मगर वो गीत – अब चुप थी हमेशा के लिए |सतीश छिम्पा

‘सुपनियां दे दस्तख़त’ (सपनो के दस्तख़त) सिरलेख है उसकी किताब का, वह बहुत प्यारी और मलूक बच्ची थी। यह उसकी पहली ही किताब जो छपकर घर के दरवाजे पर पहुंची, मगर वो गीत – अब चुप थी हमेशा के लिए।

आदमपुर जिला जालंधर की मिट्टी में जाई जन्मी- वो बहुत मलूक और प्यारी सी बच्ची जिसका रिश्ता शब्दों से हुआ और बहुत पनियाई से हल्के, कोमल शब्दों को लिखकर हर एक भाव के साथ जीवन सहेजना चाहती थी। जीवन महान है… मगर उसके हिस्से समय की महानता बहुत कम आई थी। जो थे बस शब्द थे और उसकी कविताओं

गुरप्रीत प्रीत
गुरप्रीत प्रीत

में इसकी गरिमा बनी रही

उस मासूम और निर्मल मन की बच्ची जो कविताएं लिखती थी का नाम था :-

गुरप्रीत गीत

वह बच्ची जो जवानी में पैर रखने ही वाली थी
वो बच्ची जो भीतर की संवेदनाओं को कट्ठी करके कविता को भीतर उतारकर सुख सपने देखने लगी थी
वो। वो बच्ची जो कविता को जीती थी, गीत नाम था उसका। वो लड़की जिसकी आंखों में मचलते थे नये और साऊ, ईमानदार और जीवित समाज और मनुष्य निर्माण के सपने।””
वो एक बहुत प्यारी बच्ची- जिसको देख कर समय भी अपनी कड़वाहट भुला देता था.. वो नन्हे नन्हे सपने देखती, बहुत प्यारी दुनिया की कल्पना करती थी। नन्ही बच्ची जो कामयाब होकर बापू और मां, परिवार और समाज के लिए काम करना चाह रही थी। लड़की जो दरख्तों, पौधों और पशु पक्षियों की भाषा जानती थी, जो उछल कर एक छलांग में आसमान से मुट्ठी भर तारे तोड़ लाती थी। वो एक लड़की जो हाड़ मांस से नहीं बल्कि बाल्यावस्था की मालूक सी भावनाओ के महीन धागों से बुनी गई थी। जिसके सपनो में असंख्य रंगों से भरी रंग-बिरंगी आकाश गंगा हर रोज आती थी। वो जो असंख्य गौरैया के संगीत से इस समाज, वर्ग और देश को सजा देना चाहती थी। कहाँ है अब वो लड़की जो जिसकी आंखों में मचलते थे नये समाज और मनुष्य के सपने। उसके भाव जब द्रव्य बन बहने को होते, तो लिख लेती कविता….. और फिर… वो शब्द में समा गई अर्थों के साथ….. गीत तुम्हारी देह गुजरी है, तुम जिंदा हो इन कविताओं में…..

Gurpreet-Kaur-Book

 

 

 

गीत की पंजाबी कविताएं
अनुवाद सतीश छिम्पा
अनुवाद सहयोग अनीश कुमार

 

 


बेलिहाज

बड़ी मुँहफ़ट थी वो
किसी गिरे हुए घोंसले में
जन्मी घुग्गी की तरह

बेहद रफ़ थी उसकी चाल
हँसने रोने का लिहाज़
तहजीब के मफ़लर के
पीछे नही छुपाती थी

काला चश्मा पहन कर
दोस्तों रिश्तेदारों की आँखो से खोयी पहचान को चुगतीं रहती

कभी कभी
ख़ुद की ग़लत हुई परिभाषा को पढ़ ज़ख़्मी होती
बहुत रोती
कभी हँसती
लोटपोट होती
ख़ुद पर जोक बना कर

गिरे हुए घोंसले में
जन्मी घुग्गी
किसी पेड़ से मोह भी
न कर सकी

अब तीन फरों वाले पंखे पर घोंसला बनाने की कोशिश करती है
मगर…
तिनके हमेशा बिखरे ही
रहते।


(२)
बेचारा सपना

दूर दूर तक फैला हुआ घास
शुभ संदेश था

बिना अपनी नज़र के
कोई दिशा-सूचक नही था

आकाश पर फैले थे
सपनों के हस्ताक्षर

मगर
थका हुआ है
सपने देखने वाला

थकावट भला कैसे दूर हो
शहर की विशाल इमारत के नीचे है उसका धड़
आकाश की तरफ़ सिर
धरती को छू नही पा रहे हैं पाँव
थका हुआ
सपने देखने वाला
अलग करता रहा नये भरे
ज़ख़्मों से काँटेदार तार
और भूल गया
सपनों को साकार करने
का हुनर

दीवारें गिरा आया
मगर दरवाज़ा साथ उठाए हुए है कहीं नींद आ जाए तो दरवाज़े को बना बिस्तर सो सकें

जीने की कोशिश में
लीन है गहरी नींद

क़ैदी का 000 की बीप से
टूटता है सपना।


(३)
कैसा महसूस होता है

कैसा महसूस होता है
गोदी उठायें शब्दों को
निज़ाम के बने बनाए
कीचड़ में छलाँग लगा जाना
और निजामियों का मुँह काला कर देना

कैसा महसूस होता है
ज़िन्दगी के सफ़ेद कम्बल में
शब्दों का ब्लैकहोल बना देना
और
वहाँ ख़ुद को
आंशिक रूप से तैरने देना
अपने अस्तित्व की विराटता के लिए
साँसों का फैलना स्वीकार करना
कविता की ऊँगली पकड़ चलना
दृश्य अदृश्य रास्तों पर
अस्तित्व की नोक
तीखी करना
टकराते रहना पत्थरों से

कैसा महसूस होता है ?
इंतज़ार करना
सही समय का

और अंत में
थक हार
तोड़ देना वो मर्तबान
जिनमे पल रखे है
इंतज़ार के परिंदे।


(४)

महक

महक ज़ुल्म से कहीं बड़ी होती है

तुमने ज़ुल्म की तरह
प्यार किया

मैंने महक की तरह
निभाया प्यार

(५)

तेरा पता

बारिश की बूँदो को
तेरे तक पहुँचने के लिए हैं
छोटे छोटे हज़ारों पुल

इन बूँदो पर चल मैं
तेरे पास कब पहुँच जाती हूँ

मुझे पता ही नही रहता !!!

तू भी तो इन छोटी बूँदो पर अपने तलवे रख
मेरा इंतज़ार
करता है
मुझे कैसे पता चल जाता है …?


 

माँ के लिए कुछ कविताएँ | सतीश छिम्पा



(1)
मिथक ही था कि धरती टिकी है
शेष नाग के फण पर
या बैल के सींग पर
समझ आई तो पता चला
इस धरती को आपने अपनी भुजाओं पर टिका रखा है


(2)
चूल्हे पर सिकी रोटी की चिटक देखकर
उदास होती हो आप
और रोटी मुळकती है मेरी ओर
माँ-
आटा भी जानता है कि
नमक, पानी और आग के बिना
उसका अस्तित्व कुछ नहीं


(3)
एक पांव में पोलियो होते हुए भी
आपने
इस घर की विकलांगता को खत्म कर दिया
माँ
बताओ कैसे उठा लिया आपने
एक पांव पर सदियों का संताप


(4)
हमारा घर
सदियों से संतप्त
सूखा मरु, उजाड़
बिना सपनों और उम्मीदों का ढांचा भर था
माँ-
आप बिरखा सी बरस गयी
हरख गयी इस घर की भींतें
आंगन, देहरी और छत
आप रोटी, पानी, साग और दिनों के पार खड़ी हिम्मत हो
बुझती सांसों की आस हो

Photo- किशन मीना

परिचय-

सतीश छिम्पा सूरतगढ़ राजस्थान के रहने वाले है. लिखने- पढ़ने की भूख जो सतीश छिम्पा में है. युवा रचनाकारो में कम देखने को मिलती है. वे राजस्थानी (जोधपुरी) और हिंदी के अलावा पंजाबी तीनों भाषाओं लिखते है. kumarsatish88sck@gmail.com ई-मेल पर सतीश से बात की जा सकती है.