अथाई का भाव

Be yourself; Everyone else is already taken.

— Oscar Wilde.

गाँवों में अथाई एक ऐसी जगह होती है, जहाँ बारात आकर रूकती है, दूल्हे का पहला आगमन वहीं होता है। दोनों गाँवों के बड़े-बुज़ुर्ग यहीं पहली बार मिलते हैं।

आम दिनों में भी अथाई गाँव का सांस्कृतिक केंद्र है, जहाँ फ़ुर्सत के पलों को जिया जाता है। कुछ लोग अपने हुनर का इस्तेमाल करते हुए दोपहरी काटते हैं।और उपयोगी चीज़ें बुनते हैं।

एक बूढ़े पीपल के चारों और बना चबूतरा अथाई है।

बाहर से कोई नेता या कलाकार या सम्मानित व्यक्ति आता है तो भी इसी मंच पर उसका स्वागत किया जाता है, सम्वाद होता है।

लोक गीतों और नृत्यों के कार्यक्रमों का भी यह मंच है।

विषाद-उल्लास, नृत्य-गीत, रस्म-रिवाज़ अथाई से जुड़े हैं।

खुला दरवाजा

चरण सिंह ‘पथिक’

भैंरोंघाट से—” खुला दरवाजा “

राह बदलकर वो कमबख्त मुसाफिर चला गया ।
इंतजार में खुला हुआ दरवाजा छला गया ।।

बहुत देर से महफ़िल में सन्नाटा पसरा था 
तुम आई तो जाम हाथ का छलछला गया ।

पक्के मकां का वादा करने वाला गजब निकला
कुछ वोटों की खातिर मेरा छप्पर जला गया ।

जब तक चुप था बहुत सुखी था पर अब क्या बोलूं 
सच बोला तो सबसे पहले रेता गला गया ।

आज तेरी यादों का बादल घिर-घिर आया है
लेकिन बिन बरसे हरजाई घर से चला गया ।