हुआ, एक रूढ़िवादी आर्य समाजी हैं। एक आर्य समाजी और कुछ भी हो, नास्तिक नहीं होता। अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद मैंने डी0 ए0 वी0 स्कूल, लाहौर में प्रवेश लिया और पूरे एक साल उसके छात्रावास में रहा। वहाँ सुबह और शाम की प्रार्थना के अतिरिक्त में घण्टों गायत्री मंत्र जपा करता था। उन दिनों मैं पूरा भक्त था। बाद में मैंने अपने पिता के साथ रहना शुरू किया। जहाँ तक धार्मिक रूढ़िवादिता का प्रश्न है, वह एक उदारवादी व्यक्ति हैं। उन्हीं की शिक्षा से मुझे स्वतन्त्रता के ध्येय के लिये अपने जीवन को समर्पित करने की प्रेरणा मिली। किन्तु वे नास्तिक नहीं हैं। उनका ईश्वर में दृढ़ विश्वास है। वे मुझे प्रतिदिन पूजा-प्रार्थना के लिये प्रोत्साहित करते रहते थे। इस प्रकार से मेरा पालन-पोषण हुआ। असहयोग आन्दोलन के दिनों में राष्ट्रीय कालेज में प्रवेश लिया। यहाँ आकर ही मैंने सारी धार्मिक समस्याओं – यहाँ तक कि ईश्वर के अस्तित्व के बारे में उदारतापूर्वक सोचना, विचारना तथा उसकी आलोचना करना शुरू किया। पर अभी भी मैं पक्का आस्तिक था। उस समय तक मैं अपने लम्बे बाल रखता था। यद्यपि मुझे कभी-भी सिक्ख या अन्य धर्मों की पौराणिकता और सिद्धान्तों में विश्वास न हो सका था। किन्तु मेरी ईश्वर के अस्तित्व में दृढ़ निष्ठा थी। बाद में मैं क्रान्तिकारी पार्टी से जुड़ा। वहाँ जिस पहले नेता से मेरा सम्पर्क हुआ वे तो पक्का विश्वास न होते हुए भी ईश्वर के अस्तित्व को नकारने का साहस ही नहीं कर सकते थे। ईश्वर के बारे में मेरे हठ पूर्वक पूछते रहने पर वे कहते, ‘’जब इच्छा हो, तब पूजा कर लिया करो।’’ यह नास्तिकता है, जिसमें साहस का अभाव है। दूसरे नेता, जिनके मैं सम्पर्क में आया, पक्के श्रद्धालु आदरणीय कामरेड शचीन्द्र नाथ सान्याल आजकल काकोरी षडयन्त्र केस के सिलसिले में आजीवन कारवास भोग रहे हैं। उनकी पुस्तक ‘बन्दी जीवन’ ईश्वर की महिमा का ज़ोर-शोर से गान है। उन्होंने उसमें ईश्वर के ऊपर प्रशंसा के पुष्प रहस्यात्मक वेदान्त के कारण बरसाये हैं। 28 जनवरी, 1925 को पूरे भारत में जो ‘दि रिवोल्यूशनरी’ (क्रान्तिकारी) पर्चा बाँटा गया था, वह उन्हीं के बौद्धिक श्रम का परिणाम है। उसमें सर्वशक्तिमान और उसकी लीला एवं कार्यों की प्रशंसा की गयी है। मेरा ईश्वर के प्रति अविश्वास का भाव क्रान्तिकारी दल में भी प्रस्फुटित नहीं हुआ था। काकोरी के सभी चार शहीदों ने अपने अन्तिम दिन भजन-प्रार्थना में गुजारे थे। राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ एक रूढ़िवादी आर्य समाजी थे। समाजवाद तथा साम्यवाद में अपने वृहद अध्ययन के बावजूद राजेन लाहड़ी उपनिषद एवं गीता के श्लोकों के उच्चारण की अपनी अभिलाषा को दबा न सके। मैंने उन सब मे सिर्फ एक ही व्यक्ति को देखा, जो कभी प्रार्थना नहीं करता था और कहता था, ‘’दर्शन शास्त्र मनुष्य की दुर्बलता अथवा ज्ञान के सीमित होने के कारण उत्पन्न होता है। वह भी आजीवन निर्वासन की सजा भोग रहा है। परन्तु उसने भी ईश्वर के अस्तित्व को नकारने की कभी हिम्मत नहीं की।

इस समय तक मैं केवल एक रोमान्टिक आदर्शवादी क्रान्तिकारी था। अब तक हम दूसरों का अनुसरण करते थे। अब अपने कन्धों पर ज़िम्मेदारी उठाने का समय आया था। यह मेरे क्रान्तिकारी जीवन का एक निर्णायक बिन्दु था। ‘अध्ययन’ की पुकार मेरे मन के गलियारों में गूँज रही थी – विरोधियों द्वारा रखे गये तर्कों का सामना करने योग्य बनने के लिये अध्ययन करो। अपने मत के पक्ष में तर्क देने के लिये सक्षम होने के वास्ते पढ़ो। मैंने पढ़ना शुरू कर दिया। इससे मेरे पुराने विचार व विश्वास अद्भुत रूप से परिष्कृत हुए। रोमांस की जगह गम्भीर विचारों ने ली ली। न और अधिक रहस्यवाद, न ही अन्धविश्वास। यथार्थवाद हमारा आधार बना। मुझे विश्वक्रान्ति के अनेक आदर्शों के बारे में पढ़ने का खूब मौका मिला। मैंने अराजकतावादी नेता बाकुनिन को पढ़ा, कुछ साम्यवाद के पिता माक्र्स को, किन्तु अधिक लेनिन, त्रात्स्की, व अन्य लोगों को पढ़ा, जो अपने देश में सफलतापूर्वक क्रान्ति लाये थे। ये सभी नास्तिक थे। बाद में मुझे निरलम्ब स्वामी की पुस्तक ‘सहज ज्ञान’ मिली। इसमें रहस्यवादी नास्तिकता थी। 1926 के अन्त तक मुझे इस बात का विश्वास हो गया कि एक सर्वशक्तिमान परम आत्मा की बात, जिसने ब्रह्माण्ड का सृजन, दिग्दर्शन और संचालन किया, एक कोरी बकवास है। मैंने अपने इस अविश्वास को प्रदर्शित किया। मैंने इस विषय पर अपने दोस्तों से बहस की। मैं एक घोषित नास्तिक हो चुका था।

मई 1927 में मैं लाहौर में गिरफ़्तार हुआ। रेलवे पुलिस हवालात में मुझे एक महीना काटना पड़ा। पुलिस अफ़सरों ने मुझे बताया कि मैं लखनऊ में था, जब वहाँ काकोरी दल का मुकदमा चल रहा था, कि मैंने उन्हें छुड़ाने की किसी योजना पर बात की थी, कि उनकी सहमति पाने के बाद हमने कुछ बम प्राप्त किये थे, कि 1927 में दशहरा के अवसर पर उन बमों में से एक परीक्षण के लिये भीड़ पर फेंका गया, कि यदि मैं क्रान्तिकारी दल की गतिविधियों पर प्रकाश डालने वाला एक वक्तव्य दे दूँ, तो मुझे गिरफ़्तार नहीं किया जायेगा और इसके विपरीत मुझे अदालत में मुखबिर की तरह पेश किये बेगैर रिहा कर दिया जायेगा और इनाम दिया जायेगा। मैं इस प्रस्ताव पर हँसा। यह सब बेकार की बात थी। हम लोगों की भाँति विचार रखने वाले अपनी निर्दोष जनता पर बम नहीं फेंका करते। एक दिन सुबह सी0 आई0 डी0 के वरिष्ठ अधीक्षक श्री न्यूमन ने कहा कि यदि मैंने वैसा वक्तव्य नहीं दिया, तो मुझ पर काकोरी केस से सम्बन्धित विद्रोह छेड़ने के षडयन्त्र तथा दशहरा उपद्रव में क्रूर हत्याओं के लिये मुकदमा चलाने पर बाध्य होंगे और कि उनके पास मुझे सजा दिलाने व फाँसी पर लटकवाने के लिये उचित प्रमाण हैं। उसी दिन से कुछ पुलिस अफ़सरों ने मुझे नियम से दोनो समय ईश्वर की स्तुति करने के लिये फुसलाना शुरू किया। पर अब मैं एक नास्तिक था। मैं स्वयं के लिये यह बात तय करना चाहता था कि क्या शान्ति और आनन्द के दिनों में ही मैं नास्तिक होने का दम्भ भरता हूँ या ऐसे कठिन समय में भी मैं उन सिद्धान्तों पर अडिग रह सकता हूँ। बहुत सोचने के बाद मैंने निश्चय किया कि किसी भी तरह ईश्वर पर विश्वास तथा प्रार्थना मैं नहीं कर सकता। नहीं, मैंने एक क्षण के लिये भी नहीं की। यही असली परीक्षण था और मैं सफल रहा। अब मैं एक पक्का अविश्वासी था और तब से लगातार हूँ। इस परीक्षण पर खरा उतरना आसान काम न था। ‘विश्वास’ कष्टों को हलका कर देता है। यहाँ तक कि उन्हें सुखकर बना सकता है। ईश्वर में मनुष्य को अत्यधिक सान्त्वना देने वाला एक आधार मिल सकता है। उसके बिना मनुष्य को अपने ऊपर निर्भर करना पड़ता है। तूफ़ान और झंझावात के बीच अपने पाँवों पर खड़ा रहना कोई बच्चों का खेल नहीं है। परीक्षा की इन घड़ियों में अहंकार यदि है, तो भाप बन कर उड़ जाता है और मनुष्य अपने विश्वास को ठुकराने का साहस नहीं कर पाता। यदि ऐसा करता है, तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि उसके पास सिर्फ़ अहंकार नहीं वरन् कोई अन्य शक्ति है। आज बिलकुल वैसी ही स्थिति है। निर्णय का पूरा-पूरा पता है। एक सप्ताह के अन्दर ही यह घोषित हो जायेगा कि मैं अपना जीवन एक ध्येय पर न्योछावर करने जा रहा हूँ। इस विचार के अतिरिक्त और क्या सान्त्वना हो सकती है? ईश्वर में विश्वास रखने वाला हिन्दू पुनर्जन्म पर राजा होने की आशा कर सकता है। एक मुसलमान या ईसाई स्वर्ग में व्याप्त समृद्धि के आनन्द की तथा अपने कष्टों और बलिदान के लिये पुरस्कार की कल्पना कर सकता है। किन्तु मैं क्या आशा करूँ? मैं जानता हूँ कि जिस क्षण रस्सी का फ़न्दा मेरी गर्दन पर लगेगा और मेरे पैरों के नीचे से तख़्ता हटेगा, वह पूर्ण विराम होगा – वह अन्तिम क्षण होगा। मैं या मेरी आत्मा सब वहीं समाप्त हो जायेगी। आगे कुछ न रहेगा। एक छोटी सी जूझती हुई ज़िन्दगी, जिसकी कोई ऐसी गौरवशाली परिणति नहीं है, अपने में स्वयं एक पुरस्कार होगी – यदि मुझमें इस दृष्टि से देखने का साहस हो। बिना किसी स्वार्थ के यहाँ या यहाँ के बाद पुरस्कार की इच्छा के बिना, मैंने अनासक्त भाव से अपने जीवन को स्वतन्त्रता के ध्येय पर समर्पित कर दिया है, क्योंकि मैं और कुछ कर ही नहीं सकता था। जिस दिन हमें इस मनोवृत्ति के बहुत-से पुरुष और महिलाएँ मिल जायेंगे, जो अपने जीवन को मनुष्य की सेवा और पीड़ित मानवता के उद्धार के अतिरिक्त कहीं समर्पित कर ही नहीं सकते, उसी दिन मुक्ति के युग का शुभारम्भ होगा। वे शोषकों, उत्पीड़कों और अत्याचारियों को चुनौती देने के लिये उत्प्रेरित होंगे। इस लिये नहीं कि उन्हें राजा बनना है या कोई अन्य पुरस्कार प्राप्त करना है यहाँ या अगले जन्म में या मृत्योपरान्त स्वर्ग में। उन्हें तो मानवता की गर्दन से दासता का जुआ उतार फेंकने और मुक्ति एवं शान्ति स्थापित करने के लिये इस मार्ग को अपनाना होगा। क्या वे उस रास्ते पर चलेंगे जो उनके अपने लिये ख़तरनाक किन्तु उनकी महान आत्मा के लिये एक मात्र कल्पनीय रास्ता है। क्या इस महान ध्येय के प्रति उनके गर्व को अहंकार कहकर उसका गलत अर्थ लगाया जायेगा? कौन इस प्रकार के घृणित विशेषण बोलने का साहस करेगा? या तो वह मूर्ख है या धूर्त। हमें चाहिए कि उसे क्षमा कर दें, क्योंकि वह उस हृदय में उद्वेलित उच्च विचारों, भावनाओं, आवेगों तथा उनकी गहराई को महसूस नहीं कर सकता। उसका हृदय मांस के एक टुकड़े की तरह मृत है। उसकी आँखों पर अन्य स्वार्थों के प्रेतों की छाया पड़ने से वे कमज़ोर हो गयी हैं। स्वयं पर भरोसा रखने के गुण को सदैव अहंकार की संज्ञा दी जा सकती है। यह दुखपूर्ण और कष्टप्रद है, पर चारा ही क्या है?

आलोचना और स्वतन्त्र विचार एक क्रान्तिकारी के दोनो अनिवार्य गुण हैं। क्योंकि हमारे पूर्वजों ने किसी परम आत्मा के प्रति विश्वास बना लिया था। अतः कोई भी व्यक्ति जो उस विश्वास को सत्यता या उस परम आत्मा के अस्तित्व को ही चुनौती दे, उसको विधर्मी, विश्वासघाती कहा जायेगा। यदि उसके तर्क इतने अकाट्य हैं कि उनका खण्डन वितर्क द्वारा नहीं हो सकता और उसकी आस्था इतनी प्रबल है कि उसे ईश्वर के प्रकोप से होने वाली विपत्तियों का भय दिखा कर दबाया नहीं जा सकता तो उसकी यह कह कर निन्दा की जायेगी कि वह वृथाभिमानी है। यह मेरा अहंकार नहीं था, जो मुझे नास्तिकता की ओर ले गया। मेरे तर्क का तरीका संतोषप्रद सिद्ध होता है या नहीं इसका निर्णय मेरे पाठकों को करना है, मुझे नहीं। मैं जानता हूँ कि ईश्वर पर विश्वास ने आज मेरा जीवन आसान और मेरा बोझ हलका कर दिया होता। उस पर मेरे अविश्वास ने सारे वातावरण को अत्यन्त शुष्क बना दिया है। थोड़ा-सा रहस्यवाद इसे कवित्वमय बना सकता है। किन्तु मेरे भाग्य को किसी उन्माद का सहारा नहीं चाहिए। मैं यथार्थवादी हूँ। मैं अन्तः प्रकृति पर विवेक की सहायता से विजय चाहता हूँ। इस ध्येय में मैं सदैव सफल नहीं हुआ हूँ। प्रयास करना मनुष्य का कर्तव्य है। सफलता तो संयोग तथा वातावरण पर निर्भर है। कोई भी मनुष्य, जिसमें तनिक भी विवेक शक्ति है, वह अपने वातावरण को तार्किक रूप से समझना चाहेगा। जहाँ सीधा प्रमाण नहीं है, वहाँ दर्शन शास्त्र का महत्व है। जब हमारे पूर्वजों ने फुरसत के समय विश्व के रहस्य को, इसके भूत, वर्तमान एवं भविष्य को, इसके क्यों और कहाँ से को समझने का प्रयास किया तो सीधे परिणामों के कठिन अभाव में हर व्यक्ति ने इन प्रश्नों को अपने ढ़ंग से हल किया। यही कारण है कि विभिन्न धार्मिक मतों में हमको इतना अन्तर मिलता है, जो कभी-कभी वैमनस्य तथा झगड़े का रूप ले लेता है। न केवल पूर्व और पश्चिम के दर्शनों में मतभेद है, बल्कि प्रत्येक गोलार्ध के अपने विभिन्न मतों में आपस में अन्तर है। पूर्व के धर्मों में, इस्लाम तथा हिन्दू धर्म में ज़रा भी अनुरूपता नहीं है। भारत में ही बौद्ध तथा जैन धर्म उस ब्राह्मणवाद से बहुत अलग है, जिसमें स्वयं आर्यसमाज व सनातन धर्म जैसे विरोधी मत पाये जाते हैं। पुराने समय का एक स्वतन्त्र विचारक चार्वाक है। उसने ईश्वर को पुराने समय में ही चुनौती दी थी। हर व्यक्ति अपने को सही मानता है। दुर्भाग्य की बात है कि बजाय पुराने विचारकों के अनुभवों तथा विचारों को भविष्य में अज्ञानता के विरुद्ध लड़ाई का आधार बनाने के हम आलसियों की तरह, जो हम सिद्ध हो चुके हैं, उनके कथन में अविचल एवं संशयहीन विश्वास की चीख पुकार करते रहते हैं और इस प्रकार मानवता के विकास को जड़ बनाने के दोषी हैं।

सिर्फ विश्वास और अन्ध विश्वास ख़तरनाक है। यह मस्तिष्क को मूढ़ और मनुष्य को प्रतिक्रियावादी बना देता है। जो मनुष्य अपने को यथार्थवादी होने का दावा करता है, उसे समस्त प्राचीन रूढ़िगत विश्वासों को चुनौती देनी होगी। प्रचलित मतों को तर्क की कसौटी पर कसना होगा। यदि वे तर्क का प्रहार न सह सके, तो टुकड़े-टुकड़े होकर गिर पड़ेगा। तब नये दर्शन की स्थापना के लिये उनको पूरा धराशायी करकेे जगह साफ करना और पुराने विश्वासों की कुछ बातों का प्रयोग करके पुनर्निमाण करना। मैं प्राचीन विश्वासांे के ठोसपन पर प्रश्न करने के सम्बन्ध में आश्वस्त हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि एक चेतन परम आत्मा का, जो प्रकृति की गति का दिग्दर्शन एवं संचालन करता है, कोई अस्तित्व नहीं है। हम प्रकृति में विश्वास करते हैं और समस्त प्रगतिशील आन्दोलन का ध्येय मनुष्य द्वारा अपनी सेवा के लिये प्रकृति पर विजय प्राप्त करना मानते हैं। इसको दिशा देने के पीछे कोई चेतन शक्ति नहीं है। यही हमारा दर्शन है। हम आस्तिकों से कुछ प्रश्न करना चाहते हैं।

यदि आपका विश्वास है कि एक सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक और सर्वज्ञानी ईश्वर है, जिसने विश्व की रचना की, तो कृपा करके मुझे यह बतायें कि उसने यह रचना क्यों की? कष्टों और संतापों से पूर्ण दुनिया – असंख्य दुखों के शाश्वत अनन्त गठबन्धनों से ग्रसित! एक भी व्यक्ति तो पूरी तरह संतृष्ट नही है। कृपया यह न कहें कि यही उसका नियम है। यदि वह किसी नियम से बँधा है तो वह सर्वशक्तिमान नहीं है। वह भी हमारी ही तरह नियमों का दास है। कृपा करके यह भी न कहें कि यह उसका मनोरंजन है। नीरो ने बस एक रोम जलाया था। उसने बहुत थोड़ी संख्या में लोगांें की हत्या की थी। उसने तो बहुत थोड़ा दुख पैदा किया, अपने पूर्ण मनोरंजन के लिये। और उसका इतिहास में क्या स्थान है? उसे इतिहासकार किस नाम से बुलाते हैं? सभी विषैले विशेषण उस पर बरसाये जाते हैं। पन्ने उसकी निन्दा के वाक्यों से काले पुते हैं, भत्र्सना करते हैं – नीरो एक हृदयहीन, निर्दयी, दुष्ट। एक चंगेज खाँ ने अपने आनन्द के लिये कुछ हजार जानें ले लीं और आज हम उसके नाम से घृणा करते हैं। तब किस प्रकार तुम अपने ईश्वर को न्यायोचित ठहराते हो? उस शाश्वत नीरो को, जो हर दिन, हर घण्टे ओर हर मिनट असंख्य दुख देता रहा, और अभी भी दे रहा है। फिर तुम कैसे उसके दुष्कर्मों का पक्ष लेने की सोचते हो, जो चंगेज खाँ से प्रत्येक क्षण अधिक है? क्या यह सब बाद में इन निर्दोष कष्ट सहने वालों को पुरस्कार और गलती करने वालों को दण्ड देने के लिये हो रहा है? ठीक है, ठीक है। तुम कब तक उस व्यक्ति को उचित ठहराते रहोगे, जो हमारे शरीर पर घाव करने का साहस इसलिये करता है कि बाद में मुलायम और आरामदायक मलहम लगायेगा? ग्लैडिएटर संस्था के व्यवस्थापक कहाँ तक उचित करते थे कि एक भूखे ख़ूंख़्वार शेर के सामने मनुष्य को फेंक दो कि, यदि वह उससे जान बचा लेता है, तो उसकी खूब देखभाल की जायेगी? इसलिये मैं पूछता हूँ कि उस चेतन परम आत्मा ने इस विश्व और उसमें मनुष्यों की रचना क्यों की? आनन्द लूटने के लिये? तब उसमें और नीरो में क्या फर्क है?

तुम मुसलमानो और ईसाइयो! तुम तो पूर्वजन्म में विश्वास नहीं करते। तुम तो हिन्दुओं की तरह यह तर्क पेश नहीं कर सकते कि प्रत्यक्षतः निर्दोष व्यक्तियों के कष्ट उनके पूर्वजन्मों के कर्मों का फल है। मैं तुमसे पूछता हूँ कि उस सर्वशक्तिशाली ने शब्द द्वारा विश्व के उत्पत्ति के लिये छः दिन तक क्यों परिश्रम किया? और प्रत्येक दिन वह क्यों कहता है कि सब ठीक है? बुलाओ उसे आज। उसे पिछला इतिहास दिखाओ। उसे आज की परिस्थितियों का अध्ययन करने दो। हम देखेंगे कि क्या वह कहने का साहस करता है कि सब ठीक है। कारावास की काल-कोठरियों से लेकर झोपड़ियों की बस्तियों तक भूख से तड़पते लाखों इन्सानों से लेकर उन शोषित मज़दूरों से लेकर जो पूँजीवादी पिशाच द्वारा खून चूसने की क्रिया को धैर्यपूर्वक निरुत्साह से देख रहे हैं तथा उस मानवशक्ति की बर्बादी देख रहे हैं, जिसे देखकर कोई भी व्यक्ति, जिसे तनिक भी सहज ज्ञान है, भय से सिहर उठेगा, और अधिक उत्पादन को ज़रूरतमन्द लोगों में बाँटने के बजाय समुद्र में फेंक देना बेहतर समझने से लेकर राजाआंे के उन महलों तक जिनकी नींव मानव की हड्डियों पर पड़ी है- उसको यह सब देखने दो और फिर कहे – सब कुछ ठीक है! क्यों और कहाँ से? यही मेरा प्रश्न है। तुम चुप हो। ठीक है, तो मैं आगे चलता हूँ।

और तुम हिन्दुओ, तुम कहते हो कि आज जो कष्ट भोग रहे हैं, ये पूर्वजन्म के पापी हैं और आज के उत्पीड़क पिछले जन्मों में साधु पुरुष थे, अतः वे सत्ता का आनन्द लूट रहे हैं। मुझे यह मानना पड़ता है कि आपके पूर्वज बहुत चालाक व्यक्ति थे। उन्होंने ऐसे सिद्धान्त गढ़े, जिनमें तर्क और अविश्वास के सभी प्रयासों को विफल करने की काफ़ी ताकत है। न्यायशास्त्र के अनुसार दण्ड को अपराधी पर पड़ने वाले असर के आधार पर केवल तीन कारणों से उचित ठहराया जा सकता है। वे हैं – प्रतिकार, भय तथा सुधार। आज सभी प्रगतिशील विचारकों द्वारा प्रतिकार के सिद्धान्त की निन्दा की जाती है। भयभीत करने के सिद्धान्त का भी अन्त वहीं है। सुधार करने का सिद्धान्त ही केवल आवश्यक है और मानवता की प्रगति के लिये अनिवार्य है। इसका ध्येय अपराधी को योग्य और शान्तिप्रिय नागरिक के रूप में समाज को लौटाना है। किन्तु यदि हम मनुष्यों को अपराधी मान भी लें, तो ईश्वर द्वारा उन्हें दिये गये दण्ड की क्या प्रकृति है? तुम कहते हो वह उन्हें गाय, बिल्ली, पेड़, जड़ी-बूटी या जानवर बनाकर पैदा करता है। तुम ऐसे 84 लाख दण्डों को गिनाते हो। मैं पूछता हूँ कि मनुष्य पर इनका सुधारक के रूप में क्या असर है? तुम ऐसे कितने व्यक्तियों से मिले हो, जो यह कहते हैं कि वे किसी पाप के कारण पूर्वजन्म में गधा के रूप में पैदा हुए थे? एक भी नहीं? अपने पुराणों से उदाहरण न दो। मेरे पास तुम्हारी पौराणिक कथाओं के लिए कोई स्थान नहीं है। और फिर क्या तुम्हें पता है कि दुनिया में सबसे बड़ा पाप गरीब होना है। गरीबी एक अभिशाप है। यह एक दण्ड है। मैं पूछता हूँ कि दण्ड प्रक्रिया की कहाँ तक प्रशंसा करें, जो अनिवार्यतः मनुष्य को और अधिक अपराध करने को बाध्य करे? क्या तुम्हारे ईश्वर ने यह नहीं सोचा था या उसको भी ये सारी बातें मानवता द्वारा अकथनीय कष्टों के झेलने की कीमत पर अनुभव से सीखनी थीं? तुम क्या सोचते हो, किसी गरीब या अनपढ़ परिवार, जैसे एक चमार या मेहतर के यहाँ पैदा होने पर इन्सान का क्या भाग्य होगा? चूँकि वह गरीब है, इसलिये पढ़ाई नहीं कर सकता। वह अपने साथियों से तिरस्कृत एवं परित्यक्त रहता है, जो ऊँची जाति में पैदा होने के कारण अपने को ऊँचा समझते हैं। उसका अज्ञान, उसकी गरीबी तथा उससे किया गया व्यवहार उसके हृदय को समाज के प्रति निष्ठुर बना देते हैं। यदि वह कोई पाप करता है तो उसका फल कौन भोेगेगा? ईष्वर, वह स्वयं या समाज के मनीषी? और उन लोगों के दण्ड के बारे में क्या होगा, जिन्हें दम्भी ब्राह्मणों ने जानबूझ कर अज्ञानी बनाये रखा तथा जिनको तुम्हारी ज्ञान की पवित्र पुस्तकों – वेदों के कुछ वाक्य सुन लेने के कारण कान में पिघले सीसे की धारा सहन करने की सजा भुगतनी पड़ती थी? यदि वे कोई अपराध करते हैं, तो उसके लिये कौन ज़िम्मेदार होगा? और उनका प्रहार कौन सहेगा? मेरे प्रिय दोस्तों! ये सिद्धान्त विशेषाधिकार युक्त लोगों के आविष्कार हैं। ये अपनी हथियाई हुई शक्ति, पूँजी तथा उच्चता को इन सिद्धान्तों के आधार पर सही ठहराते हैं। अपटान सिंक्लेयर ने लिखा था कि मनुष्य को बस अमरत्व में विश्वास दिला दो और उसके बाद उसकी सारी सम्पत्ति लूट लो। वह बगैर बड़बड़ाये इस कार्य में तुम्हारी सहायता करेगा। धर्म के उपदेशकों तथा सत्ता के स्वामियों के गठबन्धन से ही जेल, फाँसी, कोड़े और ये सिद्धान्त उपजते हैं।

मैं पूछता हूँ तुम्हारा सर्वशक्तिशाली ईश्वर हर व्यक्ति को क्यों नहीं उस समय रोकता है जब वह कोई पाप या अपराध कर रहा होता है? यह तो वह बहुत आसानी से कर सकता है। उसने क्यों नहीं लड़ाकू राजाओं की लड़ने की उग्रता को समाप्त किया और इस प्रकार विश्वयुद्ध द्वारा मानवता पर पड़ने वाली विपत्तियों से उसे बचाया? उसने अंग्रेजों के मस्तिष्क में भारत को मुक्त कर देने की भावना क्यों नहीं पैदा की? वह क्यों नहीं पूँजीपतियों के हृदय में यह परोपकारी उत्साह भर देता कि वे उत्पादन के साधनों पर अपना व्यक्तिगत सम्पत्ति का अधिकार त्याग दें और इस प्रकार केवल सम्पूर्ण श्रमिक समुदाय, वरन समस्त मानव समाज को पूँजीवादी बेड़ियों से मुक्त करें? आप समाजवाद की व्यावहारिकता पर तर्क करना चाहते हैं। मैं इसे आपके सर्वशक्तिमान पर छोड़ देता हूँ कि वह लागू करे। जहाँ तक सामान्य भलाई की बात है, लोग समाजवाद के गुणों को मानते हैं। वे इसके व्यावहारिक न होने का बहाना लेकर इसका विरोध करते हैं। परमात्मा को आने दो और वह चीज को सही तरीके से कर दे। अंग्रेजों की हुकूमत यहाँ इसलिये नहीं है कि ईश्वर चाहता है बल्कि इसलिये कि उनके पास ताकत है और हममें उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं। वे हमको अपने प्रभुत्व में ईश्वर की मदद से नहीं रखे हैं, बल्कि बन्दूकों, राइफलों, बम और गोलियों, पुलिस और सेना के सहारे। यह हमारी उदासीनता है कि वे समाज के विरुद्ध सबसे निन्दनीय अपराध – एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र द्वारा अत्याचार पूर्ण शोषण – सफलतापूर्वक कर रहे हैं। कहाँ है ईश्वर? क्या वह मनुष्य जाति के इन कष्टों का मज़ा ले रहा है? एक नीरो, एक चंगेज, उसका नाश हो!

क्या तुम मुझसे पूछते हो कि मैं इस विश्व की उत्पत्ति तथा मानव की उत्पत्ति की व्याख्या कैसे करता हूँ? ठीक है, मैं तुम्हें बताता हूँ। चाल्र्स डारविन ने इस विषय पर कुछ प्रकाश डालने की कोशिश की है। उसे पढ़ो। यह एक प्रकृति की घटना है। विभिन्न पदार्थों के, नीहारिका के आकार में, आकस्मिक मिश्रण से पृथ्वी बनी। कब? इतिहास देखो। इसी प्रकार की घटना से जन्तु पैदा हुए और एक लम्बे दौर में मानव। डार्विन की ‘जीव की उत्पत्ति’ पढ़ो। और तदुपरान्त सारा विकास मनुष्य द्वारा प्रकृति के लगातार विरोध और उस पर विजय प्राप्त करने की चेष्टा से हुआ। यह इस घटना की सम्भवतः सबसे सूक्ष्म व्याख्या है।

तुम्हारा दूसरा तर्क यह हो सकता है कि क्यों एक बच्चा अन्धा या लंगड़ा पैदा होता है? क्या यह उसके पूर्वजन्म में किये गये कार्यों का फल नहीं है? जीवविज्ञान वेत्ताओं ने इस समस्या का वैज्ञानिक समाधान निकाल लिया है। अवश्य ही तुम एक और बचकाना प्रश्न पूछ सकते हो। यदि ईश्वर नहीं है, तो लोग उसमें विश्वास क्यों करने लगे? मेरा उत्तर सूक्ष्म तथा स्पष्ट है। जिस प्रकार वे प्रेतों तथा दुष्ट आत्माओं में विश्वास करने लगे। अन्तर केवल इतना है कि ईश्वर में विश्वास विश्वव्यापी है और दर्शन अत्यन्त विकसित। इसकी उत्पत्ति का श्रेय उन शोषकों की प्रतिभा को है, जो परमात्मा के अस्तित्व का उपदेश देकर लोगों को अपने प्रभुत्व में रखना चाहते थे तथा उनसे अपनी विशिष्ट स्थिति का अधिकार एवं अनुमोदन चाहते थे। सभी धर्म, समप्रदाय, पन्थ और ऐसी अन्य संस्थाएँ अन्त में निर्दयी और शोषक संस्थाओं, व्यक्तियों तथा वर्गों की समर्थक हो जाती हैं। राजा के विरुद्ध हर विद्रोह हर धर्म में सदैव ही पाप रहा है।

मनुष्य की सीमाओं को पहचानने पर, उसकी दुर्बलता व दोष को समझने के बाद परीक्षा की घड़ियों में मनुष्य को बहादुरी से सामना करने के लिये उत्साहित करने, सभी ख़तरों को पुरुषत्व के साथ झेलने तथा सम्पन्नता एवं ऐश्वर्य में उसके विस्फोट को बाँधने के लिये ईश्वर के काल्पनिक अस्तित्व की रचना हुई। अपने व्यक्तिगत नियमों तथा अभिभावकीय उदारता से पूर्ण ईश्वर की बढ़ा-चढ़ा कर कल्पना एवं चित्रण किया गया। जब उसकी उग्रता तथा व्यक्तिगत नियमों की चर्चा होती है, तो उसका उपयोग एक भय दिखाने वाले के रूप में किया जाता है। ताकि कोई मनुष्य समाज के लिये ख़तरा न बन जाये। जब उसके अभिभावक गुणों की व्याख्या होती ह,ै तो उसका उपयोग एक पिता, माता, भाई, बहन, दोस्त तथा सहायक की तरह किया जाता है। जब मनुष्य अपने सभी दोस्तों द्वारा विश्वासघात तथा त्याग देने से अत्यन्त क्लेष में हो, तब उसे इस विचार से सान्त्वना मिल सकती हे कि एक सदा सच्चा दोस्त उसकी सहायता करने को है, उसको सहारा देगा तथा वह सर्वशक्तिमान है और कुछ भी कर सकता है। वास्तव में आदिम काल में यह समाज के लिये उपयोगी था। पीड़ा में पड़े मनुष्य के लिये ईश्वर की कल्पना उपयोगी होती है। समाज को इस विश्वास के विरुद्ध लड़ना होगा। मनुष्य जब अपने पैरों पर खड़ा होने का प्रयास करता है तथा यथार्थवादी बन जाता है, तब उसे श्रद्धा को एक ओर फेंक देना चाहिए और उन सभी कष्टों, परेशानियों का पुरुषत्व के साथ सामना करना चाहिए, जिनमें परिस्थितियाँ उसे पटक सकती हैं। यही आज मेरी स्थिति है। यह मेरा अहंकार नहीं है, मेरे दोस्त! यह मेरे सोचने का तरीका है, जिसने मुझे नास्तिक बनाया है। ईश्वर में विश्वास और रोज़-ब-रोज़ की प्रार्थना को मैं मनुष्य के लिये सबसे स्वार्थी और गिरा हुआ काम मानता हूँ। मैंने उन नास्तिकों के बारे में पढ़ा हे, जिन्होंने सभी विपदाओं का बहादुरी से सामना किया। अतः मैं भी एक पुरुष की भाँति फाँसी के फन्दे की अन्तिम घड़ी तक सिर ऊँचा किये खड़ा रहना चाहता हूँ।

हमें देखना है कि मैं कैसे निभा पाता हूँ। मेरे एक दोस्त ने मुझे प्रार्थना करने को कहा। जब मैंने उसे नास्तिक होने की बात बतायी तो उसने कहा, ‘’अपने अन्तिम दिनों में तुम विश्वास करने लगोगे।’’ मैंने कहा, ‘’नहीं, प्यारे दोस्त, ऐसा नहीं होगा। मैं इसे अपने लिये अपमानजनक तथा भ्रष्ट होने की बात समझाता हूँ। स्वार्थी कारणों से मैं प्रार्थना नहीं करूँगा।’’ पाठकों और दोस्तों, क्या यह अहंकार है? अगर है तो मैं स्वीकार करता हूँ।


Date Written: 1931
Author: Bhagat Singh
Title: Why I Am An Atheist (Main nastik kyon hoon)
First Published: Baba Randhir Singh, a freedom fighter, was in Lahore Central Jail in 1930-31. He was a God-fearing religious man. It pained him to learn that Bhagat Singh was a non-believer. He somehow managed to see Bhagat Singh in the condemned cell and tried to convince him about the existence of God, but failed. Baba lost his temper and said tauntingly: “You are giddy with fame and have developed and ago which is standing like a black curtain between you and the God.” It was in reply to that remark that Bhagat Singh wrote this article. First appeared in The People, Lahore on September 27, 1931.

https://www.marxists.org/hindi/bhagat-singh/1931/main-nastik-kyon-hoon.htm