दाह की लकड़ी | अमर दलपुरा

जीने का अजीब सुख है
सूखे हुए पेड़ भी
जड़ो के प्रेम में पड़े हुए है

जड़े इसलिए खड़ा रखती है
पेड़ होने का अर्थ
दुनिया को समझा सके.

मेरे इलाके के बुजुर्ग
शमशान की तैयारी में
दाह की लकड़ी इसलिए इक्कठी करते है
कोई कह न दे.
उसके घर मे पेड़ नही थे.

फ़ोटो अमर दलपुरा

ईरानी फ़िल्म ‘बरन’ -2001 पर अमर दलपुरा की टिप्पणी

युद्धग्रस्त अफगान के शरणार्थी ईरान में सस्ते श्रम पर काम करते है. जिनके पास परिचय पत्र भी नही है. लतीफ़ , निर्माण कार्य में लगे श्रमिको के लिए चाय और खाना परोसता है. और छोटी- छोटी बातों में गुस्सा करता है. रहमत की उम्र 14 साल है, ज्यादा भारी कार्य नही कर सकता इसलिए मेमार लतीफ के कार्य को रहमत को दे देता है. लतीफ़ बदले की भावना से भर जाता है. एक दिन लतीफ देखता कि रहमत आईने में बालों संवार रहा है. वह देखता है कि ये लड़का नही, लड़की है. उस दिन से लतीफ के व्यवहार में अजीब परिवर्तन होता है. रहमत का असली नाम baran है. जिसका भाई अफगानिस्तान में युद्ध मे मारा गया. माँ बीमार है. वह पिता के साथ ईरान में है. वे वापस घर जाना चाहते है. लतीफ़ परिचय- पत्र बेचकर उनकी मदद करता है. लतीफ और बारां, दोनों एक दूसरे भावनाओं को शब्द नही दे पाते. फ़िल्म के अंत में बारिश हो रही है. ट्रक में सामान रखा जा गया. Baran भी जा रही है. बारिश में जूता खुल गया . लतीफ जूता उठाता है. Baran अपने पैर को डालती है. वे दोनों एक दूसरे को पहली बार इतने करीब से देखते है. और ट्रक चल देता है. लतीफ बारिश में जूते के निशान को देखता….😢

इस फ़िल्म का लेखन और निर्देशन माज़िद मजीदी ने किया. बहुत कम बजट में बेहद शानदार फिल्मे बनायी है. मैं उनकी तीसरी फिल्म देख रहा हूँ. आप देखना चाहते है. इंग्लिश subtiles के यूट्यूब पर उपलब्ध है.