आज्ञाकारिता | पल्लवी

हमारे बचपन में एक अंकलजी थे ।वो हमेशा अपने बच्चों की आज्ञाकारिता से बेहद गर्वित महसूस करते थे।तो उस गर्व को महसूस करने जब-तब बच्चों को आदेश दिया करते।

‘ चलो बच्चों , दीवार पर सर के बल खड़े हो जाओ’

चलो बच्चो, आज इस सड़क को नापकर आओ कि कुल कितने कदम होते हैं ‘

‘ मेरे बच्चो, ऐसा करो कि आज स से शुरू होने वाले सारे गीत गाओ।’

‘ प्यारे बच्चो, गधे की तरह ढेंचू-ढेंचू करो आज ‘

‘ आज मेरे बच्चे छत पर गुलाटियां मारेंगे ‘

बच्चे बडी खुशी से सारे काम करते।न लॉजिक पूछते और न कभी इरिटेट होते। अंकल जी ने उन्हें एकमात्र गुण पिता की आज्ञाकारिता का सिखाया था। पिता जी आखिर पिता जी हैं,कुछ ग़लत थोड़े ही कहेंगे।

अंकल जी हर चौथे दिन ‘…मैटिक’ आदेश छोड़ छोड़कर जांचते रहते कि आज्ञापालन में कहीं कमी तो नहीं आ गयी।और बच्चों को पगलेती करते देख मंद-मंद मुस्काते रहते।

अंकल जी आजकल गाहे-ब-गाहे याद आ जाते हैं।