बनिया | चरण सिंह पथिक

सफे कोरे ही रह गए जिन्हें दीवान होना था ।

तेरी हर अदा पर मुझे हैरान होना था ।
मैं आबाद हो गया मुझे वीरान होना था ।।

तू वो जमीं है जिस पै अदब के बीज बोये थे
मैं बनिया बन बैठा मुझे किसान होना था ।

जो गुजर गया वो ठीक था, जो आएगा वो देखेंगे
अब तू मुद्दा नहीं कोई ,तब परेशान होना था ।

कोई नहीं है यहाँ अमर, हैं चंद दिन हर जेब में
मुझे तो भक्त होना था, उन्हें भगवान होना था ।

बोझ दिल का अब हमारी पलकों पर उतरा
सफे कोरे ही रह गए जिन्हें दीवान होना था ।

भैरोघाट से

हम फूल हैं बबूल के | चरण सिंह पथिक

ना गीत में ना कविता में ना किसी की शायरी में
ना किताबों के सफे पर ना किसी की डायरी में

जिक्र हमारा कहीं नहीं हम फूल हैं बबूल के
हँसते-हँसते हम खिलें हम पड़ौसी शूल के

ना प्रेयसी के प्रिय रहे ना देवता पर चढ़े कभी
ना बिछे किसी की राह में ना गले किसी के पड़े कभी

हम मिलेंगे, हम खिलेंगे चाहे थार हो या अरावली
चूमती हैं हमको झुककर बरखा की काली बादली

रंग-रूप, गंध-रस हैं चोंचले सब फिजूल के
जिक्र हमारा कहीं नहीं हम फूल हैं बबूल के

भैरोंघाट से | चरण सिंह पथिक