खण्डीप, निवाजीपुरा, भालपुर की औरतें | विनोद पदरज

कुएं में कूदकर भी बच सकती है
आग में झुलस कर भी बच सकती है
ऐसा कोई भी जोखिम नहीं उठाती वह
धड़धड़ाती रेल चुनती है
एक क्षीण सी खटाक खट
और मील भर के घेर में मांस के लोथ
उसे लहंगे और लूगड़े से पहचाना जाता है

जब वह निकलती है घर से
जैसे सैंकड़ों औरतें निकलती हैं भिनसारे
चौका चूल्हा निपटाकर
खेत क्यार के लिए
बड़ीते न्यार के लिए
तो कोई गौर नहीं करता
पर कौए पहचान लेते हैं
कि आज उसने बेटे को छोड़ दिया है घर
और दृढ़ कदमों से बढ़ी जा रही है
दुधमुंही बच्ची को छाती से चिपटाये

वे आगे आगे उड़ते हैं
और कदम्ब के उस अभागे पेड़ पर जाकर बैठ जाते हैं
जिसके तले की झाड़ियों में दुबककर
वह रेल की प्रतीक्षा करती है
अंनत यात्रा पर जाने के लिए

आह!ऐसे वक़्त भी धूप से बचती हुई

जब भी कोई भैंस कटती है गांव की
कोहराम मच जाता है-

गजब हैगो
पल्लै फटगी
अरे का बच्यो अ
खैबे की सी नहींअ
हाल साल ई तो लाये सत्तर हजार की
और भैंस का ही, चीज ही
एक टैम को सात सेर दूध देवई
ओड़ पास गाँवन में नीं मिलै ऐसी भैंस
रोया पुकारीन से का होय
सरग से हाथ छूटगे ये तो

जब भी कोई औरत कटती है गांव की
पंचायत जुड़ती है

सहन सगती नहीं है भोटियान में
होती रहवै छोटी बड़ी बात घर गिरस्ती में
ई तो अच्छयो हुयो छोराय छोड़ गई
ई तो ख़ासियत है हमारे गांव की
हर साल पांच सात केस होवैं
पण पुलिस थाना नहीं
कोर्ट कचैरी नहीं हाल तक
भोटियान को का है
भतेरी पड़ी हैं
और ले आयेंगे

और विसर्जित हो जाती है

फिर किसी दिन कोई औरत निकलती है घर से
जिसके आगे आगे उड़ते हैं कौए
और कदम्ब के पेड़ पर जाकर बैठ जाते हैं

विनोद पदरज