सन्दीप निर्भय | परिचय | विजय राही

जन्मदिन| 29 मार्च
संदीप निर्भय युवा कवि है। दक्षिण भारत के किसी शहर में मजदूरी करता है और कविताएँ लिखता है। पिछले दिनों संदीप का पहला कविता-संग्रह ‘धोरे पर खड़ी साँवली लड़की’ बोधि प्रकाशन ,जयपुर से आया है ।

अक्सर संदीप से कविता पर बात होती रहती है, सो कविता-संग्रह की कविताओं से भी गुज़रा हूँ और मैंने देखा है कि संदीप कविता को लेकर बेहद गंभीर है,जो गंभीरता अक्सर नये कवियों की कविताओं में देखने को कम मिलती है।

संदीप की कविताओं के बारे में बात करें तो यहाँ गाँव-गुवाड़ है,खेत-खलियान है, जीवटता के साथ भरपूर प्रेम भी है । ग्राम्य जीवन का अनपम सौन्दर्य है तो ग्रामीण जीवन की अदम्य जिजीविषा का यथार्थ चित्रण भी है । एक बात और उनके यहाँ कमाल की ये है कि वो कविता में लगभग वर्जित विषयों पर भी कविता लिखने की कुव्वत रखते हैं। उनके यहाँ कोई विषय वर्जित नही है। कवि का पहला कविता संग्रह होने के बावजूद भाषा,शिल्प और संवेदना में परिपक्वता है।

इस कविता संग्रह की भूमिका वरिष्ठ कवि कृष्ण कल्पित ने लिखी है, और शानदार लिखी है। भूमिका में एक जगह उन्होने संदीप की तुलना लोक सौन्दर्य के चितेरे और अलहदा कवि प्रभात से की है,सो संदीप पर ज़िम्मेदारी बढ़ गई है। उम्मीद है, अगले संग्रह में और निखर निथर कर आयेंगे।

संदीप निर्भय का आज जन्मदिन है। संदीप को उसकी ही एक कविता के साथ जन्मदिन की घणी सारी बधाई और शुभकामनाएं ।
ख़ूब पढ़ते रहिए, लिखते रहिए ।

सूरज उगने से पहले माँ
बिलोती है दही।

दही मथकर जब
वह बना रही होती है जब
घी के लचके
तो लगता है ऐसा

मानों कि –
“माँ की हथेली पर
नाच रही हो
कुंवारी लड़की की तरह पृथ्वी।”

जन्मदिन 13 मार्च |किशन मीणा |पेंटर जिसने कूँची की जगह कैमरा थाम लिया