जिसने कभी कलकत्ता नहीं देखा | रुचि भल्ला

जिसने कभी कलकत्ता नहीं देखा
वह क्या देखेगा कोलकाता जाकर

बीसू दा कहते हैं चबा कर सोलहवां पान

मैं बीसू दा की बात सुनती नहीं
गिनती हूँ उनके दिन भर के पान

आठ घंटे में सोलह पान
बीसू दा पान के चेन ईटर हैं

पान की दुकान वाले प्रदीप को
कत्था-चूना से ज़्यादा बीसू दा की ज़रूरत है

ज़रुरत तो शारदा अम्मा की भी है
उधार लाती थीं दुकान से
खिलाती थीं मोहल्ले के बच्चों को बुला कर दाल-चावल

वह सुलगती अंगीठी बुझ गई सन् 90 में
जिसके कोयले होते थे उधार के

वैसा दाल-चावल फिर किसी हाथ
लाल काॅलोनी में पका नहीं

वे बच्चे भी बच्चे नहीं रहे
जैसे बौम्बे हो गया मुम्बई

बच्चों ने बड़ा होना चाहा था
शहरों ने बूढ़े होना कभी नहीं

चाहने से क्या होता है

चाहा तो नग़मा की अम्मी ने भी नहीं था
नज़मा और तरन्नुम के अब्बा को खो देना

खो देना कागज़ी लफ़्ज़ नहीं होता
दर्द के दरिया में डूबना होता है

डूबना शब्द का अर्थ वह जानता है
जो तैराक नहीं होता

ग़ालिब इश्क के दरिया में क्या तैरे होंगे
डूबे रहे शेर -ओ -शायरी की दुनिया में

वह जब लिखते थे शेर
उड़ाते थे लिख कर वक्त की धज्जियाँ

नगमा की अम्मी शेर से बेखबर
भेजती थीं बेटियों को पढ़ने के लिए पाठशाला

वक्त की धज्जियाँ समेटतीं थीं कतरा-कतरा
जोड़ती थीं कतरों को सिलाई मशीन चला कर

वह टाँकती रहीं उम्र भर धज्जी-धज्जी वक्त पर
ज़िन्दगी का पैबन्द

नग़मा की उस अम्मी का नाम
ग़ालिब के शेर की ज़ुबान पर कभी आया नहीं