पन्द्रह अगस्त के बाद | शैलेन्द्र

पन्द्रह अगस्त के बाद ( an excerpt ) 1947/48

राम राज्य का ढोल बजाया ,
नेता ने कंट्रोल उठाया,
काले बाज़ारी बनियों को,
दिल में, दिल्ली में बैठाया;
खुल्लम खुल्ला लूट मच गयी,
महंगाई ने रंग दिखाया !

आज़ादी की चाल दुरंगी ,
घर घर अन्न , वस्त्र की तंगी ,
तरस दूध को बच्चे सोए ,
निर्धन की औरत अधनंगी ,
बढ़ती गयी गरीबी दिन दिन,
बेकारी ने मुँह फ़ैलाया !

तब ग़रीब ने शोर मचाया ,
बहुत सहा अब नहीं सहेंगे !
कहाँ गए वे वादे ?
अब हम भूखे नंगे नहीं रहेंगे !
सुन ललकार जगी जनता की,
दिल्ली काँपी, दिल थर्राया !

लीडर ने तरकीब निकाली,
हिटलरशाही को अपनाया ,
जगह जगह गोलियां चलाई,
नेताओं को जेल भिजाया;
उम्मीदों की सीता हर ली,
अपना रावण रूप दिखाया !

सोशलिस्ट कहलाने वाले, बोले,
” पैदावार बढ़ाओ !”
पेट सेठ का कहाँ भरा है,
और खिलाओ, और ठुंसाओ !
“झुक पटेल की चप्पल चूमी,
मौका देखा, पलटा खाया !

संघ खुला, खददरजी बोले,
” आओ तिरंगे के नीचे !
रोटी ऊपर से बरसेगी,
करो कीर्तन आँखें मींचे !
तुमको भूख नहीं है भाई,
कम्युनिस्टों ने है भड़काया !”

लेकिन भैय्या, भूख आग है,
भड़क उठे तो खा जाती है,
नहीं गोलियों से बुझती है,
गुपचुप जेल नहीं जाती है !
भूख बला है, कुछ मत पूछो,
बड़े बड़ों को नाच नचाया !

गवरमिंट बटुआ दिखलाती,
कहती, कौड़ी पास नहीं है,
चाहो तो गोली खिलवा दें ,
गोली कभी खलास नहीं है !
छोड़ दिए जासूस हज़ारों,
तरह तरह का डर दिखलाया !…

सौजन्य दिनेश शंकर शैलेन्द्र