कोई लौटा दे मुझे बीते हुए दिन

‘आख़िरी गाँव’ ज्ञान चंद बागड़ी के उपन्यास पर मोहन लोदवाळ की टिप्पणी

‘आख़िरी गाँव’ ज्ञान चंद बागड़ी जी का पहला उपन्यास है। इसमें 160 पृष्ठ हैं और इसे वाणी प्रकाशन ने इसी साल 2020 में निकाला है। पेपरबैक संस्करण का मूल्य 199 है। यह उपन्यास राजस्थान और हरियाणा सीमा के आखिरी गाँव “रायसराना” की जीवनी (बायोग्राफी) है जो अहीरवाटी (राठ) क्षेत्र में आता है। लेखक को अपने गाँव “रायसराना” से “दिल्ली” आने में 21पड़ावों को पार करना पड़ता है। इससे एकबारगी यह लगता है कि यह उपन्यास कम है और लेखक की अर्द्ध-आत्मकथा (ऑटोबायोग्राफी) ज्यादा है।

दूसरे शब्दों में कहूँ तो अगर कोई आपको एक मूवी टिकट दे और सिनेमा हॉल में आपको मूवी देखने के साथ-साथ कॉर्नफ्लेक्स तथा आइसक्रीम भी मुफ़्त में मिल जाए तो मूवी देखने का मज़ा दुगुना हो जाता है। इसी तरह इस पुस्तक में आपको “उपन्यास” के साथ-साथ “जीवनी” और “आत्मकथा” भी मुफ़्त में पढ़ने को मिलेगी। कई फिल्मों की कहानियों में आपने देखा होगा कि इंटरवल से पूर्व की कहानी कसी हुई और जानदार होती है लेकिन इंटरवल के पश्चात कहानी का सिरा ढ़ीला पड़ जाता है और फ़िल्म फ्लॉप हो जाती है। इसके विपरीत शुरू में इस उपन्यास के एक-दो पड़ाव आपको ढ़ीले जरूर नजर आएंगे लेकिन इसके बाद आप उपन्यास को बिना पढ़े छोड़ नहीं पाएंगे।

इस उपन्यास की प्रस्तावना वरिष्ठ कवि “कृष्ण कल्पित” जी ने लिखी है। उन्होंने लिखा है कि ‘7वें दशक के बाद गाँवों की बहुत बड़ी आबादी का पलायन रोजी-रोटी के लिए शहरों और महानगरों में हुआ है। इस आवाजाही ने भारतीय गाँवों की आत्मा और पहचान दोनों ही छीन ली है’। हिंदी में शिवमूर्ति, संजीव, भगवानदास मोरवाल और चरण सिंह पथिक के बाद गाँव की हर नब्ज़ को टटोलने में यह लेखक भी सिद्धहस्त मालूम पड़ता है। दूसरे शब्दों में कहे तो बागड़ी जी की नजर से गाँव का शायद ही कोई पक्ष, कोई घर-घराना, कोई खेती बाड़ी, कोई जाति, कोई रंग, कोई तालाब, कोई पहाड़, कोई पनघट, बणी (वन), कोई कोना बचा हो जिसका उल्लेख करना वह भूल गए हों। इसके अलावा, उन्होंने गाँव की महिलाओं के साथ-साथ उनके पाले-पड़ी महिलाओं की मनोवृत्तियों को जिस हिम्मत से उल्लेख किया है वह काबिले तारीफ़ है।

बागड़ी गाँव का मतलब इस प्रकार बताते हैं ‘जहाँ सुबह आपकी आँख किसी पशु के रम्भाने से खुले, जहाँ मोर नाचते हों, झींगुरों की आवाज सुनी जा सके, रात में एक-एक तारा साफ दिखाई दे, अँधेरे का संगीत और सन्नाटा सुनाई दे, साझी विरासत हो और साझी ही बहन-बेटियां हो, सहयोग, सामाजिकता हो, सादा खाना हो और मोटा पहनावा हो’।

वे आगे लिखते हैं कि “आज शहर में दौड़ते रहकर भी पीछे छूट जाता हूँ और गाँव में रेंगता भी था तो लगता हवा में उड़ रहा हूँ। यहां सब को जानकर भी लगता है कि कौन है मेरा, वहाँ इतना कम जाता हूँ फिर भी लगता है सभी मेरे हैं। गाँव दरअसल बहुत बड़ी विलासिता है, हम गरीबी के कारण कुछ ज्यादा की तलाश में थे और गाँव छूट गया। तरक्की के लिए गाँव छोड़ा था, हिसाब करता हूँ तो लगता है कि शहर आकर तो और भी गरीब हो गया हूँ”। इस प्रकार यह उपन्यास उत्तर भारत के गांवों का एक लिखित दस्तावेज है क्योंकि लेखक का यह मानना है कि गाँव तो सभी लगभग एक जैसे ही होते हैं। उन्होंने पूरे गाँव को उठाकर इस उपन्यास में रख दिया है। यह उपन्यास पढ़ने योग्य होने के साथ-साथ सहेजने योग्य प्रमाणीकृत प्रलेख है।

अगर आप लोग मेरे जैसे पाठक की बात को तनिक भी तवज्ज़ो देते हो तो मैं इतना ही कहूँगा कि कम से कम मेरे हमउम्र लोगों विशेषकर हिंदी प्रदेश के सभी गाँव वालों को यह उपन्यास अवश्य पढ़ना चाहिए और अपने घर में रखना चाहिए ताकि आप अपनी जड़ों से जुड़े रहे और इस धरोहर को अपनी अगली पीढ़ी को सौंप सके। मैं ज्ञान चंद बागड़ी का शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने मुझे मेरा बचपन लौटा दिया। इस उपन्यास में वह सब कुछ है जिसे आपने अपने बचपन जिया है। फिर सोचना क्या, जिओ अपना बचपन!

मैणान की होड़ी | मोहन लोदवाळ

मीणाओं के लोकगीत की यह विधा लगभग लुप्त हो गई है।
अब इसके गीतकार, मिज़ाज, गांव की रौनक सब खत्म हो गई है। होड़ी की पूर्व संध्या वाली रात और होड़ी के दिन की पूरी रात इसे सामूहिक रूप से गाया जाता था। यह वैसे ही खत्म हो गए हैं जैसे सावन के गीत खत्म हो गए हैं।

फर्क इतना सा है कि सावन के गीत गांव की बहन, बेटियों द्वारा किसी बड़े पेड़ की डालियों पर डाले गए झूलों पर सामूहिक रूप से गाए जाते हैं जबकि होड़ी के गीत भी महिलाओं द्वारा ही जाते हैं लेकिन इसमें गांव की बहन, बेटियों के साथ-साथ गांव की बहू और औरतें भी गाती हैं। कहीं-कहीं पुरूष लोग भी अलग समूह में गाते हैं।

1-एक जलेबी दो लाडू, होड़ी का डांडा खां गाडू।
2-होड़ी मंगड़े जब बूंद पड़े, संवत को धोखो नहीं मइया।
3-आम तड़े मत पीटे मेरे बलमा, या हरियो चुगली कर जायगो।
5-पीलू काटयो जड़ में से, क्या खाएगी छोरी लफर में से।
6-नौ मण जीरो नौसे को, मेरा जेठ बिना कूण बेचेगो।
7-ओखड़ी में रांदयो मिठो लपटो, खा गयो जेठ बड़ो नकटो।
8-कोड़ड़ा को पेड़ म्हारा बाड़ा में, दे दियो बाईजी का गौणा में।
9-पालक्या के बंध रही घंटाड़ी, चमके रे रात्यों सो बाड़ी।
10-पलक्या पे पग जब दीज्यो, पहले खेत की सला मिला लीज्यो।
11-बड़ रे गैबी पटवारी, म्हारी पौड़ी के लगागो पितकाली।
12-पीलू को मचोल्या मेरी जीजी के सू लाई, घुड़-घुड़ रे बालम ने तोराड़यो।
13-आज बलम ने कांई सोची, चटनी से खा गो नौ रोटी।
14-नौ बीघा आरेड़, बकरिया खा गई बूचा कानन की।
15-चना में आ गई घेघरिया, रमझोल गड़ा दे देवरिया।
16-चना कटे म्हारी पाटी में, मरमोल्यो झांके घाटी में।
17-एक टेंट में तीन चना, संवत को धोखो नहीं मइया।
18-हरिया चाल्यो जौ चुगवा, म्हारे देवर कू लेगो रुखाड़ी किरवा।
19-आंकड़ा की लकड़ी, धौंकड़ा को बीज, जा रे गैबी नितला, रोटी करवा सीख।
20-होड़ी पे चढ़गो सांप-सडूको, भारी हो गई देवरिया।
21-कुंआ पे से हैलो पाड़े काकी ससुरो, तोड़ लाई गजरो।
22-भटा उजड़ेगे बाड़ी के, मन भटके जीजा-साड़ी के।

अंत में, धुलैंडी वास्तव में धूल, गारा आदि से ही खेली जाती थी, रंग तो बहुत बाद में आए हैं। तथापि, हमारे यहाँ जो महत्व और आनंद होड़ी का था वह धुलैंडी में नहीं था। अब वह प्यार, भाईचारा, उमंग, चाव, अपनापन, सामूहिकता जैसे-जैसे खत्म होती जा रही है वैसे-वैसे सारे तीज-त्योहार नीरस, रस्मी और औपचारिकता पूर्ण होते जा रहे हैं।